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एक्सप्लेनर: भजन क्लबिंग में दिखे प्रधानमंत्री मोदी, क्या है भक्ति और कॉन्सर्ट के मेल का ये नया ट्रेंड?

Sat, 26 Sep 2026 05:04 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sat, 26 Sep 2026 05:04 PM IST
सार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दिल्ली में आयोजित भजन क्लबिंग कार्यक्रम में शामिल हुए। भजन क्लबिंग में पारंपरिक भजनों को कॉन्सर्ट जैसे माहौल में पेश किया जाता है। खासकर युवा इसमें भक्ति, संगीत और सामूहिक जुड़ाव का नया अनुभव तलाश रहे हैं। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं। 

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Explainer: PM Modi Seen at Bhajan Clubbing Event, What Is This New Blend of Devotion and Concert Culture?
भजन क्लबिंग - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय पार्क में आयोजित एक भजन क्लबिंग में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद लोगों के साथ भजन का आनंद लिया। ये आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले जनवरी में 'मन की बात' कार्यक्रम में भी भजन क्लबिंग का जिक्र कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि भारत में भजन और कीर्तन सदियों से संस्कृति की आत्मा रहे हैं। मंदिरों और कथाओं में भजन सुने जाते रहे हैं और हर दौर में लोगों ने अपने समय के अनुसार भक्ति को अपनाया है। अब नई पीढ़ी भक्ति को अपने अनुभवों और जीवनशैली से जोड़ रही है। इसी सोच से एक नया सांस्कृतिक चलन सामने आया है, जिसे 'भजन क्लबिंग' कहा जा रहा है।

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ऐसे में आइए जानते हैं कि भजन क्लबिंग क्या है? युवाओं में इसकी दिलचस्पी क्यों बढ़ रही है? भजन-कीर्तन की परंपरा का इतिहास क्या है? इसका क्या असर माना जाता है? भजन क्लबिंग में इससे कैसे अलग है? धार्मिक और आध्यात्मिक बाजार की क्या स्थिति है?

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Explainer: PM Modi Seen at Bhajan Clubbing Event, What Is This New Blend of Devotion and Concert Culture?
भजन क्लबिंग - फोटो : अमर उजाला

भजन क्लबिंग से क्या समझते हैं?

भजन क्लबिंग में भक्ति संगीत को आधुनिक कॉन्सर्ट जैसे माहौल में पेश किया जाता है। देश के अलग-अलग शहरों में युवा ऐसे आयोजनों में पहुंच रहे हैं। मंच को रोशनी और संगीत से सजाया जाता है और पूरा माहौल किसी बड़े कॉन्सर्ट जैसा दिखाई देता है, लेकिन यहां गाए जाने वाले गीत भजन होते हैं।

इन आयोजनों में आधुनिक संगीत वाद्ययंत्रों और स्टेज सेटअप के बीच कबीर के दोहे और मीरा के भजन भी सुनाई देते हैं। यानी प्रस्तुति का अंदाज आधुनिक है, जबकि संगीत का आधार पारंपरिक भक्ति है।

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, मंच की सजावट, रोशनी और संगीत का अंदाज आधुनिक हो सकता है, लेकिन भजनों की भावना और उनके अर्थ को बनाए रखा जाता है।

युवाओं में क्यों बढ़ रही है दिलचस्पी?

भजन क्लबिंग में युवाओं की भागीदारी खास तौर पर दिखाई दे रही है। 'बैकस्टेज सिब्लिंग्स' से जुड़े राघव के मुताबिक, उनके कार्यक्रमों में आने वाले दर्शकों में 18 से 28 वर्ष की उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 85 फीसदी है।

राघव के अनुसार, भजन क्लबिंग के जरिए देश की कला और संस्कृति का संदेश लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से युवा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भजनों से मिलने वाले सुकून और उनसे मिलने वाली सीख को समझ रहे हैं।

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भजन-कीर्तन की परंपरा का इतिहास क्या है?

भजन और कीर्तन की परंपरा भारत में किसी एक समय या किसी एक व्यक्ति से शुरू नहीं हुई। इसका विकास लंबे समय में भक्ति, कविता और संगीत के मेल से हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संतों और भक्त कवियों ने अपने आराध्य के प्रति भक्ति को गीत और सामूहिक गायन के जरिए व्यक्त किया।

भारत सरकार के सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज एंड ट्रेनिंग यानी सीसीआरटी के अनुसार, दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्र में छठी-सातवीं शताब्दी के दौरान वैष्णव भक्ति साहित्य की मजबूत परंपरा विकसित हुई। इस दौर में 12 अलवार संत-कवियों ने भगवान विष्णु की भक्ति में गीतों की रचना की। इसी तरह छठी से आठवीं शताब्दी के बीच नयनार संत-कवियों ने भगवान शिव की स्तुति में भक्ति गीत लिखे।

इन रचनाओं के जरिए भक्ति को गीत और भावनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से लोगों तक पहुंचाया गया। मध्यकाल तक भक्ति साहित्य लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में फैला।

मध्यकाल में भक्ति संगीत का विस्तार

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के साथ भक्ति-काव्य और संगीत का दायरा भी बढ़ा। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं में देवी-देवताओं की स्तुति से जुड़े पद और गीत रचे जाने लगे।

ब्रज क्षेत्र में इस परंपरा ने विशेष रूप लिया। भारत सरकार के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र यानी आईजीएनसीए के अनुसार, 14वीं, 15वीं और 16वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के दौरान ब्रज में भक्ति-संगीत का महत्वपूर्ण विकास हुआ। पुष्टिमार्ग की उपासना पद्धति में कीर्तन को संगीत और दूसरी कलाओं के साथ जोड़ा गया।

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चैतन्य महाप्रभु के दौर में कीर्तन

15वीं-16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु की वैष्णव भक्ति परंपरा में कीर्तन को विशेष महत्व मिला। आईजीएनसीए के ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार, चैतन्य की परंपरा में कीर्तन संगीत और गायन के माध्यम से भक्ति का एक प्रमुख रूप था। इसे सार्वजनिक रूप से भी किया जाता था।

इस परंपरा में सामूहिक गायन और नाम-स्मरण महत्वपूर्ण हिस्सा बने। यही सामूहिक स्वरूप आगे संकीर्तन और नगरकीर्तन जैसी परंपराओं में दिखाई देता है।

ब्रज और वृंदावन में भजन-कीर्तन

16वीं शताब्दी में वृंदावन एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। आईजीएनसीए के अनुसार, वैष्णव भक्ति के प्रभाव से यहां भजन, कीर्तन, ध्रुपद, रासलीला और अन्य भक्ति-कला रूपों का विकास हुआ।

ब्रज की परंपरा में कृष्ण भक्ति से जुड़े पदों और गीतों को संगीत के साथ प्रस्तुत करने की परंपरा मजबूत हुई। आईजीएनसीए के अनुसार, चैतन्य महाप्रभु, उनके शिष्य रूप और सनातन व हित हरिवंश जैसे संतों ने वृंदावन को केंद्र बनाकर कीर्तन-भक्ति के प्रसार में भूमिका निभाई।

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भजन क्लबिंग में पीएम मोदी - फोटो : IANS

भजन-कीर्तन की परंपरा में क्या बदला?

भक्ति की इस परंपरा में गीत, संगीत और स्थानीय भाषाओं के जरिए धार्मिक भावनाओं को लोगों तक पहुंचाया गया। इससे भक्ति की अभिव्यक्ति केवल शास्त्रीय या संस्कृत साहित्य तक सीमित नहीं रही।

अलग-अलग क्षेत्रों ने इसे अपनी भाषा और संगीत शैली के अनुसार अपनाया। कहीं कृष्ण और राधा की भक्ति के पद लोकप्रिय हुए, तो कहीं राम, शिव या दूसरे आराध्यों की स्तुति गीतों के माध्यम से की गई।

चैंटिंग और उसका असर क्या होता है?

फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी के अनुसार, चैंटिंग यानी किसी ध्वनि या मंत्र को दोहराना दुनिया की कई संस्कृतियों में प्रचलित एक प्राचीन चिंतन और आध्यात्मिक अभ्यास है। आज भी यह योग, बौद्ध धर्म, सूफी परंपरा, शमनवाद और हिंदू धर्म जैसी परंपराओं में धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का हिस्सा है।

चैंटिंग में व्यक्ति का ध्यान दोहराई जा रही ध्वनि पर केंद्रित होता है। इसमें लय, दोहराव और सामूहिक स्वर जैसे संगीत के तत्व शामिल हो सकते हैं।

शोध के अनुसार, वोकल चैंटिंग तनाव, मूड, चिंता, अवसाद और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जुड़े लक्षणों में सुधार करता है। इसके अलावा, चैंटिंग सामाजिक कल्याण, सामाजिक जुड़ाव और परोपकारी व्यवहार को भी बढ़ावा देता है।

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भजन क्लबिंग - फोटो : Amar Ujala

भजन क्लबिंग में कैसा माहौल होता है?

बंगलूरू से मुंबई और दिल्ली से पुणे तक युवा ऐसे आयोजनों में पहुंच रहे हैं। ये कार्यक्रम पारंपरिक धार्मिक आयोजन की तुलना में कॉन्सर्ट जैसे दिखाई देते हैं। अंधेरे ऑडिटोरियम या कॉन्सर्ट हॉल में तेज रोशनी, सजा हुआ मंच और आधुनिक साउंड सिस्टम का इस्तेमाल होता है।

इन आयोजनों में सामूहिक गायन और भक्ति का अनुभव होता है। कृष्ण, शिव और राम से जुड़े भक्ति गीत आधुनिक साउंड सिस्टम और स्टेज लाइटिंग के बीच प्रस्तुत किए जाते हैं।

जेन जी और भक्ति का नया अनुभव

भजन क्लबिंग को जेन जी के बीच अपनी जड़ों, जुड़ाव और अर्थ की तलाश से भी जोड़ा जा रहा है। डिजिटल शोर, लगातार भागदौड़ और उपभोक्तावादी जीवनशैली से पैदा होने वाली थकान के बीच कुछ युवा ऐसे आयोजनों में शांति और जुड़ाव तलाश रहे हैं। यहां आध्यात्मिकता को एक ऐसे सामाजिक अनुभव के रूप में पेश किया जा रहा है, जिसमें संगीत, सामूहिकता और भक्ति साथ दिखाई देते हैं।

Explainer: PM Modi Seen at Bhajan Clubbing Event, What Is This New Blend of Devotion and Concert Culture?
एमटीवी यूथ स्टडी क्या कहती है? - फोटो : Amar Ujala

सोशल मीडिया से बढ़ी पहुंच

भजन क्लबिंग के वीडियो सोशल मीडिया पर भी सामने आ रहे हैं। इन आयोजनों के वीडियो वायरल हो रहे हैं और इनके जरिए नई पीढ़ी तक भक्ति संगीत और सांस्कृतिक विरासत की पहुंच बढ़ रही है।

आयोजकों के अनुसार, अलग-अलग शहरों में होने वाले ये कार्यक्रम बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। टिकट वाले आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भी दर्शकों की भागीदारी बढ़ने की बात कही गई है।

अलग-अलग पीढ़ियों को जोड़ता मंच

भजन क्लबिंग की एक खास बात इसकी समावेशिता भी बताई गई है। इन आयोजनों को पारिवारिक कार्यक्रम के रूप में भी देखा जा रहा है, जहां अलग-अलग पीढ़ियों के लोग एक साथ शामिल हो सकते हैं।

ऐसे माहौल में एक दादी अपने पोते के साथ भजन गा और झूम सकती है। यानी एक ही मंच पर अलग-अलग उम्र के लोग भक्ति संगीत का हिस्सा बन सकते हैं।

अध्यात्म को लेकर भारत के जेन जी की सोच क्या है?

अध्यात्म को लेकर भारत के जेन जी की तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। एमटीवी यूथ स्टडी के मुताबिक, भारत के 62 फीसदी जेन जी युवाओं का मानना है कि अध्यात्म उन्हें चीजों को बेहतर तरीके से समझने और स्पष्टता हासिल करने में मदद करता है। वहीं करीब 70 फीसदी युवाओं ने कहा कि प्रार्थना करने के बाद वे खुद को ज्यादा आत्मविश्वासी और अपने जीवन पर नियंत्रण में महसूस करते हैं।

बढ़ रहा है धार्मिक और आध्यात्मिक बाजार

भारत का धार्मिक और आध्यात्मिक बाजार भी बढ़ रहा है। आईएमएआरसी समूह के आंकड़ों के मुताबिक, यह बाजार 2025 में 70.14 अरब डॉलर का था, जो 2026 में बढ़कर 75.50 अरब डॉलर हो गया। इसके 2034 तक 135.41 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2026 से 2034 के बीच इसके 7.58 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने का अनुमान है।

लाइव एंटरटेनमेंट से जुड़ रहा आध्यात्मिक अनुभव

बुकमायशो और ईवाई-पार्थेनन की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का लाइव इवेंट बाजार करीब 13,000 करोड़ रुपये का है। इसमें कॉन्सर्ट, फेस्टिवल, कॉमेडी टूर और सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे लाइव अनुभव शामिल हैं।

बुकमायशो-ईवाई पार्थेनन से जुड़े प्रकाशित विवरणों में इस बाजार में आध्यात्मिक अनुभव और समुदाय आधारित कार्यक्रमों को भी व्यापक लाइव-इवेंट परिदृश्य का हिस्सा बताया गया है। इस बाजार के 2028 तक करीब 19,600 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

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