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'मुझे नहीं चाहिए कोई पद': पूर्व जज कौल ने सुनाया पीएम मोदी से चर्चा का किस्सा; उमर-शरजील के केस पर क्या कहा?
Wed, 28 Oct 2026 09:00 AM IST
देवेश त्रिपाठी
एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Wed, 28 Oct 2026 09:00 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने जमानत व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई मामलों में दोषसिद्धि या बरी होने से पहले हिरासत में बिताया गया लंबा समय ही सजा जैसा हो जाता है। एएनआई को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि अधिकांश मामलों में जमानत सामान्य नियम होनी चाहिए, हालांकि कुछ कानूनों में इस पर विशेष प्रतिबंध हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की किताब में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का भी जिक्र है। दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में साथ काम किया था। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि चंद्रचूड़ के बारे में लिखने को लेकर उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, "लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैंने पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के बारे में क्यों लिखा। जहां मुझे लगा कि उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए, वहां मैंने उनकी सराहना की है। मैंने कहा कि उनके पास न्यायिक मामलों की गहरी समझ और क्षमता है। उनमें बहुत मेहनत करने की योग्यता है। मैंने जिस मुद्दे पर सवाल उठाया, वह एक खास पहलू था। कभी-कभी सोशल मीडिया पर ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर मेरे उनसे मतभेद थे।"
पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ को लेकर क्या बोले जस्टिस कौल?
न्यायमूर्ति कौल ने पूर्व सीजेआई के साथ अपने संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि कई बार उन्हें लगता था कि चंद्रचूड़ जरूरत से ज्यादा नरम रुख अपनाते हैं और उन्हें अपनी बात अधिक मजबूती से रखनी चाहिए।
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उन्होंने कहा, "मैं उन्हें ऐसा करने की सलाह देता था। न्यायिक नियुक्तियों के मामले में भी, जब जनवरी से मार्च तक कुछ महीनों तक कोई प्रगति नहीं हुई, तो मैंने उनसे कहा था कि इस तरह काम नहीं चलेगा। सरकार के साथ मेरे विचारों में हमेशा से इस मुद्दे पर बड़ा अंतर रहा है। न्यायिक नियुक्तियां जल्द होनी चाहिए, ताकि योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को न्यायपालिका में लाया जा सके।"
कॉलेजियम पर कही क्या बात?
जस्टिस कौल ने कहा, "अगर लोग न्यायाधीश बनने के लिए तैयार नहीं हैं, तो प्रक्रिया आसान बनानी चाहिए, न कि उसे इतना जटिल बना देना चाहिए कि इसमें बहुत समय लग जाए। चंद्रचूड़ स्वभाव से थोड़े संकोची थे और संभवतः उनके साथ सामाजिक रूप से बातचीत करना उनके लिए अधिक सहज था। दोनों के बीच अच्छे संबंध थे, लेकिन कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे।"
न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "कुछ लोग पूछते हैं कि क्या मैंने उन प्रस्तावों पर सहमति दी थी। हां, बिल्कुल। जब तक मैंने सहमति नहीं दी, वे प्रस्ताव आगे नहीं बढ़े। लेकिन जिस घटना का मैंने जिक्र किया है, उसमें उन्होंने अंतिम समय पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। मैंने उन्हें आगाह किया था कि कॉलेजियम इस नाम को मंजूरी नहीं देगा। ऐसा ही हुआ। मैं भी उस नाम के पक्ष में नहीं था। यह उनका फैसला था। हो सकता है कि सरकार ने उस नाम का सुझाव दिया हो और उन्हें लगा हो कि कुछ किया जाना चाहिए।" उन्होंने आगे कहा कि यदि सरकार के सामने तर्कों के साथ अपनी बात रखी जाए और उस पर जोर दिया जाए, तो सरकार सहमत हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत का भी किया जिक्र
न्यायमूर्ति कौल ने न्यायिक नियुक्तियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई बातचीत को भी याद किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री उनकी बात ध्यान से सुनते हैं। न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "वह बहुत अच्छे श्रोता हैं। कभी-कभी आप पास बैठे होते हैं और बातचीत शुरू हो जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति हमेशा से मेरे लिए एक अहम मुद्दा रही है। मेरा मानना है कि समाधान सही तरह के न्यायाधीशों की नियुक्ति में है। कुछ नियुक्तियां अटकी हुई थीं, इसलिए मैंने उनसे कहा कि कृपया इन पर ध्यान दें।"
उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर बातचीत कुछ समय तक चली। उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा था, "हो सकता है कि आपको लगे कि मैंने अपनी बात पर कुछ ज्यादा जोर दिया है। मैं आपसे यह कह सकता हूं, क्योंकि मुझे कुछ हासिल नहीं करना है। मैं पहले दिन से स्पष्ट था कि सेवानिवृत्ति के बाद मैं कोई पद या लाभ नहीं लूंगा।" न्यायमूर्ति कौल के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने जवाब दिया कि उन्हें इस बात की जानकारी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को जमीनी स्तर पर चीजों की बेहद विस्तृत जानकारी रहती है।
'मुकदमे की प्रक्रिया ही बन जाती है सजा'
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने के मुद्दे पर कहा कि देश की न्याय व्यवस्था में दोषसिद्धि या बरी होने से पहले की लंबी अवधि ही सजा बन जाती है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे मामलों में जमानत सामान्य नियम होनी चाहिए।
एक साक्षात्कार में न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि जमानत को लेकर उनका दृष्टिकोण आम तौर पर उदार रहा है, हालांकि कुछ कानूनों में विशेष परिस्थितियों में जमानत देने पर स्पष्ट रोक लगाई गई है।
जमानत को लेकर क्या बोले पूर्व जस्टिस एसके कौल?
उन्होंने कहा, "मैंने आम तौर पर जमानत को लेकर बहुत उदार रुख अपनाया है। मेरा मानना है कि जमानत सजा नहीं हो सकती। सजा तो दोषी ठहराए जाने पर मिलती है। दुर्भाग्य से, हमारी व्यवस्था में दोषसिद्धि या बरी होने से पहले का समय ही सजा बन जाता है। मुकदमे की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।"
उन्होंने आगे कहा, "कई न्यायाधीश इस मुद्दे पर लिखते और अपनी राय रखते रहे हैं। मैंने भी न्यायमूर्ति सुंदरश के साथ रहते हुए जमानत के मुद्दे पर विस्तार से विचार किया था। हमने यह सवाल उठाने की कोशिश की थी कि आखिर लोगों को हिरासत में क्यों रखा जा रहा है। न्यायमूर्ति सुंदरश ने इस संबंध में फैसला लिखा था। मेरी नजर में वह उदार दृष्टिकोण रखने वाले न्यायाधीश हैं।"
उन्होंने कहा, "हमने जमानत से जुड़े कुछ मानक तय करने की कोशिश की थी, हालांकि वे पहले से ही मौजूद थे। ज्यादातर मामलों में हमारा मानना है कि जमानत सामान्य नियम होनी चाहिए। लेकिन कुछ कानून ऐसे हैं, जिनमें जमानत पर रोक है।"
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने जय विनायक ओझा के साथ मिलकर एक संस्मरण भी लिखा है। इसका शीर्षक "विदाउट फियर ऑर फेवर" है और यह 31 अक्तूबर को जारी होने वाला है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर लगे हैं क्या आरोप?
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश में शामिल होने का आरोप है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
ये हिंसक घटनाएं नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान भड़की थीं।
सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुई थी याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 5 जनवरी को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अपने फैसले में अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के मामले और साक्ष्यों के लिहाज से दोनों की स्थिति अन्य आरोपियों से "गुणात्मक रूप से अलग" है।
इसके बाद सितंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। यह मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की ओर से दर्ज एफआईआर संख्या 59/2020 से जुड़ा है। इसमें फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच की जा रही है।
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उन्होंने कहा, "लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैंने पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ के बारे में क्यों लिखा। जहां मुझे लगा कि उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए, वहां मैंने उनकी सराहना की है। मैंने कहा कि उनके पास न्यायिक मामलों की गहरी समझ और क्षमता है। उनमें बहुत मेहनत करने की योग्यता है। मैंने जिस मुद्दे पर सवाल उठाया, वह एक खास पहलू था। कभी-कभी सोशल मीडिया पर ऐसी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर मेरे उनसे मतभेद थे।"
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पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ को लेकर क्या बोले जस्टिस कौल?
न्यायमूर्ति कौल ने पूर्व सीजेआई के साथ अपने संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि कई बार उन्हें लगता था कि चंद्रचूड़ जरूरत से ज्यादा नरम रुख अपनाते हैं और उन्हें अपनी बात अधिक मजबूती से रखनी चाहिए।
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उन्होंने कहा, "मैं उन्हें ऐसा करने की सलाह देता था। न्यायिक नियुक्तियों के मामले में भी, जब जनवरी से मार्च तक कुछ महीनों तक कोई प्रगति नहीं हुई, तो मैंने उनसे कहा था कि इस तरह काम नहीं चलेगा। सरकार के साथ मेरे विचारों में हमेशा से इस मुद्दे पर बड़ा अंतर रहा है। न्यायिक नियुक्तियां जल्द होनी चाहिए, ताकि योग्य और प्रतिभाशाली लोगों को न्यायपालिका में लाया जा सके।"
कॉलेजियम पर कही क्या बात?
जस्टिस कौल ने कहा, "अगर लोग न्यायाधीश बनने के लिए तैयार नहीं हैं, तो प्रक्रिया आसान बनानी चाहिए, न कि उसे इतना जटिल बना देना चाहिए कि इसमें बहुत समय लग जाए। चंद्रचूड़ स्वभाव से थोड़े संकोची थे और संभवतः उनके साथ सामाजिक रूप से बातचीत करना उनके लिए अधिक सहज था। दोनों के बीच अच्छे संबंध थे, लेकिन कुछ मुद्दों पर मतभेद भी रहे।"
न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "कुछ लोग पूछते हैं कि क्या मैंने उन प्रस्तावों पर सहमति दी थी। हां, बिल्कुल। जब तक मैंने सहमति नहीं दी, वे प्रस्ताव आगे नहीं बढ़े। लेकिन जिस घटना का मैंने जिक्र किया है, उसमें उन्होंने अंतिम समय पर किसी दूसरे व्यक्ति का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। मैंने उन्हें आगाह किया था कि कॉलेजियम इस नाम को मंजूरी नहीं देगा। ऐसा ही हुआ। मैं भी उस नाम के पक्ष में नहीं था। यह उनका फैसला था। हो सकता है कि सरकार ने उस नाम का सुझाव दिया हो और उन्हें लगा हो कि कुछ किया जाना चाहिए।" उन्होंने आगे कहा कि यदि सरकार के सामने तर्कों के साथ अपनी बात रखी जाए और उस पर जोर दिया जाए, तो सरकार सहमत हो सकती है।
प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत का भी किया जिक्र
न्यायमूर्ति कौल ने न्यायिक नियुक्तियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई बातचीत को भी याद किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री उनकी बात ध्यान से सुनते हैं। न्यायमूर्ति कौल ने कहा, "वह बहुत अच्छे श्रोता हैं। कभी-कभी आप पास बैठे होते हैं और बातचीत शुरू हो जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति हमेशा से मेरे लिए एक अहम मुद्दा रही है। मेरा मानना है कि समाधान सही तरह के न्यायाधीशों की नियुक्ति में है। कुछ नियुक्तियां अटकी हुई थीं, इसलिए मैंने उनसे कहा कि कृपया इन पर ध्यान दें।"
उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर बातचीत कुछ समय तक चली। उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा था, "हो सकता है कि आपको लगे कि मैंने अपनी बात पर कुछ ज्यादा जोर दिया है। मैं आपसे यह कह सकता हूं, क्योंकि मुझे कुछ हासिल नहीं करना है। मैं पहले दिन से स्पष्ट था कि सेवानिवृत्ति के बाद मैं कोई पद या लाभ नहीं लूंगा।" न्यायमूर्ति कौल के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने जवाब दिया कि उन्हें इस बात की जानकारी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को जमीनी स्तर पर चीजों की बेहद विस्तृत जानकारी रहती है।
'मुकदमे की प्रक्रिया ही बन जाती है सजा'
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने के मुद्दे पर कहा कि देश की न्याय व्यवस्था में दोषसिद्धि या बरी होने से पहले की लंबी अवधि ही सजा बन जाती है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे मामलों में जमानत सामान्य नियम होनी चाहिए।
एक साक्षात्कार में न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि जमानत को लेकर उनका दृष्टिकोण आम तौर पर उदार रहा है, हालांकि कुछ कानूनों में विशेष परिस्थितियों में जमानत देने पर स्पष्ट रोक लगाई गई है।
जमानत को लेकर क्या बोले पूर्व जस्टिस एसके कौल?
उन्होंने कहा, "मैंने आम तौर पर जमानत को लेकर बहुत उदार रुख अपनाया है। मेरा मानना है कि जमानत सजा नहीं हो सकती। सजा तो दोषी ठहराए जाने पर मिलती है। दुर्भाग्य से, हमारी व्यवस्था में दोषसिद्धि या बरी होने से पहले का समय ही सजा बन जाता है। मुकदमे की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है।"
उन्होंने आगे कहा, "कई न्यायाधीश इस मुद्दे पर लिखते और अपनी राय रखते रहे हैं। मैंने भी न्यायमूर्ति सुंदरश के साथ रहते हुए जमानत के मुद्दे पर विस्तार से विचार किया था। हमने यह सवाल उठाने की कोशिश की थी कि आखिर लोगों को हिरासत में क्यों रखा जा रहा है। न्यायमूर्ति सुंदरश ने इस संबंध में फैसला लिखा था। मेरी नजर में वह उदार दृष्टिकोण रखने वाले न्यायाधीश हैं।"
उन्होंने कहा, "हमने जमानत से जुड़े कुछ मानक तय करने की कोशिश की थी, हालांकि वे पहले से ही मौजूद थे। ज्यादातर मामलों में हमारा मानना है कि जमानत सामान्य नियम होनी चाहिए। लेकिन कुछ कानून ऐसे हैं, जिनमें जमानत पर रोक है।"
न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने जय विनायक ओझा के साथ मिलकर एक संस्मरण भी लिखा है। इसका शीर्षक "विदाउट फियर ऑर फेवर" है और यह 31 अक्तूबर को जारी होने वाला है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर लगे हैं क्या आरोप?
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश में शामिल होने का आरोप है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
ये हिंसक घटनाएं नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान भड़की थीं।
सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुई थी याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 5 जनवरी को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अपने फैसले में अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के मामले और साक्ष्यों के लिहाज से दोनों की स्थिति अन्य आरोपियों से "गुणात्मक रूप से अलग" है।
इसके बाद सितंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। यह मामला दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की ओर से दर्ज एफआईआर संख्या 59/2020 से जुड़ा है। इसमें फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कथित बड़ी साजिश की जांच की जा रही है।