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नए कृषि अध्यादेशों पर किसानों का भरोसा जीतने के लिए सरकार को बहुत कुछ करना होगा

Fri, 25 Sep 2020 08:14 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 25 Sep 2020 08:14 PM IST
सार

प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार सुबह किसानों को भरोसा दिलाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अब तक देश की सरकारों, राज्य सरकारों ने किसानों, महिलाओं से उनके उत्थान के नाम पर केवल खोखले वादे किए...

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Farm Bills 2020: The government will have to do a lot to win the trust of farmers on new agricultural ordinances
Farmers protest - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्र सरकार के लाए गए तीन नए कृषि अध्यादेशों को लेकर किसान नेता सरकार के कॉरपोरेट घरानों से संबंध को लेकर अब यह तंज कसने लगे हैं। चाहे चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह हों या वीएम सिंह किसानों से जुड़े नए अध्यादेशों को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर हैं। कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी और महासचिव रणदीप सुरजेवाला इसे केंद्र सरकार का किसानों, खेतिहर मजदूरों को बर्बाद करने का षडयंत्र बता रहे हैं। वहीं केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने मुंह पर ताला जड़ लिया है और किसान सड़क पर चक्का जाम करके बैठ गया है। ऐसे में किसानों का भरोसा जीतने के लिए केंद्र सरकार को बहुत कुछ करना होगा।

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बड़ा सवाल: किसान का सरकार पर भरोसा क्यों कमजोर हुआ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर शुक्रवार की सुबह किसानों को भरोसा दिलाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अब तक देश की सरकारों, राज्य सरकारों ने किसानों, महिलाओं से उनके उत्थान के नाम पर केवल खोखले वादे किए। प्रधानमंत्री नये कानून को लेकर कुछ नहीं बोले, लेकिन उनका संदेश साफ था कि किसान विपक्षी दलों के बहकावे में न आएं। प्रधानमंत्री से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी किसानों और उनकी किसानी से जुड़े मुद्दों पर सरकार पर भरोसा करने की अपील की। रक्षा मंत्री ने भी विपक्ष पर एमएसपी के मुद्दे को लेकर किसानों को भ्रमित न करने का आरोप लगाया। राजनाथ सिंह वाजपेयी सरकार में कृषि मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने यह भरोसा खुद को किसान परिवार का बताकर दिलाया। रक्षा मंत्री के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर भी मीडिया से मुखातिब हुए। कृषि मंत्री ने नये कानून को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के 2019 के घोषणा पत्र के अनुरूप बताया। कृषि मंत्री के पास किसानों को भरोसा देने के लिए कांग्रेस के घोषणा पत्र से बड़ा कोई मुद्दा नहीं था। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा का भी सहारा लिया, लेकिन किसान आंदोलन के लिए घर और खलिहान से बाहर निकल आए हैं।

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दोगुनी आय के लक्षण तो दिखाई नहीं दे रहे हैं?

बागपत के किसान सुधीर तोमर कहते हैं कि 2022 तक प्रधानमंत्री ने किसानों का खर्चा घटाकर आमदनी दोगुनी करने का सपना दिखाया था। अभी इसके कहीं कोई लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं। चौधरी सतेन्द्र सिंह बड़े पैमाने पर गन्ना उगाते हैं। उनका कहना है कि सरकार जब कह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा, तो इसे नये कानून में क्यों नहीं शामिल किया गया। जरूर दाल में कुछ काला है। बुलंदशहर के चौधरी अमित पाल सिंह का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश पर राज करते हुए छह साल हो गए। प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि छह साल में किसानों की हालत में कौन से सुधार आ गए। अमित पाल सिंह कहते हैं कि केवल किसानों को दोष देने, बड़े-बड़े वायदों से देश नहीं चलता।

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कोविड-19 के समय में क्यों ले आए ऐसा कानून

एक चैनल पर भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी के साथ पैनल में किसान नेता वीएम सिंह भी थे। वीएम सिंह ने कहा कि कि रमेश विधूड़ी ने बिल पास कराने में योगदान दिया और उन्हें इसके कानूनी प्रावधानों के बारे में ही नहीं पता है। वीएम सिंह का कहना है कि यही हालात भाजपा के तमाम सांसदों की है। वीएम सिंह का कहना है कि सरकार से पूछा जाना चाहिए कि कोविड-19 संक्रमण के समय में ऐसा कानून क्यों लेकर आई है? वीएम सिंह कहते हैं कि अब किसान केंद्र सरकार से छले जाने के मूड में नहीं है। पहले किसानों से केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने तमाम वादे किए। केंद्र सरकार अपने वादे पर खरी नहीं उतरी है। किसानों को गन्ना भुगतान में देरी पर ब्याज का आज भी इंतजार है। किसान नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री को बिल के बारे में बोलने से पहले एमएसपी से जुड़े अपने 2014 के भाषण को सुन लेना चाहिए।

न्यूनतम समर्थन मूल्य क्यों चाहते हैं किसान

किसान नेता वीएम सिंह का कहना है कि किसान के बीज, खाद, कीटनाशक और अन्य खर्च का आकलन करके केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। इसी मूल्य पर सरकार भी किसानों से उनके उत्पाद की खरीद करती है। इसके माध्यम से किसान के पास एक कानूनी गारंटी रहती है, लेकिन नये प्रावधान में यह गारंटी ही गायब है। केंद्र सरकार खेती-बाड़ी को कॉरपोरेट घरानों की दया पर छोड़ देना चाहती है। वीएम सिंह कहते हैं कि इससे आने वाले समय में किसान की दुर्दशा बढ़ेगी। खेत-खलिहान में अव्यवस्था बढ़ेगी।

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