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किसान आंदोलन: मोदी-ममता के चुनावी मुकाबले में किसानों ने रखा 'दो धारी' तलवार पर कदम, बंगाल के नतीजे तय करेंगे आगे की बातचीत
Sat, 13 Mar 2021 02:25 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Sat, 13 Mar 2021 02:25 PM IST
सार
किसान नेताओं का कहा है कि पश्चिम बंगाल में एक राष्ट्रीय पार्टी ऐसा दुष्प्रचार करने में लगी है कि किसान संगठनों के नेता तो लेफ्ट से जुड़े हैं। उसकी रणनीति है कि वहां के किसान लेफ्ट को समर्थन दे दें। इससे टीएमसी को नुकसान होगा और भाजपा को फायदा पहुंच सकता है...
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नंदीग्राम में राकेश टिकैत
- फोटो : Agency
विस्तार
कृषि कानूनों की वापसी को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे किसानों की बात अभी तक नहीं बन सकी है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसान संगठनों ने कई तरीके आजमाए, लेकिन सरकार ने इन कानूनों की वापसी को लेकर दो टूक जवाब दे दिया है। कानून वापस नहीं होंगे, बातचीत के लिए सरकार हमेशा तैयार है।
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किसान संगठनों को जब यह भनक लगी कि भाजपा, बंगाल चुनाव को लेकर खासी उत्साहित है। वहीं अगर बंगाल में कमल खिला तो दिल्ली की सीमाओं से किसान संगठनों के धरने को उठाने में केंद्र सरकार मिनट नहीं लगाएगी। इसके बाद किसान संगठनों ने मोदी-ममता के चुनावी मुकाबले में कूदने का निर्णय लिया।
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वहीं किसान नेता इस फैसले के साथ दो धारी तलवार पर कदम रख रहे हैं। वजह, अधिकांश संगठनों की सोच वामपंथी (लेफ्ट) है। ऐसे में वोटरों ने अगर लेफ्ट को समर्थन दे दिया तो भाजपा के चक्कर में ममता को नुकसान पहुंच जाएगा। किसान नेता अविक साहा कहते हैं, हम इस चिंता से वाकिफ हैं। इसका तोड़ निकाल रहे हैं। सभी विधानसभा क्षेत्रों में जब किसान 'प्रचार पत्र' पहुंचेगा तो लोग वस्तुस्थिति को समझ जाएंगे।
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पश्चिम बंगाल में किसान नेता राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, हन्नान मौला, बलबीर सिंह राजेवाल, अतुल अंजान, अविक साहा और मेधा पाटकर सहित कई दूसरे नेता पहुंच चुके हैं। टिकैत की शनिवार को दो महापंचायत रखी गई हैं। पहली कोलकाता में और दूसरी नंदीग्राम में आयोजित होगी।
अगले दिन सिंगूर और आसन्नसोल में किसान नेता लोगों के बीच पहुंचेंगे। संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा बताते हैं, भाजपा ने कृषि कानूनों को पश्चिम बंगाल की हार जीत से जोड़ दिया है। हमें ऐसे संकेत मिल रहे हैं। भाजपा की सोच है कि बंगाल जीत गए तो किसान संगठनों की नहीं सुनेंगे। इतना ही नहीं, बंगाल का चुनाव जीतने के बाद भाजपा, किसानों के धरना प्रदर्शन को समाप्त कराने के लिए कोई भी अलोकतांत्रिक कदम उठा सकती है। यही वजह है कि अब सभी किसान संगठन पश्चिम बंगाल में पहुंच रहे हैं।
दो धारी तलवार की बात से किसान नेता वाकिफ हैं। यह बात कुछ हद तक सही है कि अधिकांश किसान नेताओं का अतीत एवं वर्तमान लेफ्ट विचारधारा के आसपास रहा है। अविक साहा के अनुसार, हालांकि आज जो नेता सरकार की हां में हां नहीं मिलाता, उसे कथित तौर पर लेफ्ट वाला घोषित कर दिया जाता है। कुछ राजनीतिक दलों की छोटी सोच है, इसलिए वे देश में केवल दो ही विचारधाराएं यानी लेफ्ट और राइट देखते हैं।
वह कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में एक राष्ट्रीय पार्टी ऐसा दुष्प्रचार करने में लगी है कि किसान संगठनों के नेता तो लेफ्ट से जुड़े हैं। उसकी रणनीति है कि वहां के किसान लेफ्ट को समर्थन दे दें। इससे टीएमसी को नुकसान होगा और भाजपा को फायदा पहुंच सकता है।
त्रिकोणीय मुक़ाबले में यही बात हमारे लिए दो धारी तलवार है। हमारा प्रचार कहीं भाजपा के लिए फायदा न बन जाए, इसका तोड़ निकाल रहे हैं। किसानों का ‘प्रचार पत्र’ गांव-गांव तक पहुंचा रहे हैं। उसे पढ़ने के बाद लोगों का यह भ्रम दूर हो जाएगा। इसके लिए कई टीमों का गठन किया गया है। ये टीमें हर एक विधानसभा क्षेत्र को कवर करेंगी। छोटी-छोटी नुक्कड़ जनसभाएं आयोजित कर लोगों को सच्चाई बताई जाएगी।
किसान नेता, लोगों से अपील करेंगे कि वे भाजपा को वोट बिल्कुल न दें। अगर बंगाल में भाजपा हारती है तो कृषि कानूनों की वापसी के लिए किसान जोरदार हल्ला बोलेंगे। चूंकि अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव हैं, इसलिए सरकार के पास किसानों की मांग मानने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।