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Exoskeletons Suits: जल्द ही 'आयरनमैन सूट' पहने दिखाई देंगे भारतीय सैनिक, आसानी से उठा सकेंगे भारी वजन!
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Indian Army
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Amar Ujala
विस्तार
भारतीय सेना के लिए यह साल बेहद अहम है, क्योंकि 2024 सेना की तकनीकी तरक्की का साल है, जिसे 'ईयर ऑफ द टेक्नोलॉजी अब्जॉर्प्शन' के तौर पर मनाया जा रहा है। भारतीय सेना के हर वर्टिकल में टेक्नोलॉजी को शामिल किया जा रहा है, लॉजिस्टिक्स से लेकर हथियार बनाने तक में टेक्नोलॉजी पर विशेष फोकस किया जा रहा है। वहीं, भारतीय सेना हाई एल्टीट्यूड इलाकों में तैनात जवानों तक रसद पहुंचाने के लिए एक्सोस्केलेटन सूट्स और रोबोटिक म्यूल्स यानी रोबोटिक खच्चरों की मदद लेने जा रही है। एक्सोस्केलेटन सूट पहन कर आसानी से पर्वतीय इलाकों में तैनात जवानों तक रसद और भारी सामान पहुंचाया जा सकेगा। सेना ने इन खास सूट्स का ट्रायल भी पूरा कर लिया है और जल्द ही इन्हें सेना में शामिल किया जाएगा।
लॉजिस्टिक्स में बेहद कारगर होंगे एक्सोस्केलेटन सूट
भारतीय सैनिक जल्द ही 'आयरनमैन' जैसे सूट पहने दिखेंगे। इन सूट्स की खासियत यह होगी कि इन्हें पहनने के बाद सैनिकों की उत्पादकता और सहनशक्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी, साथ ही मस्कुलोस्केलेटल चोटों का जोखिम भी कम होगा। वहीं लॉजिस्टिक्स में ये सूट बेहद कारगर साबित होंगे। क्योंकि इन्हें पहनने के बाद आसानी से भारी सामान जैसे रसद, हथियार औऱ गोलाबारूद भी आसानी से हाई एल्टीट्यूड इलाकों में सेना की फॉरवर्ड पोस्ट तक पहुंचाए जा सकेंगे, जहां अभी तक खच्चरों की मदद ली जाती है।
सूट से चोट का खतरा भी कम होगा
सेना के वरिष्ठ सूत्रों ने बताया कि पहाड़ी इलाकों में अंतिम मील तक की कनेक्टिविटी बनाए रखने के लिए धीरे-धीरे एनिमल ट्रांसपोर्ट की जगह ट्रकों, ऑल टेरेन और रग्ड टेरेन व्हीकल्स ले रहे हैं। वहीं जहां तक इनकी पहुंच खत्म हो जाती है, वहां दिक्कत पैदा होती है। ऐसे में एक्सोस्केलेटन सूट पहन कर जवान ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में तेज रफ्तार के साथ अतिरिक्त भार भी उठा सकेंगे। इन सूटों को पहन कर चलने में न केवल आसानी होगी, बल्कि चोट का खतरा भी कम होगा। सूत्रों ने बताया कि इन विशेष प्रकार के सूट्स का ट्रायल पूरा हो चका है और सेना जल्द ही इनके ऑर्डर देने वाली है। वहीं इन्हें मेक इन इंडिया औऱ आत्मर्निभर भारत पहल के तहत स्वदेशी कंपनियों से ही खरीदा जाएगा।
उठा सकेंगे 5 से 35 किग्रा तक का अतिरिक्त बोझ
खास बात ये होगी इन एक्सोस्केलेटन सू्ट्स को वर्दी के ऊपर ही पहना जा सकेगा। इनमें दो तरह के एक्सोस्केलेटन सूट होंगे, एक जो बैटरी वाले होंगी, और दूसरे बिना बैटरी वाले होंगे। बिना बैटरी वाले एक्सोस्केलेटन सूटों का वजन लगभग 1.8 किग्रा है। इन सूटों को पहनने के बाद सैनिकों की बोझ उठाने की क्षमता लगभग 5 से 35 किलोग्राम तक बढ़ जाएगी। इनमें हाइड्रोलिक्स और स्प्रिंग्स लगे होंगे, जो जवानों की पीठ, रीढ़ और बाजुओं को सहारा देंगे। वहीं, इनकी शेल्फ लाइफ लगभग तीन से पांच साल तक होगी। इन एक्सोस्केलेटन सूट का इस्तेमाल भारी गोला-बारूद को पहुंचाने, सामान की लोडिंग-अनलोडिंग और लंबी दूरी तक वजन ढोने के अलावा अन्य कार्यों में भी किया जाएगा। वहीं, बैटरी वाले एक्सोस्केलेटन सूट्स की क्षमता 100 किलोग्राम तक अतिरिक्त वजन भार उठाने की होगी और यह 3 से 5 घंटे का बैटरी बैकअप देगा। भारत में भी निजी कंपनियों के अलावा डीआरडीओ (DRDO) भी एक्सोस्केलेटन सूट बनाने में जुटा है।
चीन और रूस पहले से कर रहे इस्तेमाल
इससे पहले चीन की पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) भी एक्सोस्केलेटन सूट्स का इस्तेमाल कर रही है। 2020 में गलवान झड़प के बाद चीनी सैनिक गोला-बारूद ले जाने के लिए एक्सोस्केलेटन सूट पहने देखे गए थे। पीएलए सैनिक रसद सप्लाई और गश्त के लिए एक्सोस्केलेटन सूटों का इस्तेमाल करते हैं। पावर्ड एक्सोस्केलेटन सूट पहनने के बाद पीएलए के जवानों ने 80 किलोग्राम का वजन अपने कंधों पर लादा हुआ था। अमेरिका भी टैक्टिकल असॉल्ट लाइट ऑपरेटर सूट (TALOS) एक्सोस्केलेटन का इस्तेमाल कर रहा है। ब्रिटिश फर्म 'इंटेलिजेंट टेक्सटाइल्स' ने भी 2015 में सैनिकों के लिए एक्सो-सूट तकनीक के लिए अमेरिका और ब्रिटेन के साथ कई मिलियन पाउंड का सौदा किया था। वहीं, रूसी सैनिक भी रशियन कॉम्बैट गियर 'सोतनिक' पहनते हैं। रूस सोतनिक में छोटे आकार के हमलावर स्वॉर्म्स ड्रोन को कंट्रोल करने की भी सुविधा जोड़ने जा रहा है।