{"_id":"62f22bb4b3b7fb65805eecd6","slug":"economic-impact-assessment-essential-before-distribution-of-freebies","type":"story","status":"publish","title_hn":"Election Freebies: चुनावी खैरात बांटने से पहले आर्थिक प्रभाव का आकलन जरूरी, सुप्रीम कोर्ट में दलील","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Election Freebies: चुनावी खैरात बांटने से पहले आर्थिक प्रभाव का आकलन जरूरी, सुप्रीम कोर्ट में दलील
Tue, 09 Aug 2022 03:11 PM IST
सुरेंद्र जोशी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Tue, 09 Aug 2022 03:11 PM IST
सार
यह दलील वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में दी गई है। याचिका में विवेकहीन मुफ्त उपहारों के वादे करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
देश में चुनावों से पहले जनता को मुफ्त उपहार देने या चुनावी खैरात के वादों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इसमें सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करे, जो बगैर बजट प्रावधानों के किए जाने वाले इन वादों के आर्थिक प्रभाव का आकलन करे।
विज्ञापन
यह दलील वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में दी गई है। याचिका में विवेकहीन मुफ्त उपहारों के वादे करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से उनके वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि देश की दो सर्वोच्च आर्थिक संस्थाओं ने राज्यों द्वारा उचित वित्तीय व बजटीय प्रबंधन के बगैर लंबे समय तक मुफ्त में चीजें बांटने पर चिंता जताई है।
विज्ञापन
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकारें अनुच्छेद 293(3) और (4) के प्रावधानों का पालन किए बगैर और भारत सरकार का उन पर ऋण बकाया होने पर भी पैसा उधार ले रही हैं। याचिका में राज्य सरकारों को कर्ज सुविधाएं प्रदान करने के लिए 'क्रेडिट रेटिंग प्रणाली' शुरू करने समेत उक्त प्रावधानों का कड़ाई से पालन कराने पर जोर दिया गया है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने तीन अगस्त को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, नीति आयोग, वित्त आयोग और आरबीआई जैसी संस्थाओं से चुनावों के दौरान मुफ्त में उपहार या सेवाएं देने के वादों पर विचार-मंथन और इससे निपटने के लिए रचनात्मक सुझाव देने को कहा है। शीर्ष कोर्ट ने इस मामले से निपटने के लिए सरकार को उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी बनाने का आदेश देने का संकेत दिया था। शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को इस पर विचार करना चाहिए और सुझाव देना चाहिए ताकि वह इस मुद्दे के समाधान के लिए एक निकाय का गठन कर सके।
कोर्ट ने 25 जनवरी को इस जनहित याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा था। इसमें चुनाव से पहले मुफ्तखोरी के विवेकहीन वादों करने वाले किसी भी दल का चुनाव चिह्न जब्त करने या उसका पंजीयन निरस्त करने की भी मांग करने का निर्देश देने का आग्रह किया है। याचिका में कहा गया है कि मुफ्त के वादों को पूरा करने की धनराशि का बजट नियमित बजट से आगे निकल जाता है।
दरअसल, पंजाब सहित पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों से भी ऐसी एक याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया है कि मतदाताओं से अनुचित राजनीतिक लाभ पाने के लिए लोकलुभावन वादों पर पूर्ण पाबंदी होना चाहिए। इनसे संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है। इसलिए चुनाव आयोग को इनके खिलाफ कदम उठाना चाहिए।