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Election Results: दक्षिण में खुला दूसरा दरवाजा, लेकिन उत्तर में साफ, कांग्रेस की गारंटी पर भारी मोदी पर भरोसा
Mon, 04 Dec 2023 06:44 AM IST
यशोधन शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Mon, 04 Dec 2023 06:44 AM IST
सार
कांग्रेस की हार में जमीनी स्तर पर कमजोर गठबंधन और गलत मुद्दों के चुनाव की बड़ी भूमिका रही। एक तरफ जहां लहर और केंद्रीय मुद्दाविहीन इस चुनाव में भाजपा ने सबसे अधिक जोर बूथ प्रबंधन पर दिया, वहीं कांग्रेस कर्नाटक की तर्ज पर अपनी गारंटी पर ही भरोसा करती रही।
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Telangana Congress wins
- फोटो : Telangana Congress wins
विस्तार
कांग्रेस के लिए मुश्किल है कि जिन राज्यों में पार्टी हारी, वहां उसके मुख्य मुद्दे और लोकलुभावन घोषणाओं का असर नहीं पड़ा। पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ओबीसी कार्ड को धार देते हुए हर राज्य में बिहार की तर्ज पर जातिगत गणना कराने की घोषणा की। इसके अलावा हर राज्य में गारंटी के तहत लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगाई। बावजूद इसके नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं ने न तो कांग्रेस के मुद्दों को तरजीह दी और न ही लोकलुभावन घोषणाओं पर भरोसा किया। कांग्रेस की गारंटी पर मोदी की गारंटी भारी साबित हुई।
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कहां चूकी कांग्रेस?
कांग्रेस की हार में जमीनी स्तर पर कमजोर गठबंधन और गलत मुद्दों के चुनाव की बड़ी भूमिका रही। एक तरफ जहां लहर और केंद्रीय मुद्दाविहीन इस चुनाव में भाजपा ने सबसे अधिक जोर बूथ प्रबंधन पर दिया, वहीं कांग्रेस कर्नाटक की तर्ज पर अपनी गारंटी पर ही भरोसा करती रही। प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने पर बीते नौ साल से कई चुनावों में कीमत चुकाने के बावजूद कांग्रेस ने इससे सबक नहीं सीखा। क्रिकेट वर्ल्डकप की हार का ठीकरा पीएम पर फोड़ते हुए उन्हें न सिर्फ पनौती कहा बल्कि उसके नेता सोशल मीडिया पर इसे ट्रेंड कराने में भी जुटे रहे।
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सहयोगियों से दूरी...विपक्षी एकता पर भी संदेह
इन चुनावों में जीत हासिल कर अन्य विपक्षी ताकतों पर भारी पड़ने का कांग्रेस का दांव भी उल्टा पड़ा। कांग्रेस की इस रणनीति के कारण विपक्षी नेताओं की संयुक्त जनसभा का प्रस्ताव टालना पड़ा। सीट बंटवारे के सवाल पर सपा से तू—तू-मैं-मैं ने पार्टी का नुकसान कराया। कांग्रेस की इस रणनीति के कारण लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता कायम होने की संभावनाओं पर भी संदेह पैदा हुआ।
नया मुद्दा खड़ा करने की चुनौती
इस चुनाव में सामाजिक न्याय, जाति गणना का मुद्दा सिरे नहीं चढ़ने पर अब कांग्रेस के सामने चंद महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए नए मुद्दे तलाशने की चुनौती है। पार्टी के लिए चिंता की बात यह है कि उसने जिन तीन राज्यों को भाजपा के हाथों गंवाया है, वहां पार्टी का चेहरा उसी ओबीसी वर्ग से थे, जिसके लिए पार्टी ने जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी का नारा दिया है। पार्टी की दूसरी चुनौती विपक्षी गठबंधन को कायम रखने की है। जाहिर तौर पर इस नतीजे के बाद एक बार फिर से राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठेंगे। नीतीश कुमार, ममता बनर्जी जैसे क्षत्रप चाहेंगे कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों का नेतृत्व स्वीकार करे।
मुसलमानों की घर वापसी
खासतौर से तेलंगाना के नतीजे ने बताया है कि देश के अल्पसंख्यक मतदाता अब कांग्रेस को केंद्र की राजनीति में भाजपा के खिलाफ मुख्य खिलाड़ी के रूप में देखना चाहते हैं। इस बिरादरी ने कर्नाटक में जेडीएस से नाता तोड़ने के बाद तेलंगाना में बीआरएस से नाता तोड़ा। इस नए ट्रेंड से कांग्रेस उन राज्यों में क्षेत्रीय दलों की मजबूरी बन सकती है, जहां मुसलमानों का उल्लेखनीय प्रभाव है।
खरगे की भी बढ़ी चुनौती
अध्यक्ष बनते ही हिमाचल और कर्नाटक में जीत से मल्लिकार्जुन खरगे का पार्टी में कद बढ़ गया था। अब हिंदीपट्टी के तीन अहम राज्य गंवाने के कारण खरगे के नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे। तब खरगे के नेतृत्व में भाजपा से उसके शासन वाले दो राज्य छीने थे। जबकि इस बार राजस्थान और छत्तीसगढ़ की अपनी सत्ता गंवानी पड़ी है। उम्मीद थी कि खरगे मध्यप्रदेश में भी भाजपा को आॅपरेशन लोटस का जवाब देंगे। मप्र व कर्नाटक में पिछली बार त्रिशंकु जनादेश के बाद कांग्रेस की अगुवाई में सरकार बनी थी। हालांकि, बाद में भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली थी।
लगातार सत्ता में नहीं आने का कीर्तिमान कायम
कांग्रेस साल 2011 से लगातार अपनी सत्ता बरकरार रखने में नाकाम रही है। इसके अलावा जिन राज्यों में मुकाबले में सिर्फ भाजपा और कांग्रेस है, वहां 2014 से अब तक कांग्रेस के मुख्यमंत्री लगातार रिपीट नहीं हो पाए हैं। साल 2011 अंतिम मौका था जब असम में कांग्रेस अपनी सरकार बरकरार रखने में कामयाब हुई थी।