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एक्सप्लेनर: कब और कैसे भारत आया मुगल बादशाह बाबर? आज ही के दिन एक गिरफ्तारी के साथ ढल गया इस सल्तनत का सूरज

Sun, 20 Sep 2026 12:47 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sun, 20 Sep 2026 12:47 PM IST
सार

बाबर से शुरू हुई मुगल सल्तनत ने करीब तीन सदियों तक भारत की सत्ता पर राज किया। कभी जिसकी हुकूमत दूर-दूर तक फैली थी, वही सल्तनत 1857 तक सिमटकर रह गई। 20 सितंबर को बहादुर शाह जफर की गिरफ्तारी के साथ इसके अंत पर मुहर लग गई। आखिर कैसे शुरू हुई थी ये सल्तनत और कहां जाकर खत्म हुई?

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Explainer: How Did Babur Establish the Mughal Empire in India? How an Arrest on This Day Marked Its End
मुगल साम्राज्य की कहानी - फोटो : NCERT

विस्तार

आज की तारीख यानी 20 सितंबर इतिहास के उस दिन की याद दिलाती है, जब भारत में करीब तीन सदियों से चली आ रही मुगल सत्ता अपने आखिरी दौर में पहुंच गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मुगल सल्तनत का आखिरी अध्याय इस दिन लिखा गया, उसकी शुरुआत आखिर कहां से हुई थी? एक शासक से शुरू हुई यह कहानी कैसे दिल्ली की सत्ता तक पहुंची, फिर धीरे-धीरे कमजोर होती गई और आखिरकार 1857 में उसका अंत कैसे हुआ? आइए जानते हैं। 

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Explainer: How Did Babur Establish the Mughal Empire in India? How an Arrest on This Day Marked Its End
मुगल साम्राज्य - फोटो : Amar Ujala

कहां से आए मुगल, भारत में कैसे शासन स्थापित किया?

(i). बाबर (1526-1530)
मुगल साम्राज्य की शुरुआत जहीरुद्दीन बाबर (1483-1530) के उदय के साथ हुई। मुगल असल में मध्य एशिया में विजय हासिल करने वाले तुर्क शासक तैमूर लंग और मंगोल शासक चंगेज खान के वंशज हैं। मुगलों का उद्गम आज के समय के उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान में माना जाता है। उस दौर में मुगलों की असली पहचान 'गुरकानियां वंश' के तौर पर होती थी। बाद में ब्रिटिश शासकों ने इतिहास में उन्हें मुगल कहा। 

बताया जाता है कि मुगलकाल की स्थापना करने वाला बाबर 12 साल की उम्र में ही उज्बेकिस्तान के एक शहर फेरगाना का शासक बन गया था। बाबर 1526 में भारत आया। भारत पहुंचने के साथ ही उसका पहला मुकाबला दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोधी से हुआ। इसे पानीपत का युद्ध कहा गया। बाबर ने इस युद्ध में जीत हासिल की और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। इसे भारत में मुगलकाल की शुरुआत और दिल्ली सल्तनत के अंत के तौर पर जाना जाता है। इस युद्ध के बाद उत्तर भारत में मुगल मजबूत ताकत बनकर उभरे। 

हालांकि, बाबर का शासन महज चार साल का ही रहा। मुगल साम्राज्य की नींव रखने के बाद 1530 में उनका निधन हो गया। 

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(ii) हुमायूं (1530-1540, 1555-1556)

बाबर की मौत के बाद मुगल शासन की गद्दी आई हुमायूं के पास। इतिहासकारों के मुताबिक, हुमायूं एक कमजोर सैन्य शासक थे। उसकी वजह यह थी कि वह युद्ध के बजाय काव्य-कविताओं के प्रति ज्यादा रुचि रखते थे। आखिरकार एक और अफगान शासक शेरशाह सूरी ने हुमायूं से भारत का शासन छीन लिया और 1540 से 1555 तक हुमायूं देश से बाहर रहे। 

हालांकि, हुमायूं ने भारत में मुगल शासन को दोबारा स्थापित करने की कोशिशें जारी रखीं। 1544 में ईरान के शाह से गठबंधन करने के बाद हुमायूं ने अपनी सेना को 1555 में वापस भारत पहुंचाया और लाहौर और दिल्ली पर हमला कर मुगल शासन को दोबारा स्थापित किया। हुमायूं की 1556 में अपने पुस्तकालय के बाहर सीढ़ियों से गिरकर मौत हो गई। 

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मुगल शासन - फोटो : NCERT

(iii) अकबर (1556-1605)

हुमायूं की मौत के बाद मुगल साम्राज्य की कमान 13 वर्षीय जलालुद्दीन अकबर के पास आई। छोटी उम्र के चलते हुमायूं के वफादार बैरम खान ने एक अभिभावक की तरह शासन चलाया। हालांकि, अकबर ने अपनी क्षमताओं और कौशल का जबरदस्त प्रदर्शन किया और हुमायूं की मौत के पांच साल बाद ही मुगल साम्राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया। 

(iv) जहांगीर (1605-1627)

अकबर के निधन के बाद मुगल साम्राज्य की गद्दी जहांगीर के पास आई। जहांगीर ने अपने शासन के करीब 22 वर्षों में काफी कम क्षेत्र पर शासन बढ़ाया। इतिहासकारों के मुताबिक, जहांगीर नशीले पदार्थों और शराब की लत का शिकार हो गया था, जिसके चलते उसके शासन के दौरान मुगल साम्राज्य में दरारें दिखने लगीं। 

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मुगल साम्राज्य - फोटो : NCERT

(v). शाहजहां (1628-1658) 

मुगल साम्राज्य को जहांगीर के नेतृत्व में मजबूती की कमी भी दिखी। दरअसल, 1627 में जहांगीर का जब निधन हुआ तो उनके कमजोर नेतृत्व की वजह से मुगल साम्राज्य का कोई वंशज तय नहीं था। ऐसे में जहांगीर के बेटों में एक जंग छिड़ गई। जहांगीर के तीसरे बेटे शाहजहां ने अपने छोटे भाई शहरयार मिर्जा को युद्ध में हराया। इतना ही नहीं शाहजहां ने अपने एक और भाई, जिसने गद्दी पर दावा ठोका, उसे मौत की सजा भी दी। शाहजहां ने इस तरह मुगल साम्राज्य पर अपना दावा मजबूत किया और 1628 में आगरा के किले में खुद को बादशाह घोषित किया। 1631 में शाहजहां की बेगम मुमताज महल के निधन के बाद मुगल शासक ने ताजमहल बनवाया था। शाहजहां ने करीब 30 साल तक शासन किया। 

(vi) औरंगजेब (1658-1707)

औरंगजेब का जन्म 1618 में हुआ। वह शाहजहां और मुमताज महल की तीसरी संतान था। औरंगजेब को दीन का काफी जानकार माना जाता था। इतना ही नहीं वह घुड़सवारी और सैन्य नेतृत्व में भी कुशल रहा। महज 16 साल की उम्र में ही शाहजहां ने उसे उज्बेक और ईरानियों के खिलाफ युद्ध करने भेज दिया। यहां अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के बाद औरंगजेब को गुजरात, मुल्तान और दक्खन के शासन के लिए भेजा। अपने शासनकाल में उसने खुद को मजबूत सैन्य शासक के तौर पर स्थापित किया।

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मुगल शासन - फोटो : Amar Ujala

(vii). बहादुर शाह (1707-1712) और अन्य

औरंगजेब के बाद शुरू हुआ मुगल साम्राज्य का पतन। दरअसल, औरंगजेब के बेटे बहादुर शाह-1 ने अपने पिता की धार्मिक नीतियों को वापस ले लिया और सुधारवादी प्रशासन शुरू किया। मुगलकाल में बहादुर शाह के कई प्रतिद्वंद्वियों ने इसे कमजोर नेतृत्व कहा। 1712 में जब बहादुर शाह का निधन हुआ तब मुगल साम्राज्य में उथल-पुथल मच गई। सात साल तक मुगल शासन में गद्दी को लेकर जंग चलती रही। 

(viii). मोहम्मद शाह (1719-1748)

आखिरकार 1719 में मोहम्मद शाह ने सत्ता हासिल की। हालांकि, 1748 तक चले उसके शासन में मुगल साम्राज्य बिखरने लगा। 1739 में ईरान के शासक नादिर शाह के हमले में दिल्ली को लूटा गया और इससे मुगल शासकों की ताकत और कमजोर हो गई। मध्य भारत के अधिकतर क्षेत्र में मराठा साम्राज्य फिर से स्थापित हो गया। मोहम्मद शाह का शासन खत्म होने के बाद अगले 11 वर्षों तक आंतरिक राजनीति और संघर्षों की वजह से बिखरे हुए मुगल साम्राज्य को कोई शासक नहीं मिला। 

शाह आलम-II: जब मुगल बादशाह को अंग्रेजों से सहारा लेना पड़ा

1759 में शाह आलम-II मुगल बादशाह बने। उस समय तक मुगल सत्ता काफी कमजोर हो चुकी थी। दिल्ली के आसपास मराठों का प्रभाव बढ़ रहा था और अफगान शासक अहमद शाह दुर्रानी भी उत्तर भारत की राजनीति में सक्रिय थे।

1761 में तीसरा पानीपत युद्ध मराठों और अहमद शाह दुर्रानी के नेतृत्व वाली अफगान सेना के बीच हुआ। इस युद्ध में अफगानों की जीत हुई। इसके बाद मुगल बादशाह की स्थिति और कमजोर होती गई। दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी लगातार अपनी राजनीतिक और सैन्य ताकत बढ़ा रही थी।

1764 का बक्सर युद्ध: कहानी में आया बड़ा मोड़

मुगल सत्ता और अंग्रेजी कंपनी के बीच संबंधों को समझने के लिए 1764 का बक्सर का युद्ध बेहद महत्वपूर्ण है। इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल बादशाह शाह आलम-II की संयुक्त सेना को हराया। इसके अगले साल, 1765 में इलाहाबाद की संधि हुई। इसके तहत शाह आलम-II ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, यानी राजस्व वसूली का अधिकार दिया।

यहीं से तस्वीर तेजी से बदलने लगी, जिस मुगल सत्ता के अधीन कभी विशाल क्षेत्र था, उसी मुगल सम्राट के नाम से कंपनी को एक बड़े इलाके से राजस्व वसूलने का अधिकार मिला।

शाह आलम-II के बाद कौन आया?

1806 में शाह आलम-II की मृत्यु हुई। इसके बाद उनके बेटे अकबर-II (1806–1837) मुगल बादशाह बने। लेकिन अब मुगल बादशाह की वास्तविक राजनीतिक शक्ति बहुत सीमित हो चुकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी दिल्ली और उसके आसपास निर्णायक शक्ति बन चुकी थी।

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बहादुर शाह जफर (आखिरी मुगल शासक) - फोटो : NCERT

अकबर-II के बाद बहादुर शाह-II

1837 में अकबर-II की मृत्यु के बाद उनके बेटे बहादुर शाह-II मुगल बादशाह बने। इन्हें इतिहास में बहादुर शाह जफर के नाम से जाना जाता है। लेकिन बहादुर शाह जफर के समय तक मुगल बादशाह के पास पुराने साम्राज्य जैसी राजनीतिक या सैन्य शक्ति नहीं बची थी। वे मुख्य रूप से दिल्ली के लाल किले तक सीमित एक प्रतीकात्मक सम्राट थे।

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1857 का विद्रोह - फोटो : NCERT

1857 में फिर क्यों याद आया मुगल बादशाह?

फिर आया 1857 का विद्रोह। 10 मई 1857 को मेरठ में कंपनी की सेना के भारतीय सैनिकों ने विद्रोह किया। विद्रोही दिल्ली पहुंचे और वहां बहादुर शाह जफर को अपना नेता स्वीकार किया। उस वक्त शाह की उम्र 80 साल से ज्यादा थी। 

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि मुगल बादशाह की वास्तविक शक्ति भले ही खत्म हो चुकी थी, लेकिन उनका नाम अभी भी एक बड़े राजनीतिक प्रतीक के रूप में मौजूद था। 

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1857 का विद्रोह - फोटो : NCERT

सितंबर 1857: अंग्रेजों ने दिल्ली वापस ले ली

14 सितंबर 1857 को ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर निर्णायक हमला शुरू किया। इसके बाद कई दिनों तक शहर में लड़ाई चली और सितंबर के तीसरे सप्ताह तक अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस दौरान बहादुर शाह जफर ने लाल किला छोड़ दिया और अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ हुमायूं के मकबरे में चले गए। अब बहादुर शाह जफर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि वह कहां जाएं। 

20 सितंबर 1857 को ब्रिटिश अधिकारी विलियम हडसन हुमायूं के मकबरे पहुंचे और बहादुर शाह जफर को उनके तीनों बेटों के साथ गिरफ्तार किया। और इसी दिन भारत से मुगल साम्राज्य का अंत हो गया।

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