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रिपोर्ट: स्वच्छ ऊर्जा की तेज रफ्तार भी नहीं रोक पाई प्रदूषण, 2024 में फिर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा उत्सर्जन
Thu, 10 Jul 2025 05:42 AM IST
शुभम कुमार
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: शुभम कुमार
Updated Thu, 10 Jul 2025 05:42 AM IST
सार
एनर्जी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में वैश्विक ऊर्जा की मांग 2% बढ़ी, जबकि कार्बन उत्सर्जन में 1% वृद्धि दर्ज की गई। सौर और पवन ऊर्जा में 16% की तेज वृद्धि हुई, फिर भी यह कुल मांग को संतुलित करने में नाकाफी रही। यह लगातार चौथा साल है जब उत्सर्जन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।
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वायु प्रदूषण
- फोटो : Freepik.com
विस्तार
स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में तेज प्रगति के बावजूद दुनिया की ऊर्जा की मांग उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रही है। नतीजा यह है कि 2024 में वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र से कार्बन उत्सर्जन ने लगातार चौथे साल नया रिकॉर्ड बना डाला। इस दौरान उत्सर्जन में एक फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। दुनिया जिस रफ्तार से ऊर्जा की ओर दौड़ रही है, उस रफ्तार से स्वच्छता की दिशा में कदम नहीं बढ़ पा रहे हैं। एनर्जी इंस्टीट्यूट की नई रिपोर्ट 2025 स्टैटिस्टिकल रिव्यू ऑफ वर्ल्ड एनर्जी के अनुसार वर्ष 2024 में वैश्विक ऊर्जा मांग 2 फीसदी बढ़कर 592 एक्साजूल तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
इसके साथ ही सभी प्रमुख ऊर्जा स्रोतों कोयला, तेल, गैस, जलविद्युत, परमाणु और अक्षय ऊर्जा का ऐतिहासिक उपयोग रिकॉर्ड किया गया। स्वच्छ ऊर्जा, विशेष रूप से सौर और पवन क्षेत्र में उल्लेखनीय 16 फीसदी की वृद्धि हुई जो कुल ऊर्जा मांग की दर से नौ गुना तेज है। इसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी 57 फीसदी रही। बीते दो वर्षों में सौर ऊर्जा का वैश्विक उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। फिर भी यह वृद्धि ऊर्जा की कुल मांग को संतुलित करने में नाकाफी साबित हो रही है।
ये भी पढ़ें:- अध्ययन: मानवजनित जलवायु परिवर्तन बना यूरोप में 1,500 मौतों की वजह, वैज्ञानिकों ने किया की चौंकाने वाला खुलासा
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जीवाश्म ईंधन की पकड़ ढीली नहीं
तेजी से बढ़ रही स्वच्छ ऊर्जा के बावजूद जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग कम नहीं हुआ है। 2024 में कोयला, तेल और गैस का उपयोग भी एक फीसदी बढ़ा। भारत में कोयले की मांग 4 फीसदी बढ़ी, जो अब अमेरिका, यूरोप और दक्षिण अमेरिका की संयुक्त मांग के बराबर है। चीन में हालांकि कच्चे तेल की मांग 1.2 फीसदी घटी, जिससे संकेत मिलता है कि वहां तेल खपत चरम पर पहुंच चुकी है।
बिजली की खपत में 4% की छलांग
रिपोर्ट के अनुसार 2024 में वैश्विक बिजली की मांग 4% बढ़ी है, जिससे संकेत मिलता है कि हम ऊर्जा युग में प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन, यह ऊर्जा बदलाव संतुलित नहीं है। इससे पारंपरिक और स्वच्छ दोनों प्रकार की ऊर्जा समानांतर रूप से बढ़ रही हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य धुंधला पड़ता जा रहा है।
ये भी पढ़ें:- India-US Trade Deal: शृंगला बोले- गेंद अमेरिका के पाले में, पहले दौर की बात पूरी; फैसला व्हाइट हाउस को लेना है
बदलाव एकसमान नहीं, अव्यवस्थित
यूरोप जैसे देशों में आपूर्ति शृंखला की लागत ने अक्षय ऊर्जा की गति को धीमा कर दिया है। वहीं चीन, भारत जैसे देश अब भी बड़े पैमाने पर विकास की जद्दोजहद में लगे हैं। यह बदलाव एकसमान नहीं, बल्कि अव्यवस्थित है। एनर्जी इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष एंडी ब्राउन ने चेताया कि दुनिया की ऊर्जा जरूरतें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि 60% नई मांग अब भी जीवाश्म ईंधनों से पूरी हो रही है।
रिपोर्ट में विकासशील देशों में बिजली की लगातार तेज होती खपत की बात कही गई है, लेकिन यह बदलाव असंगठित और असमान है। क्लाइनवेल्ड पीट मारविक गॉरडेलर (केपीएमजी) यूके की ऊर्जा रणनीति प्रमुख वफा जाफरी ने ध्यान दिलाया कि कॉप 28 में तय किया गया था कि 2030 तक अक्षय ऊर्जा को तीन गुना बढ़ाया जाएगा। पर जमीनी हकीकत यह है कि कई देशों में ब्याज दरों में वृद्धि और आपूर्ति शृंखला की लागत ने इस दिशा में प्रगति धीमी कर दी है।
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इसके साथ ही सभी प्रमुख ऊर्जा स्रोतों कोयला, तेल, गैस, जलविद्युत, परमाणु और अक्षय ऊर्जा का ऐतिहासिक उपयोग रिकॉर्ड किया गया। स्वच्छ ऊर्जा, विशेष रूप से सौर और पवन क्षेत्र में उल्लेखनीय 16 फीसदी की वृद्धि हुई जो कुल ऊर्जा मांग की दर से नौ गुना तेज है। इसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी 57 फीसदी रही। बीते दो वर्षों में सौर ऊर्जा का वैश्विक उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है। फिर भी यह वृद्धि ऊर्जा की कुल मांग को संतुलित करने में नाकाफी साबित हो रही है।
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जीवाश्म ईंधन की पकड़ ढीली नहीं
तेजी से बढ़ रही स्वच्छ ऊर्जा के बावजूद जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग कम नहीं हुआ है। 2024 में कोयला, तेल और गैस का उपयोग भी एक फीसदी बढ़ा। भारत में कोयले की मांग 4 फीसदी बढ़ी, जो अब अमेरिका, यूरोप और दक्षिण अमेरिका की संयुक्त मांग के बराबर है। चीन में हालांकि कच्चे तेल की मांग 1.2 फीसदी घटी, जिससे संकेत मिलता है कि वहां तेल खपत चरम पर पहुंच चुकी है।
बिजली की खपत में 4% की छलांग
रिपोर्ट के अनुसार 2024 में वैश्विक बिजली की मांग 4% बढ़ी है, जिससे संकेत मिलता है कि हम ऊर्जा युग में प्रवेश कर चुके हैं। लेकिन, यह ऊर्जा बदलाव संतुलित नहीं है। इससे पारंपरिक और स्वच्छ दोनों प्रकार की ऊर्जा समानांतर रूप से बढ़ रही हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य धुंधला पड़ता जा रहा है।
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बदलाव एकसमान नहीं, अव्यवस्थित
यूरोप जैसे देशों में आपूर्ति शृंखला की लागत ने अक्षय ऊर्जा की गति को धीमा कर दिया है। वहीं चीन, भारत जैसे देश अब भी बड़े पैमाने पर विकास की जद्दोजहद में लगे हैं। यह बदलाव एकसमान नहीं, बल्कि अव्यवस्थित है। एनर्जी इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष एंडी ब्राउन ने चेताया कि दुनिया की ऊर्जा जरूरतें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि 60% नई मांग अब भी जीवाश्म ईंधनों से पूरी हो रही है।
रिपोर्ट में विकासशील देशों में बिजली की लगातार तेज होती खपत की बात कही गई है, लेकिन यह बदलाव असंगठित और असमान है। क्लाइनवेल्ड पीट मारविक गॉरडेलर (केपीएमजी) यूके की ऊर्जा रणनीति प्रमुख वफा जाफरी ने ध्यान दिलाया कि कॉप 28 में तय किया गया था कि 2030 तक अक्षय ऊर्जा को तीन गुना बढ़ाया जाएगा। पर जमीनी हकीकत यह है कि कई देशों में ब्याज दरों में वृद्धि और आपूर्ति शृंखला की लागत ने इस दिशा में प्रगति धीमी कर दी है।