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कृषि कानून : किसानों को भरोसे में नहीं लेना सरकार को पड़ा भारी, एक साल में आंदोलन ने देखे कई उतार-चढ़ाव

Sat, 27 Nov 2021 07:02 AM IST
योगेश साहू मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली।
मनीष मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Sat, 27 Nov 2021 07:02 AM IST
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सार
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के आंदोलन ने शुक्रवार को एक साल पूरा कर लिया। अन्नदाताओं का यह आंदोलन सिर्फ इसीलिए सफल नहीं कि केंद्र सरकार को कदम पीछे हटाकर तीनों कानून वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा, बल्कि इस समूचे आंदोलन का संचालन, इसमें शामिल संगठनों की एकता और तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद डटे रहने ने नई मिसालें गढ़ी हैं। कृषि कानून वापस होने के साथ आंदोलनकारियों ने संघर्ष को जारी रखते हुए नए लक्ष्य रख दिए हैं...
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Farm law: government suffered heavy for not taking the farmers into confidence, the movement saw many ups and downs in a year
किसान आंदोलन - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कृषि कानूनों की वापसी का फैसला मोदी सरकार कर चुकी हैं। इसके साथ ही किसानों के आंदोलन को एक साल भी पूरा हो रहा है। पिछले एक साल में किसान संगठनों ने काफी उतार चढ़ाव देखे। लेकिन एकता और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहना ही उनकी असली ताकत रही।



दरअसल, कृषि विधेयक लाने से पहले किसान संगठनों को भरोसे में न लेना सरकार को भारी पड़ गया। पंजाब-हरियाणा में शुरुआती असंतोष को दो राज्यों में सीमित मानकर नजरअंदाज कर दिया गया। केंद्र सरकार की यही रणनीतिक गलतियां अंततः कानून वापसी की वजह बनीं।


अचानक कृषि कानून बनते ही किसान समुदाय में विरोध का उबाल आ गया है। पंजाब में किसान संगठनों ने मोर्चा खोला और जगह-जगह रेलें रोकते हुए अंबानी-अडानी समूहों के प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाने लगा। हरियाणा में भी किसान संगठनों ने भी कानूनों का उग्र विरोध शुरू किया हालांकि पंजाब-हरियाणा संगठनों के सामने देशभर के किसानों को जोड़ने और सरकार पर दबाव बनाने की चुनौती थी। 

इसके लिए संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले देशभर के करीब 500 किसान संगठनों को जोड़ा गया। नतीजे में पंजाब-हरियाणा से निकलकर विरोध देशभर में फैलने लगा। किसान संगठनों को लगा कि वो राज्य में प्रदर्शन करते रहे तो केंद्र की सरकार पर दबाव बनाना मुश्किल होगा, इसी के साथ आंदोलन ने दिल्ली की ओर रुख कर लिया।

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी यूपी से चले किसानों को रास्ते में रोकने के हर संभव प्रयास हुए। हाईवे पर उनके ट्रैक्टर न निकल पाएं, इसके लिए बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गए। आंसू गैस के गोले समेत बल प्रयोग किया गया। पर किसानों को रोकना आसान नहीं था। 

आखिरकार 26 नवंबर, 2020 को पंजाब-हरियाणा के किसान दिल्ली के सिंघु बार्डर पर पहुंच गए। सुरक्षाबलों के साथ झड़पों के बाद किसानों ने यहीं पर डेरा डाल दिया। उधर, गाजीपुर बार्डर, टिकरी बार्डर और शाहजहांपुर बार्डर पर भी हिंसक झड़पों के साथ किसानों ने डेरा जमा लिया।

सरकार की पेशकश नहीं आई रास
किसानों के विशाल जमावड़े और साथ ही सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने सरकार को वार्ताओं का दौर शुरू करने पर मजबूर कर दिया। सरकार ने किसान नेताओं के दल को मिलने के लिए बुलाया और कानूनों की वापसी न करके संशोधनों पर बात करने की कोशिश की। सरकार के इस रवैये से भड़के किसानों ने तय कर लिया कि तीनों कानूनों की वापसी के बाद ही कोई बात होगी। 11 दौर की बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकल सका।

चुनावी बिसात पर संघर्ष
वार्ताओं के लंबे दौर विफल होने पर भी किसानों ने हार नहीं मानी। मोदी सरकार पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए देश भर में महापंचायतें शुरू करने के साथ ही उन राज्यों में विरोध करना शुरू किया, जहां चुनाव होने थे। संयुक्त किसान मोर्चे की बैठकें पश्चिम बंगाल में भी हुईं। इसी के साथ मिशन यूपी, मिशन पंजाब और मिशन उत्तराखंड की भी बात उठने लगी। किसान संगठनों की कोशिश थी कि किसानों के बीच ये बात पहुंचाई जाए कि सरकार किसानों की सुन नहीं रही, और ये कानून किसान विरोधी हैं। इसमें उन्हें सफलता मिली।

एकता से मिली ताकत

  • कभी एक मंच पर न आईं पंजाब की 31 जत्थेबंदियों को किसान आंदोलन ने एक कर दिया था। उन्हें डर था कि अगर ये कानून लागू हो गए तो उनके अस्तित्व पर ही संकट आ जाएगा, साथ ही पंजाब के किसानों की रीढ़ टूट जाएगी।
  • पंजाब से शुरू हुए विरोध में हरियाणा के किसानों ने भी पूरा साथ दिया। गांव-गांव बैठकें शुरू हुईं और आंदोलन की रणनीति बनने लगी।
  • देशभर के 500 संगठनों की विचारधारा भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी की एक ही मांग थी।


सियासी दलों को रखा दूर
किसान संगठनों ने इस आंदोलन से राजनीतिक दलों को दूर रखने का एलान पहले ही कर दिया था। उन्हें डर था कि कहीं ये आंदोलन राजनीति की भेंट चढ़ के खत्म ही न हो जाए। हालांकि विपक्षी दलों ने सियासी फायदा उठाने की भरपूर कोशिश की, आंदोलन स्थल पर गए भी, लेकिन किसी नेता को किसानों का मंच साझा करने की इजाजत नहीं थी।

किसान आंदोलन के बड़े चेहरे...जो छाए रहे

  • राकेश टिकैत : किसानों के ताकतवर नेता रहे महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे राकेश टिकैत (भारतीय किसान यूनियन) आंदोलन का बड़ा चेहरा बनकर उभरे।
  • योगेंद्र यादव :  मीडिया और सोशल मीडिया पर किसानों की बात को रणनीतिक तरीके से रखी।
  • जोगिंदर सिंह उगराहां : भारतीय सेना से रिटायर होने के बाद खेती की ओर रुख़ किया। 2002 में भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) का गठन किया।
  • बलबीर सिंह राजेवाल : भारतीय किसान यूनियन के संस्थापकाें में से एक। यूनियन का संविधान भी लिखा।
  • डॉक्टर दर्शनपाल : किसान संगठनों के समन्वयक के रूप में उभरे। एमबीबीएस और एमडी।
  • जगजीत सिंह डल्लेवाल :  भारतीय किसान यूनियन (एकता-सिद्धूपुर) के अध्यक्ष हैं।
  • गुरनाम सिंह चढ़ूनी : हरियाणा में आंदोलन को संभालने में चढ़ूनी की भूमिका अधिक रही।  


ये थे तीनों कृषि कानून
1. कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम -2020
किसानों को फसल बेचने की स्वतंत्रता। किसान अपनी फसलों को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति, दुकानदार, संस्था आदि को बेच सकते थे। राज्य सरकारों को मंडी के बाहर होने वाली उपज की खरीद-फरोख्त पर टैक्स वसूलने से रोक।
2. कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020
बुआई से पहले ही तय मानकों और तय कीमत के हिसाब से किसान अपनी फसल को बेच सकते थे। यह कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़ा था।
3. आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020
फसलों के भंडारण और काला बाजारी को रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1985 के तहत व्यापारी एक सीमित मात्रा में ही किसी भी कृषि उपज का भंडारण कर सकते थे। नए कृषि कानूनों में अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी कई फसलों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया।

राजनीति के केंद्र में आए किसान

कृषि कानूनों के खिलाफ सफल आंदोलन ने किसानों को फिर राजनीति के केंद्र में ला दिया है। यूपी समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा दबाव में है जिसे किसान संगठन मुफीद मौका मान रहे हैं। सभी नेताओं ने साफ किया है कि एमएसपी गारंटी कानून के साथ बिजली कानून, बैंकिंग, जमीन के मसलों और गन्ना भुगतान पर भी बात होनी चाहिए। किसान संगठन जानते हैं कि सरकार पर जो दबाव बना है और जिस तरह से किसान एकजुट हुए हैं, शायद ही आगे ऐसा मौका बने। इसलिए एक ही बार में अपनी ताकत लगा देना चाहते हैं।

पंजाब में भाकियू किसान यूनियन उगराहां के नेता जोगिंदर सिंह उगराहां के मुताबिक, बड़ी लड़ाई जीती है, बाकी मांगें भी आंदोलन का हिस्सा हैं। ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री ने बोला और हम उठ कर चल दिए। मिशन पंजाब, मिशन यूपी और उत्तराखंड को लेकर किसान नेता खुल कर नहीं बोल रहे। गुरनाम सिंह चढ़ूनी खुलकर किसानों को चुनाव में आने की सलाह दे रहे हैं, वहीं राकेश टिकैत पत्ते न खोलते हुए कहते हैं, जब चुनाव नजदीक आएगा तक साफ करेंगे कि किसान किसे समर्थन करेगा।

किसान महापंचायतों में उमड़ रही भारी भीड़ ने भाजपा को चिंता में डाल दिया है। भाजपा भले ही कृषि कानूनों की वापसी को भुनाने की कोशिश करे, लेकिन संदेश चला गया कि सरकार ने ऐसा चुनावों को देखते हुए किया। संदेश साफ है कि किसान परेशान है, सरकार सुन नहीं रही। अगर ये किसान ऐसे ही बैठे रहे और विपक्षी हवा देते रहे तो नुकसान की भरपाई बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।

एक बड़ी लड़ाई जीती है, बाकी मांगे भी आंदोलन का हिस्सा हैं। ऐसा नहीं कि प्रधानमंत्री ने बोला और हम उठ कर चल दिए। - जोगिंदर सिंह उगराहां, भाकियू किसान यूनियन उगराहां, पंजाब

मनोहर खट्टर ने कहा- मुश्किल है एमएसपी पर कानून का आना

किसान आंदोलन के चलते गरमाए राजनीतिक माहौल के बीच हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा है कि ऐसा लगता नहीं है कि एएएसपी पर कानून आएगा। खट्टर ने कहा कि ऐसा कानून बनाना संभव नहीं है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देता हो।

इसलिए क्योंकि किसी खरीदार के न होने की स्थिति पर सरकार पर यह दबाव होगा कि वह किसान की उपज खरीदे। खट्टर ने कहा कि वैसे अब तक इस मामले पर चर्चा भी नहीं हुई है और इस मामले पर कृषि अर्थशास्त्रियों में भी मतभिन्नता है।

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