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जम्मू-कश्मीर के कई सरकारी विभागों में हैं स्लीपर सेल के मददगार, इंजीनियरिंग के छात्र भी शामिल

Mon, 19 Aug 2019 07:19 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 19 Aug 2019 07:19 PM IST
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Due to threat from Sleeper Cells, Centre is planning to start the internet in few areas of J&K
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद लगाई गई बंदिशों को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है। लेकिन घाटी का माहौल बिगाड़ने वाले स्लीपर सेल सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन गए हैं। ये वही स्लीपर सेल हैं, जो पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों और कश्मीरी अलगाववादियों के बीच कड़ी का काम करते हैं। सुरक्षा एजेंसियां इस बात को मानती हैं कि मोबाइल इंटरनेट चालू होते ही ये स्लीपर सेल घाटी का माहौल बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे।

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सभी जगह नहीं चलेगा मोबाइल इंटरनेट

सोमवार को जम्मू कश्मीर को लेकर गृह मंत्रालय में हुई उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि घाटी में फिलहाल सभी जगहों पर मोबाइल इंटरनेट चालू नहीं किया जाएगा। हालांकि जम्मू-कश्मीर के कई राजनीतिक दलों भी अप्रत्यक्ष तौर पर इस कड़ी का हिस्सा बताए गए हैं। स्लीपर सेल में कथित रूप से राजस्व, वन, शिक्षा एवं खेल, परिवहन, दूरसंचार और लोक निर्माण आदि महकमों के कई कर्मी शामिल हैं।

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बकरीद पर मिले थे संकेत

खुफिया एजेसियों के सूत्रों का कहना है कि कश्मीर में ऐसे स्लीपर सेल सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। इससे पहले भी वहां बकरीद पर जब कुछ समय के लिए मोबाइल इंटरनेट की 2जी सेवा चालू की गई थी, तो कुछ ही देर में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिले थे। हालांकि मौजूदा वक्त में ज्यादातर अलगाववादी नेता नजरबंद हैं, लेकिन उनके समर्थक और स्लीपर सेल पूरी तरह सक्रिय हैं।

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स्लीपर सेल के 400 कर्मी जांच एजेंसियों के रडार पर

एजेंसियों को कहना है कि जैसे ही इन्हें मोबाइल इंटरनेट की सुविधा मिलेगी, ये घाटी का माहौल ख़राब करना शुरु कर देंगे। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि आतंकियों को धन और दूसरी तरह की मदद पहुंचाने, पत्थरबाजों को तैयार करने,  हैंड ग्रेनेड फेंकने के लिए स्कूल-कालेजों के छात्रों को बरगलाने और विभिन्न मौकों पर नारेबाजी एवं प्रदर्शन करने जैसे कार्य स्लीपर सेल को सौंपे जाते हैं। शिक्षा विभाग, परिवहन और वन महकमे के करीब 400 कर्मी जांच एजेंसियों की रडार पर हैं। एनआईए इनकी जांच कर रहा है।

स्लीपर सेल से जुड़े हैं इंजीनियरिंग के कुछ छात्र

कश्मीर में लंबे समय से तैनात सीआरपीएफ की खुफिया विंग के एक अधिकारी का दावा है कि ये स्लीपर सेल अब काफी आगे निकल चुके हैं। इनमें से कई तो दूरसंचार इंजीनियरिंग के मास्टर हैं। स्लीपर सेल से जुड़े इंजीनियरिंग के कुछ छात्र अलगाववादियों के तोड़फोड़ मिशन को सोशल मीडिया के जरिए आगे बढ़ाते हैं। इन्होंने अपने टेलीग्राम चैनल भी शुरु कर रखे हैं। एनआईए और आईबी ऐसे कई चैनलों से पर्दा हटा चुकी है।

स्लीपर सेल को इंटरनेट शुरू होने का इंतजार

इनमें से एक टेलीग्राम चैनल तो आतंकी संगठन अल कायदा से जुड़ा था। इनके बाद आईएस के भी इसी तरह के चैनल पकड़े जा चुके हैं। अंसार-गजवत-उल-हिंद ने भी सोशल मीडिया पर घाटी का माहौल ख़राब करने का प्रयास किया था। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, जब से घाटी के अलगाववादी नेताओं और राजनीतिक दलों के नेताओं को नजरबंद किया गया है, तभी से ये स्लीपर सेल सक्रिय हो उठे हैं। घाटी में जिस तरह की चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था है, उसे देखते हुए इनमें सीधे तौर पर विरोध-प्रदर्शन करने की हिम्मत नहीं है, जिसके चलते ये सेल अब मोबाइल इंटरनेट सेवा चालू होने का इंतजार कर रहे हैं।

सैकड़ों मोबाइल नंबर सर्विलांस पर

इन स्लीपर सेल से जुड़े लोगों को ढूंढ निकालने के लिए जम्मू कश्मीर पुलिस, अर्धसैनिक बल और इंटेलीजेंस एजेंसियों ने एक संयुक्त ऑपरेशन शुरु किया है। संदेह के आधार पर सैकड़ों मोबाइल नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया है। एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि दूरसंचार विभाग और आईटी के ऐसे कौन एक्सपर्ट हैं, जो नियमों के उलट जाकर स्लीपर सेल को मदद देते हैं। जम्म- कश्मीर के सरकारी विभागों में एजेंसियों की टीम पहुंच रही है। साथ ही, यह भी पता लगाया जा रहा है कि सेटेलाइट फोन तकनीक इन्हें कौन मुहैया करा रहा है।

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