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वीवीपैट का डिस्प्ले 7 सेकेंड से ज्यादा बढ़ाने पर चुनाव आयोग की ना!

Sun, 02 Sep 2018 08:42 PM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
हरेन्द्र, नई दिल्ली Updated Sun, 02 Sep 2018 08:42 PM IST
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Election commission is not ready for extending seven seconds to verify votes cast in VVPAT

चुनाव आयोग विपक्षी दलों की इस मांग को खारिज कर सकता है, जिसमें उन्होंने वीवीपैट मशीनों का डिस्प्ले टाइम 7 सेकेंड से ज्यादा करने को कहा था। आयोग का कहना है कि अगर इसे लागू किया जाता है कि तो बूथों के बाहर मतदाताओं की लंबी लाइनें लग जाएंगी। वहीं आयोग ने ईवीएम मशीनों के जरिए बूथ कैप्चरिंग की आशंकाओं को सिरे से खारिज किया है। आयोग का कहना है कि मौजूदा परिपेक्ष्य में ईवीएम मशीनों के साथ यह असंभव है।

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12 से 15 सेकेंड करने की मांग

पिछली 27 अगस्त को चुनाव सुधारों पर आयोजित चुनाव आयोग की सर्वदलीय बैठक में कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने मांग की थी कि वीवीपैट (वेरिफायड पेपर ऑडिट ट्रायल) मशीनों का डिस्प्ले टाइम बढ़ाया जाए। 
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आयोग के सूत्र बताते हैं कि अगर डिस्प्ले का टाइम बढ़ा कर 7 सेंकेड से 15 सेकेंड किया जाता है, तो बूथों के बाहर मतदाताओं की लंबी लाइनें लग जाएंगी, जिससे मतदान प्रक्रिया में देरी होगी। हालांकि आयोग डिस्प्ले के पास एक स्लिप लगाने की योजना बना रहा है, जिस पर ‘वोट डालने के बाद डिस्प्ले पर देखें’ जैसा संदेश लिखा हो। इससे पहले सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस नेता मुकुल वासनिक ने बैठक में वीवीपैट मशीनों का डिस्प्ले टाइम 7 सेकेंड से बढ़ा कर 15 सेकेंड करने की मांग की थी। उनका कहना था कि कई वोटर इस तकनीक से परिचित नहीं हैं। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने भी इसे 12 से 15 सेकेंड करने को कहा था। उनका तर्क था कि वोटरों के लिए इतना कम समय अपर्याप्त है।
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पहले होता था 5 सेंकेड का वक्त

वहीं चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि वीवीपैट को लेकर तकनीकी विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर जुलाई, 2011 में आम मतदाताओं, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, सिविल सोसाइटी संगठनों और मीडिया की मौजूदगी में तिरूअनंतपुरम, दिल्ली, जैसलमेर, चेरापूंजी और लेह इनका फील्ड ट्रायल किया गया। उस वक्त इनका डिस्प्ले टाइम मात्र 5 सेकेंड होता था।

2013 में नगालैंड में वीवीपैट का प्रयोग

आयोग के सूत्र बताते हैं कि पहले फील्ड ट्रायल के बाद समिति की सिफारिश के आधार पर इनमें कुछ परिवर्तन किए गए। जिसके बाद अगस्त, 2012 में उन्हीं जगहों पर इनका दोबारा फील्ड ट्रायल शुरू हुआ, लेकिन इस बार इनका डिस्प्ले पीरियड बढ़ा कर 10 सेकेंड कर दिया गया। लेकिन तकनीकी समिति की सिफारिश पर इनका टाइम घटा कर 7 सेंकेंड कर दिया गया। वहीं तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने 19 फरवरी, 2013 को अपनी बैठक में वीवीपीएटी के आखिरी डिजाइन पर अपनी मुहर लगा दी। वहीं सितंबर 2013 में नगालैंड राज्य के विधानसभा चुनावों में देश में पहली बार वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल किया गया। और वहां इनका रिजल्ट संतोषजनक रहा।

वीवीपैट पर लगेंगे हुड

साथ ही आयोग पेपर ट्रायल मशीन में लगे सेंसर के ऊपर हुड लगाने की योजना बना रहा है, ताकि सेंसर के ऊपर सीधे लाइट न पड़े। इसके अलावा पुरानी वीवीपैट मशीनों में भी ऐसे हुड लगाए जाएंगे। गौरतलब है कि उपचुनावों के दौरान कई बूथों पर वीवीपैट के काम न करने की शिकायतें आई थीं। जांच में पाया गया कि यह तकनीकी खराबी उन मतदान केंद्रों पर पाई गई, जिनमें मशीनें अत्यधिक धूप में रखी गई थीं।

वीवीपैट की ऑडिटिंग का ‘वैज्ञानिक’ हल

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हालांकि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की इस मांग को मान सकता है कि जिसमें उन्होंने वीवीपैट स्लिप की वीवीपैट के कम से कम 30 फीसदी वोटों की जांच कराई जाए। सूत्रों के मुताबिक वीवीपैट वोटों की गणना के प्रतिशत के लिए आयोग ‘वैज्ञानिक’ तरीके से हल निकालने की योजना बना रहा है। प्रतिशत का फॉर्मूला निकालने के लिए आयोग तकनीकी विशेषज्ञों के अलावा इंडियन स्टेटिसटिकल इंस्टीट्यूट से भी सलाह मशविरा करेगा। 

आयोग के सूत्र बताते हैं कि इसके बाद ही फैसला हो पाएगा कि कितने निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपैट की आडिटिंग कराई जाए। फिलहाल आयोग केवल 10 फीसदी वीवीपैट की ही ऑडिटिंग कराता है। सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी ने भी 20 से 30 प्रतिशत वीवीपैट के ऑडिटिंग की मांग की थी। वहीं मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर रखी है, जिसकी अगली सुनवाई 10 सितंबर को होनी है।

ईवीवीएम से बूथ कैप्चरिंग असंभव

वहीं ईवीएम मशीनों के जरिए बूथ कैंप्चरिंग की आशंकाओं को आयोग के सूत्रों ने बिल्कुल निराधार बताया है। सूत्रों का कहना है कि यह बिल्कुल भी संभव नहीं हैं। वह बताते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में पूरी तरह से ईवीएम के साथ वीवीपैट का इस्तेमाल होगा। उनका कहना है कि देश में तकरीबन 9 लाख 93 हजार पोलिंग स्टेशंस हैं। गांवों में 1200 मतदाताओं पर एक पोलिंग स्टेशन और शहरी क्षेत्र में 1400 मतदाताओं पर एक पोलिंग स्टेशन बनाया जाता है। 

राजनीतिक दलों का यह कहना कि ईवीएम से बस बटन दबा कर बूथ कैंप्चरिंग की जा सकती है, ऐसा असंभव है। सूत्रों के मुताबिक पुराने वक्त में बैलेट पेपर के जरिए वोटिंग होने पर यह संभव था कि बस बैलेट पेपर पर मुहर लगानी है और मतदाता पेटी में डालते जाना है।

15 सेकेंड बाद ही डाल सकते हैं दूसरा वोट

वह कहते हैं कि नई ईवीएम मशीनों में प्रत्येक वोट डालने के बाद 15 सेकेंड का प्रोसेस है। यानी कि 15 सेकेंड पहले दूसरा वोट नहीं डाला जा सकता। उदाहरण के लिए अगर 1200 वोटरों वाले पोलिंग स्टेशन पर कोई बूथ कैप्चरिंग की कोशिश करता है, तो उसे बारह सौ वोट डालने के लिए 4 से 5 घंटे का वक्त चाहिए। 

मतदान केंद्रों में सुरक्षा बलों की कड़ी तैनाती में ऐसा करना संभव ही नहीं है। गौरतलब है कि चुनाव आयोग के मुताबिक 16वीं लोकसभा के लिए देश के 9 लाख 93 हजार पोलिंग बूथों के लिए 10 लाख पोलिंग अधिकारियों की जरूरत पड़ी थी। वहीं आयोग ने केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की 1349 कंपनियां तैनात की थीं।
 
एक ईवीएम की कीमत 33 हजार 200 रुपए

गौरतलब है कि लॉ कमीशन ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2019 में लोकसभा चुनावों में तकरीबन 10 लाख पोलिंग बूथ बनाने होंगे और तकरीबन 13 लाख बैलेट यूनिट्स, 9.4 लाख कंट्रोल यूनिट्स और तकरीबन 12.3 लाख वीवीपैट मशीनों की जरूरत होगी। एक इलैक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन की कीमत 33 हजार 200 रुपए पड़ती है। चुनाव आयोग का कहना है कि साथ चुनाव होते हैं तो अकेले ईवीएम पर ही 4 हजार 555 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

किसे डाला वोट दिखेगा डिस्प्ले पर

वीवीपैट मशीन में वोट डालने के बाद मतदाता स्लिप पर उस पार्टी का निशान देख सकता है, जिसे उसने वोट दिया, जिससे कंफर्म होगा कि वोट किसे गया है। यह केवल वोटर को ही पता चलेगा। इसके लिए केवल 7 सेकेंड का ही वक्त मिलेगा, जिसके वोटिंग स्लिप वीवीपैट मशीन में लगे बॉक्स में पर्ची चली जाएगी। बॉक्स सील रहेगा और अगर बाद में कोई प्रत्याशी ओर दल आपत्ति जताते हैं तो इसे खोला जाएगा।

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