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8वां थिएटर ओलंपिक – सवाल कई, संभावनाएं नई

Tue, 27 Feb 2018 07:05 PM IST
अतुल सिन्हा/ अमर उजाला
अतुल सिन्हा/ अमर उजाला Updated Tue, 27 Feb 2018 07:05 PM IST
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Eighth theater olympic - many questions, New possibilities
थिएटर फाइल फोटो
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे 8वें थिएटर ओलंपिक का जितना शोर है और जिस भव्यता के साथ इसे प्रचारित किया गया है, वहां घूमते हुए आपको यही एहसास होगा मानो आप किसी मेले में आ गए हों। तमाम तरह के फूड स्टॉल्स और थिएटर के साथ साथ हैंडिक्राफ्ट और कलात्मक सामानों के स्टॉल्स। एनएसडी जैसा प्रतिष्ठित नाट्य प्रशिक्षण संस्थान एक तरह से व्यापार मेले में तब्दील होता सा नजर आ रहा है। आयोजन भी एक या दो दिन का नहीं बल्कि करीब दो महीनों का।
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इससे पहले लगातार 19 सालों तक यहां भारत रंग महोत्सव होता रहा है, 12 दिनों के इस उत्सव का फलक भी कम व्यापक नहीं होता था और बाहर के देशों की भी इसमें बाकायदा हिस्सेदारी होती थी। लेकिन कुछ नया और बड़ा करना है और थिएटर को भी ओलंपिक जैसे ब्रांड की श्रेणी में ला खड़ा करना है, इसलिए भारत रंग महोत्सव की जगह इस बार थिएटर ओलंपिक हो रहा है। दिल्ली समेत 17 शहरों में होने वाले 450 नाटकों के शोज, 8 सेमीनार और तमाम कार्यशालाएं। आयोजन बड़ा है तो जाहिर है इससे जुड़े सवाल भी कई हैं।
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दरअसल कला-संस्कृति के तमाम संस्थानों की भीतरी सियासी जंग को बाहर से समझना मुश्किल है। इसके लिए आपको उन संस्थानों के भीतर के उन असंतुष्ट आत्माओं से मिलना पड़ता है जो आयोजन पर सवाल उठाते हैं, इसे दिखावा बताते हैं और इसे कलाकारों से ज्यादा सरकार की नजर में अपना ‘क्रेडिट स्कोर’ बढ़ाने वाले ‘अफसरों’ का खेल साबित करते हैं। एनएसडी के कुछ छात्र ऐसे भी मिलते हैं जो थिएटर ओलंपिक को उत्साह बढ़ाने वाला तो मानते हैं, लेकिन इसे अपने कैंपस से अलग कहीं और आयोजित करने को ज्यादा सही बताते हैं। 
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उनके मुताबिक इससे यहां के शैक्षिक माहौल पर फर्क पड़ता है और उनके मुताबिक अगर पूरा एनएसडी प्रशासन इसी आयोजन में लगा रहेगा, बाहरी लोगों को इसके ठेके दिए जाने से कैंपस में लगातार बाहरी लोगों का दबदबा रहेगा तो फिर दो महीने यहां के छात्र करेंगे क्या। किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में फेस्ट होते हैं, लेकिन एकाध दिनों के लिए। छात्रों को मौज मस्ती अच्छी भी लगती है, लेकिन इतनी भी नहीं। हां, इस ओलंपिक में हो रही कुछ पहल जो छात्रों को पसंद आ रही है और फायदेमंद लग रही है, वो है यहां होने वाले मास्टर क्लासेज और हर शो के बाद होने वाली डायरेक्टर्स मीट।

नाटक सीखने वालों और दिलचस्पी रखने वालों के लिए बेहद फायदेमंद हैं

Eighth theater olympic - many questions, New possibilities
थिएटर ओलंपिक
इसे लेकर एनएसडी के निदेशक वामन केन्द्रे भी खासे उत्साहित हैं। केन्द्रे का कहना है कि इस ओलंपिक के दौरान हम नाटकों के अलावा ढेर सारी शैक्षिक कार्यक्रम चला रहे हैं– चाहे वो 60 से ज्यादा लिविंग लिजेंड का आना और अपने अनुभव बांटना हो, 50 से ज्यादा मास्टर क्लासेज हों या तमाम तरह की कार्यशालाएं हों। ये सब छात्रों, नाटक सीखने वालों और दिलचस्पी रखने वालों के लिए बेहद फायदेमंद हैं।

अक्सर हम रंगमंच की हालत का रोना रोते हैं, इसके सामने टीवी, फिल्म और इंटरनेट की चुनौतियों का हवाला देते हैं और अक्सर हर कोशिश को नकारात्मक चश्मे से देखते हैं, साथ ही ये भी कहते हैं कि सरकार कला-संस्कृति के लिए या रंगमंच के लिए कुछ करती ही नहीं। ऐसे में अगर एनएसडी और संस्कृति मंत्रालय ऐसी पहल कर रहा है तो इसमें से वाकई संस्कृति की बेहतरी के लिए क्या सकारात्मक हो सकता है, इसे भी देखना जरूरी है। 

इस मामले में एनएसडी के अध्यक्ष रहे और वरिष्ठ रंगकर्मी रतन थियम की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने कई सालों से अपनी मेहनत को जमीन पर उतारा। थियम अंतर्राष्ट्रीय थिएटर ओलंपिक समिति में भारत के अकेले प्रतिनिधि हैं और उन्होंने लगातार ये कोशिश जारी रखी कि थिएटर ओलंपिक भारत में हो, जिससे रंगमंच और रंगकर्म को आम लोगों के करीब तो पहुंचाया ही जा सके, इसे एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय फलक भी दिया जा सके।

ये कोशिश कुछ हद तक तो कामयाब होती हुई ज़रूर दिखती है क्योंकि इस बहाने इंटरनेट के ज़माने में नाटकों की जीवंतता को बरकरार रखना और इन चुनौतियों के बीच रंगमंच की गरिमा बनाए रखना एक बड़ा काम है। आलोचनाएं तो हर बड़े और सरकारी आयोजनों की होती है, लेकिन इसके सकारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो बेशक इसे एक बेहद सार्थक पहल के तौर पर देखा जा सकता है।
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