{"_id":"65f5a740f9ae9aee3a0448c0","slug":"electoral-bond-political-donations-issue-impact-on-lok-sabha-elections-2024-know-expert-opinion-2024-03-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"खबरों के खिलाड़ी: चुनावी चंदे पर मचा घमासान, खबरों के खिलाड़ी से जानें लोकसभा चुनाव पर इसका कितना होगा असर","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
खबरों के खिलाड़ी: चुनावी चंदे पर मचा घमासान, खबरों के खिलाड़ी से जानें लोकसभा चुनाव पर इसका कितना होगा असर
Sat, 16 Mar 2024 08:07 PM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 16 Mar 2024 08:07 PM IST
सार
इलेक्टोरल बॉन्ड के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बॉन्ड की रकम और भुनाने वाली पार्टियों के आंकड़े सामने आ चुके हैं। करोड़ों रुपये का चुनावी चंदा लेने वाली राजनीतिक पार्टियों के बीच घमासान मचा हुआ है। खबरों के खिलाड़ी में सियासी मामलों के जानकारों के बीच इस पर मंथन हुआ। जानिए लोकसभा चुनाव पर चुनावी बॉन्ड के मुद्दे का कितना असर होगा
विज्ञापन
चुनावी बॉन्ड का मुद्दा मतदाताओं को कितना प्रभावित करेगा, विशेषज्ञों ने बताया
- फोटो : amar ujala graphics
विस्तार
बीते हफ्ते चुनावी चंदे की चर्चा होती रही। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एसबीआई ने इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा चुनाव आयोग को साझा किया। इसके बाद गुरुवार को यह डाटा सार्वजनिक कर दिया। इन आंकड़ों पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, किस कंपनी ने किस पार्टी को चंदा दिया यह स्पष्ट नहीं होने के चलते मामला फिर कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने नए सिरे से आदेश जारी किया। इस पर सियासत भी जमकर हो रही है। इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी कार्यक्रम में इसी मुद्दे पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राहुल महाजन, विनोद अग्निहोत्री, अवधेश कुमार, समीर चौगांवकर, अनुराग वर्मा और राखी बख्शी मौजूद रहे।
राहुल महाजन: पहला सवाल तो ये है कि क्या इससे बेहतर कोई तंत्र था? दूसरा सवाल यह कि क्या जिन्हें चंदा मिला उन्होंने कंपनियों को फायदा पहुंचाया? एक सवाल यह भी है क्या इसमें कई फर्जी कंपनिया भी शामिल हैं? पहले सवाल के जवाब की बात करें तो हम सभी जानते हैं कि पहले कैसे बैग के बैग पार्टियों के पास पहुंचते थे। कंपनियों को फायदा पहुंचाने का सवाल जहां तक सवाल इसमें कई नाम सामने आ रहे हैं। लेकिन, यह तय करना होगा कि क्या इन कंपनियों को कोई अनुचित फायदा पहुंचाया गया। इसका जवाब तब मिलेगा जब डेटा की मैपिंग होगी। ये जरूर है कि इलेक्टोरल बॉन्ड ने सभी पार्टियों के लिए एक नई मुश्किल खड़ी कर दी। विपक्ष की तरफ से जो आरोप लगाया जा रहा था कि अदाणी या अंबानी समूह की ओर से सत्ताधारी पार्टी को बहुत चंदा दिया गया, अभी जो आंकड़ें आए हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं दिखा। फ्यूचर गेमिंग जैसी कंपनिया जिस पर ईडी की रेड पड़ी। उससे करोड़ों रुपये जब्त हुए। क्या ऐसी कंपनियों को चंदा देने के लिए अनुमति देनी चाहिए यह भी देखना होगा।
विज्ञापन
राखी बख्शी: इलेक्टोरल बॉन्ड के पीछे एक अवधारणा थी कि इसके जरिए सूटकेस कल्चर को खत्म किया जाए। एक तरफ जनता है और दूसरी तरफ पार्टियां हैं। अब नया निर्देश जो आया है जिसमें यूनिक नंबर दीजिए। जब ये टेबुलर चार्ट बनेगा और चीजें क्लियर होंगी तभी पूरा सच सामने आएगा।
इलेक्टोरल रिफॉर्म जरूर होने चाहिए। हम किसी कंपेन को या किसी पोलिटिकल मूवमेंट को सपोर्ट करेंगे उस इरादे को भी देखना होगा। कोई कंपनी क्यों चंदा दे रही है जिस पर कई आरोप हैं, या कोई शेल कंपनी है। तो उस पर सवाल भी उठते हैं। यह समझना पड़ेगा कि किस पार्टी को कहां चंदा मिला। क्यों, कब और कहां चंदा मिला जब ये सामने आएगा तब समझ में आएगा उसके पीछे का इरादा क्या था।
अनुराग वर्मा: लोकतंत्र के तरीके और आंदोलन के तरीके में फर्क होता है। आंदोलन में आप एक आदर्श तरीका होता है। लेकिन, लोकतंत्र में आप लगातार सुधार करते हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड के तंत्र के जरिए आप पारदर्शिता लाना चाहते थे। अगर आप अभी देखें तो विपक्ष बोल रहा है कि जिन्होंने चंदा दिया है वो ये जान लें कि सरकार बदलेगी तो हम भी बताएंगे। लेकिन, मिला तो सबको है। अगर आपको चुनाव में इसका असर देखना था तो आपको सड़कों पर जाना था लोगों के बीच संदेश देना था। तब चुनाव पर इसका असर दिखता।
अवधेश कुमार: जिन पार्टियों को चुनावी बॉन्ड से समस्या थी उन्हें घोषणा करनी चाहिए थी कि हम इससे चंदा नहीं लेंगे। जो व्यवस्था पहले से चल रही है उससे ही चंदा लेंगे। लेकिन, किसी पार्टी ने ऐसा नहीं किया। पार्टियां चलाने में हमारे देश में कभी भी कोई चुनाव पारदर्शी तरीके लड़ा गया है ये कोई नहीं कह सकता है। एक बूथ पर किसी पार्टी को चुनाव के दिन ही 20 हजार खर्च होता है। एक लोकसभा में 15 सौ बूथ हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक चुनाव में सिर्फ चुनाव के दिन कितना खर्च आता है। राजनीतिक क्षेत्र में अगर कोई दोष है तो उसे राजनीतिक क्षेत्र से होना चाहिए। इसमें सुधार की जरूरत है लेकिन केवल सनसनी बनाई जा रही है। सनसनी बनाने के जगह इसमें सुधार करने की जरूरत है।
समीर चौगांवकर: केंद्र सरकार सत्ता में है तो जो पार्टी सत्ता में होगी उसे ज्यादा चंदा मिलेगा यह तय है। चंदा देने वालों में जो बड़ा पैसा देने वाले लोग हैं उनमें ऐसे लोग हैं जो समाज सेवक नहीं है। बल्कि, विशुद्ध रूप से व्यापार करने वाले लोग हैं। कहने का मतलब यह है कि जिसने भी चंदा दिया है उसने फायदा उठाने के लिए ही दिया है। उद्योगपति अपना भविष्य भी देखते हैं। इसलिए वो दूसरे दलों को भी चंदा देते हैं। जो पार्टी सत्ता में उसमें अगर उद्योगपतियों को संभावना ज्यादा दिखती है तो उसे ज्यादा चंदा भी देते हैं। ये सभी जानते हैं कि लोकसभा का चुनाव 95 लाख में नहीं लड़ा जाता है। बाकी करोड़ों रुपये कैश में खर्च होते हैं ये कैश आता कहां से है यह भी सभी को पता है। सभी राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि देश की राजनीति चुनावी आधार पर कैसे बेहतर हो।
विनोद अग्निहोत्री: विपक्ष कोई भी होता है तो वह सवाल उठाता है। राजनीति दलों द्वारा चंदा लेने के तरीके होते थे। जैसे कोई रैली होती थी तो उसके इंतजाम के लिए पार्टियों व्यापारियों से करा लेती थीं। पहले सब नकदी में होता था। अन्ना आंदोलन के बाद इसे पारदर्शी करने की बात होने लगी। 2017 में अरुण जेटली इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आए तो यह योजना बड़ी अच्छी लगी थी। सत्ता में जो पार्टियां है सब को मिला केवल सीपीएम को छोड़कर। क्योंकि उन्होंने खुद इससे चंदा नहीं लेने की बात कही थी। जांच इस पर होनी चाहिए कि क्या जिसने चंदा दिया उसे कोई लाभ पहुंचाया गया। विपक्ष के लिए यह एक चुनावी मुद्दा है। विपक्ष इस मुद्दे को कैसे उठायेगा यह देखना होगा। विपक्ष की पार्टियों को भी पैसा मिला है। उनसे भी यह सवाल होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
राहुल महाजन: पहला सवाल तो ये है कि क्या इससे बेहतर कोई तंत्र था? दूसरा सवाल यह कि क्या जिन्हें चंदा मिला उन्होंने कंपनियों को फायदा पहुंचाया? एक सवाल यह भी है क्या इसमें कई फर्जी कंपनिया भी शामिल हैं? पहले सवाल के जवाब की बात करें तो हम सभी जानते हैं कि पहले कैसे बैग के बैग पार्टियों के पास पहुंचते थे। कंपनियों को फायदा पहुंचाने का सवाल जहां तक सवाल इसमें कई नाम सामने आ रहे हैं। लेकिन, यह तय करना होगा कि क्या इन कंपनियों को कोई अनुचित फायदा पहुंचाया गया। इसका जवाब तब मिलेगा जब डेटा की मैपिंग होगी। ये जरूर है कि इलेक्टोरल बॉन्ड ने सभी पार्टियों के लिए एक नई मुश्किल खड़ी कर दी। विपक्ष की तरफ से जो आरोप लगाया जा रहा था कि अदाणी या अंबानी समूह की ओर से सत्ताधारी पार्टी को बहुत चंदा दिया गया, अभी जो आंकड़ें आए हैं उसमें ऐसा कुछ नहीं दिखा। फ्यूचर गेमिंग जैसी कंपनिया जिस पर ईडी की रेड पड़ी। उससे करोड़ों रुपये जब्त हुए। क्या ऐसी कंपनियों को चंदा देने के लिए अनुमति देनी चाहिए यह भी देखना होगा।
विज्ञापन
राखी बख्शी: इलेक्टोरल बॉन्ड के पीछे एक अवधारणा थी कि इसके जरिए सूटकेस कल्चर को खत्म किया जाए। एक तरफ जनता है और दूसरी तरफ पार्टियां हैं। अब नया निर्देश जो आया है जिसमें यूनिक नंबर दीजिए। जब ये टेबुलर चार्ट बनेगा और चीजें क्लियर होंगी तभी पूरा सच सामने आएगा।
इलेक्टोरल रिफॉर्म जरूर होने चाहिए। हम किसी कंपेन को या किसी पोलिटिकल मूवमेंट को सपोर्ट करेंगे उस इरादे को भी देखना होगा। कोई कंपनी क्यों चंदा दे रही है जिस पर कई आरोप हैं, या कोई शेल कंपनी है। तो उस पर सवाल भी उठते हैं। यह समझना पड़ेगा कि किस पार्टी को कहां चंदा मिला। क्यों, कब और कहां चंदा मिला जब ये सामने आएगा तब समझ में आएगा उसके पीछे का इरादा क्या था।
अनुराग वर्मा: लोकतंत्र के तरीके और आंदोलन के तरीके में फर्क होता है। आंदोलन में आप एक आदर्श तरीका होता है। लेकिन, लोकतंत्र में आप लगातार सुधार करते हैं। इलेक्टोरल बॉन्ड के तंत्र के जरिए आप पारदर्शिता लाना चाहते थे। अगर आप अभी देखें तो विपक्ष बोल रहा है कि जिन्होंने चंदा दिया है वो ये जान लें कि सरकार बदलेगी तो हम भी बताएंगे। लेकिन, मिला तो सबको है। अगर आपको चुनाव में इसका असर देखना था तो आपको सड़कों पर जाना था लोगों के बीच संदेश देना था। तब चुनाव पर इसका असर दिखता।
अवधेश कुमार: जिन पार्टियों को चुनावी बॉन्ड से समस्या थी उन्हें घोषणा करनी चाहिए थी कि हम इससे चंदा नहीं लेंगे। जो व्यवस्था पहले से चल रही है उससे ही चंदा लेंगे। लेकिन, किसी पार्टी ने ऐसा नहीं किया। पार्टियां चलाने में हमारे देश में कभी भी कोई चुनाव पारदर्शी तरीके लड़ा गया है ये कोई नहीं कह सकता है। एक बूथ पर किसी पार्टी को चुनाव के दिन ही 20 हजार खर्च होता है। एक लोकसभा में 15 सौ बूथ हैं तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक चुनाव में सिर्फ चुनाव के दिन कितना खर्च आता है। राजनीतिक क्षेत्र में अगर कोई दोष है तो उसे राजनीतिक क्षेत्र से होना चाहिए। इसमें सुधार की जरूरत है लेकिन केवल सनसनी बनाई जा रही है। सनसनी बनाने के जगह इसमें सुधार करने की जरूरत है।
समीर चौगांवकर: केंद्र सरकार सत्ता में है तो जो पार्टी सत्ता में होगी उसे ज्यादा चंदा मिलेगा यह तय है। चंदा देने वालों में जो बड़ा पैसा देने वाले लोग हैं उनमें ऐसे लोग हैं जो समाज सेवक नहीं है। बल्कि, विशुद्ध रूप से व्यापार करने वाले लोग हैं। कहने का मतलब यह है कि जिसने भी चंदा दिया है उसने फायदा उठाने के लिए ही दिया है। उद्योगपति अपना भविष्य भी देखते हैं। इसलिए वो दूसरे दलों को भी चंदा देते हैं। जो पार्टी सत्ता में उसमें अगर उद्योगपतियों को संभावना ज्यादा दिखती है तो उसे ज्यादा चंदा भी देते हैं। ये सभी जानते हैं कि लोकसभा का चुनाव 95 लाख में नहीं लड़ा जाता है। बाकी करोड़ों रुपये कैश में खर्च होते हैं ये कैश आता कहां से है यह भी सभी को पता है। सभी राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि देश की राजनीति चुनावी आधार पर कैसे बेहतर हो।
विनोद अग्निहोत्री: विपक्ष कोई भी होता है तो वह सवाल उठाता है। राजनीति दलों द्वारा चंदा लेने के तरीके होते थे। जैसे कोई रैली होती थी तो उसके इंतजाम के लिए पार्टियों व्यापारियों से करा लेती थीं। पहले सब नकदी में होता था। अन्ना आंदोलन के बाद इसे पारदर्शी करने की बात होने लगी। 2017 में अरुण जेटली इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आए तो यह योजना बड़ी अच्छी लगी थी। सत्ता में जो पार्टियां है सब को मिला केवल सीपीएम को छोड़कर। क्योंकि उन्होंने खुद इससे चंदा नहीं लेने की बात कही थी। जांच इस पर होनी चाहिए कि क्या जिसने चंदा दिया उसे कोई लाभ पहुंचाया गया। विपक्ष के लिए यह एक चुनावी मुद्दा है। विपक्ष इस मुद्दे को कैसे उठायेगा यह देखना होगा। विपक्ष की पार्टियों को भी पैसा मिला है। उनसे भी यह सवाल होगा।