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क्या बंगाल में बदलेगी विपक्ष की सियासी तस्वीर?: नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस के साथ ममता, किया ये बड़ा इशारा
Sun, 20 Sep 2026 12:25 PM IST
देवेश त्रिपाठी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Sun, 20 Sep 2026 12:25 PM IST
सार
नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया घटनाक्रम सामने आया है। ममता बनर्जी के गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के नामांकन वापस लेने के बाद ममता ने कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन दिया। उन्होंने कांग्रेस को 'स्वाभाविक सहयोगी' बताते हुए इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की बात कही।
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पश्चिम बंगाल उपचुनाव
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देना राज्य की विपक्षी राजनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब तृणमूल कांग्रेस अपने संगठन से जुड़े गंभीर संकट का सामना कर रही है।
ममता बनर्जी की अगुआई वाले गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से कोलकाता में मुलाकात के बाद 6 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से नाम वापस ले लिया। इसके कुछ घंटे बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का एलान किया।
चुनाव आयोग से ममता और ऋतब्रत गुट को लगा था झटका
इससे पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के अंदर चल रहे विवाद के बीच पार्टी के पारंपरिक नाम और 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया था। आयोग ने उपचुनाव के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं।
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18 सितंबर को कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा करते हुए ममता बनर्जी ने कांग्रेस को 'करीबी पार्टी' और 'स्वाभाविक सहयोगी' बताया था। उन्होंने कहा था कि यह फैसला देश के व्यापक हित और इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए लिया गया है। ममता ने यह भी कहा था कि वह बंगाल से विपक्षी गठबंधन के भविष्य को लेकर संदेश देना चाहती हैं।
ममता बनर्जी ने कांग्रेस को समर्थन का क्यों किया एलान?
हालांकि, इस समर्थन का समय इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। ममता गुट ने शुरुआत में नंदीग्राम में अपना उम्मीदवार उतारा था और उम्मीदवार के मैदान से हटने के बाद ही कांग्रेस को समर्थन दिया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, इससे भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने की कोशिश के साथ-साथ मौजूदा मुश्किल दौर में ममता गुट की राजनीतिक रणनीति भी सामने आती है।
ममता के समर्थन के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। बाद में उन्हें 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
क्या है तृणमूल कांग्रेस के बनने की कहानी?
ममता बनर्जी खुद कांग्रेस से अलग होकर 1990 के दशक के आखिर में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। उनका उद्देश्य वाम मोर्चे को चुनौती देना और कांग्रेस के उस रुख का विरोध करना था, जिसे वह वाम मोर्चे के खिलाफ अपर्याप्त मानती थीं। हालांकि, बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के सामने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस समय-समय पर फिर साथ आए हैं। 2001 के बंगाल विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों ने गठबंधन किया।
2011 में यह गठबंधन अपने महत्वपूर्ण दौर में पहुंचा, जब कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने मिलकर बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल लंबे शासन को खत्म किया। बाद में नीतियों, सीटों के बंटवारे और राज्य सरकार के कामकाज को लेकर मतभेद बढ़े और दोनों दलों की साझेदारी टूट गई।
बंगाल में कांग्रेस से क्यों बिगड़े ममता बनर्जी के संबंध?
ममता बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान दोनों दलों के बीच संबंध और तनावपूर्ण हुए। कांग्रेस नेताओं ने बार-बार आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस ने उनके संगठन को राजनीतिक रूप से कमजोर किया। वहीं, तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस को कमजोर ताकत बताती रही और आरोप लगाती रही कि उसके कमजोर होने से भाजपा और वाम दलों को फायदा हुआ।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, नंदीग्राम में कांग्रेस को समर्थन सामान्य उपचुनाव गणित से आगे का घटनाक्रम है। यह ऐसा मौका है जब ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से बंगाल में भाजपा विरोधी चुनावी रणनीति के केंद्र में कांग्रेस को रखा है।
ममता के समर्थन को लेकर क्या है कांग्रेस का रुख?
हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तत्काल राजनीतिक नजदीकी की संभावना को कम करके बताया। ममता के फैसले पर उन्होंने कहा कि उन्हें कांग्रेस का समर्थन 'गिरे हुए पत्ते की तरह नहीं, बल्कि बरगद के पेड़ का हाथ थामकर' करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के पुनरुत्थान को पहचाना जाना चाहिए।
चौधरी ने कहा, "समर्थन के समय पर ध्यान देना चाहिए। यह उनके उम्मीदवार के चुनाव मैदान से हटने के बाद हुआ। अब उनके पास 'फुटबॉल खिलाड़ी' का चुनाव चिह्न है, लेकिन उनके पास अपना खेल खेलने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं है।" उन्होंने कहा, "इसीलिए वह हमारे पास आई हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि हम ही तीसरी ताकत हैं जिसमें भाजपा का मुकाबला करने की क्षमता है।"
ममता बनर्जी को लेकर कांग्रेस में अलग-अलग सुर क्यों?
हालांकि, बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अलग रुख रखा। उन्होंने कहा, "राज्य के भाजपा विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक आधार से मिलने वाले किसी भी समर्थन का कांग्रेस स्वागत करती है। यह राहुल गांधी के नेतृत्व में भगवा गठजोड़ के खिलाफ हमारी लड़ाई को पहचानने वाला समर्थन होगा।"
उन्होंने कहा, "कौन जानता है, बंगाल में यह घटनाक्रम विपक्ष के लिए एक नया राजनीतिक रास्ता खोल सकता है और सहयोग का एक अलग आधार तैयार कर सकता है।" कांग्रेस नेताओं ने मिलन प्रधान की गिरफ्तारी की आलोचना की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया और कहा कि पार्टी 'लड़ेगी और जीतेगी'।
भाजपा ने कसा ममता के फैसले पर तंज
वहीं, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने संभावित विपक्षी समझौते को खारिज करते हुए कहा, "शून्य में शून्य जोड़ने पर परिणाम केवल शून्य ही होगा।" उन्होंने कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं और किसी गठबंधन से दोनों दलों को दोबारा मजबूत नहीं किया जा सकेगा।
ममता बनर्जी और उनके गुट के लिए नंदीग्राम का फैसला व्यापक भाजपा विरोधी मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश हो सकता है। वहीं, कांग्रेस को समर्थन देकर ममता खुद को केवल तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में एक गुट की नेता के बजाय राष्ट्रीय विपक्षी नेता के रूप में पेश कर सकती हैं, ऐसा राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है।
उपचुनाव को लेकर क्या बोले रहे सियासी जानकार?
वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत भट्टाचार्य ने कहा, "दोनों पक्षों के बीच कोई प्रेम नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी किसी सहारे को पकड़ने की कोशिश करती दिख रही हैं।" उन्होंने कहा, "लेकिन चूंकि दोनों पक्ष राजनीतिक जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यह व्यवस्था फिलहाल दोनों के लिए फायदेमंद हो सकती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि उसे ममता की बची हुई लोकप्रियता से लाभ मिलेगा।"
इस घटनाक्रम का बड़ा सवाल इंडिया गठबंधन से जुड़ा है। ममता का कांग्रेस को 'स्वाभाविक सहयोगी' बताना और विपक्ष से मिलकर लड़ने की अपील करना ऐसे समय में आया है जब गठबंधन के घटकों के बीच मतभेदों ने कई बार भाजपा विरोधी अभियान को कमजोर किया है।
हालांकि, नंदीग्राम का यह घटनाक्रम अकेले दोनों दलों के बीच वर्षों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और अविश्वास को खत्म नहीं कर सकता। कांग्रेस बंगाल में स्वतंत्र रूप से अपना संगठन मजबूत करने की कोशिश जारी रखे हुए है, जबकि ममता बनर्जी राज्य में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख भूमिका को कमजोर करने वाली किसी भी व्यवस्था का ऐतिहासिक रूप से विरोध करती रही हैं।
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ममता बनर्जी की अगुआई वाले गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से कोलकाता में मुलाकात के बाद 6 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से नाम वापस ले लिया। इसके कुछ घंटे बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का एलान किया।
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चुनाव आयोग से ममता और ऋतब्रत गुट को लगा था झटका
इससे पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के अंदर चल रहे विवाद के बीच पार्टी के पारंपरिक नाम और 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया था। आयोग ने उपचुनाव के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं।
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18 सितंबर को कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा करते हुए ममता बनर्जी ने कांग्रेस को 'करीबी पार्टी' और 'स्वाभाविक सहयोगी' बताया था। उन्होंने कहा था कि यह फैसला देश के व्यापक हित और इंडिया गठबंधन को मजबूत करने के लिए लिया गया है। ममता ने यह भी कहा था कि वह बंगाल से विपक्षी गठबंधन के भविष्य को लेकर संदेश देना चाहती हैं।
ममता बनर्जी ने कांग्रेस को समर्थन का क्यों किया एलान?
हालांकि, इस समर्थन का समय इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। ममता गुट ने शुरुआत में नंदीग्राम में अपना उम्मीदवार उतारा था और उम्मीदवार के मैदान से हटने के बाद ही कांग्रेस को समर्थन दिया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, इससे भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने की कोशिश के साथ-साथ मौजूदा मुश्किल दौर में ममता गुट की राजनीतिक रणनीति भी सामने आती है।
ममता के समर्थन के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को 2007 के नंदीग्राम भूमि आंदोलन से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें जेल भेज दिया गया। बाद में उन्हें 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
क्या है तृणमूल कांग्रेस के बनने की कहानी?
ममता बनर्जी खुद कांग्रेस से अलग होकर 1990 के दशक के आखिर में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। उनका उद्देश्य वाम मोर्चे को चुनौती देना और कांग्रेस के उस रुख का विरोध करना था, जिसे वह वाम मोर्चे के खिलाफ अपर्याप्त मानती थीं। हालांकि, बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के सामने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस समय-समय पर फिर साथ आए हैं। 2001 के बंगाल विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ चुनाव लड़ा था। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भी दोनों ने गठबंधन किया।
2011 में यह गठबंधन अपने महत्वपूर्ण दौर में पहुंचा, जब कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने मिलकर बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल लंबे शासन को खत्म किया। बाद में नीतियों, सीटों के बंटवारे और राज्य सरकार के कामकाज को लेकर मतभेद बढ़े और दोनों दलों की साझेदारी टूट गई।
बंगाल में कांग्रेस से क्यों बिगड़े ममता बनर्जी के संबंध?
ममता बनर्जी के 15 साल के शासन के दौरान दोनों दलों के बीच संबंध और तनावपूर्ण हुए। कांग्रेस नेताओं ने बार-बार आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस ने उनके संगठन को राजनीतिक रूप से कमजोर किया। वहीं, तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस को कमजोर ताकत बताती रही और आरोप लगाती रही कि उसके कमजोर होने से भाजपा और वाम दलों को फायदा हुआ।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, नंदीग्राम में कांग्रेस को समर्थन सामान्य उपचुनाव गणित से आगे का घटनाक्रम है। यह ऐसा मौका है जब ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से बंगाल में भाजपा विरोधी चुनावी रणनीति के केंद्र में कांग्रेस को रखा है।
ममता के समर्थन को लेकर क्या है कांग्रेस का रुख?
हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने तत्काल राजनीतिक नजदीकी की संभावना को कम करके बताया। ममता के फैसले पर उन्होंने कहा कि उन्हें कांग्रेस का समर्थन 'गिरे हुए पत्ते की तरह नहीं, बल्कि बरगद के पेड़ का हाथ थामकर' करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के पुनरुत्थान को पहचाना जाना चाहिए।
चौधरी ने कहा, "समर्थन के समय पर ध्यान देना चाहिए। यह उनके उम्मीदवार के चुनाव मैदान से हटने के बाद हुआ। अब उनके पास 'फुटबॉल खिलाड़ी' का चुनाव चिह्न है, लेकिन उनके पास अपना खेल खेलने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं है।" उन्होंने कहा, "इसीलिए वह हमारे पास आई हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि हम ही तीसरी ताकत हैं जिसमें भाजपा का मुकाबला करने की क्षमता है।"
ममता बनर्जी को लेकर कांग्रेस में अलग-अलग सुर क्यों?
हालांकि, बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अलग रुख रखा। उन्होंने कहा, "राज्य के भाजपा विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक आधार से मिलने वाले किसी भी समर्थन का कांग्रेस स्वागत करती है। यह राहुल गांधी के नेतृत्व में भगवा गठजोड़ के खिलाफ हमारी लड़ाई को पहचानने वाला समर्थन होगा।"
उन्होंने कहा, "कौन जानता है, बंगाल में यह घटनाक्रम विपक्ष के लिए एक नया राजनीतिक रास्ता खोल सकता है और सहयोग का एक अलग आधार तैयार कर सकता है।" कांग्रेस नेताओं ने मिलन प्रधान की गिरफ्तारी की आलोचना की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया और कहा कि पार्टी 'लड़ेगी और जीतेगी'।
भाजपा ने कसा ममता के फैसले पर तंज
वहीं, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने संभावित विपक्षी समझौते को खारिज करते हुए कहा, "शून्य में शून्य जोड़ने पर परिणाम केवल शून्य ही होगा।" उन्होंने कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रहे हैं और किसी गठबंधन से दोनों दलों को दोबारा मजबूत नहीं किया जा सकेगा।
ममता बनर्जी और उनके गुट के लिए नंदीग्राम का फैसला व्यापक भाजपा विरोधी मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश हो सकता है। वहीं, कांग्रेस को समर्थन देकर ममता खुद को केवल तृणमूल के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में एक गुट की नेता के बजाय राष्ट्रीय विपक्षी नेता के रूप में पेश कर सकती हैं, ऐसा राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है।
उपचुनाव को लेकर क्या बोले रहे सियासी जानकार?
वरिष्ठ पत्रकार बिस्वजीत भट्टाचार्य ने कहा, "दोनों पक्षों के बीच कोई प्रेम नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी किसी सहारे को पकड़ने की कोशिश करती दिख रही हैं।" उन्होंने कहा, "लेकिन चूंकि दोनों पक्ष राजनीतिक जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यह व्यवस्था फिलहाल दोनों के लिए फायदेमंद हो सकती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि उसे ममता की बची हुई लोकप्रियता से लाभ मिलेगा।"
इस घटनाक्रम का बड़ा सवाल इंडिया गठबंधन से जुड़ा है। ममता का कांग्रेस को 'स्वाभाविक सहयोगी' बताना और विपक्ष से मिलकर लड़ने की अपील करना ऐसे समय में आया है जब गठबंधन के घटकों के बीच मतभेदों ने कई बार भाजपा विरोधी अभियान को कमजोर किया है।
हालांकि, नंदीग्राम का यह घटनाक्रम अकेले दोनों दलों के बीच वर्षों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और अविश्वास को खत्म नहीं कर सकता। कांग्रेस बंगाल में स्वतंत्र रूप से अपना संगठन मजबूत करने की कोशिश जारी रखे हुए है, जबकि ममता बनर्जी राज्य में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख भूमिका को कमजोर करने वाली किसी भी व्यवस्था का ऐतिहासिक रूप से विरोध करती रही हैं।