फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Due to high minimum support price on Rice and wheat Farmers of Punjab leaving others crops, experts suggest changing strategy

MSP के पीछे भागने से पंजाब को हो रहा ये भारी नुकसान, कहीं दूसरे किसान भी तो नहीं कर रहे ये गलती!

Wed, 06 Jan 2021 07:43 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 06 Jan 2021 07:43 PM IST
सार

न्यूनतम समर्थन मूल्य के लालच में किसान केवल धान-गेहूं के उत्पादन को दे रहे प्रमुखता, इससे अन्य फसलों के उत्पादन में आई भारी गिरावट, मृदा शक्ति, जल संरक्षण की दृष्टि से नुकसानदेह है ये तरीका...

विज्ञापन
Due to high minimum support price on Rice and wheat Farmers of Punjab leaving others crops, experts suggest changing strategy
धान पर सरकार सबसे ज्यादा एमएसपी देती है - फोटो : अमर उजाला/iStock

विस्तार

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) व्यवस्था का सबसे ज्यादा लाभ पंजाब और हरियाणा के किसानों ने उठाया है। लेकिन इसका गंभीर दुष्परिणाम यह हुआ है कि पंजाब के किसानों ने ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य की लालच में केवल गेहूं-धान की फसलों के उत्पादन को ही प्रमुखता दी और अन्य फसलों का उत्पादन बहुत कम कर दिया।

विज्ञापन


आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में धान का उत्पादन 1960-61 के 4.8 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया, जबकि इसी दौरान मक्का का उत्पादन 6.9 फीसदी से घटकर 1.4 फीसदी ही रह गया। इसी प्रकार पंजाब ने गेहूं के उत्पादन में 27.3 से 44.9 फीसदी तक की शानदार बढ़ोतरी की तो दालों का उत्पादन 19 फीसदी से घटकर केवल 0.4 फीसदी रह गया।
विज्ञापन


विशेषज्ञ इस परंपरा को कृषि विविधता, मृदा शक्ति संरक्षण और स्वयं किसान की आर्थिक तरक्की में बड़ी बाधा मानते हैं। उनकी राय है कि हर प्रकार की फसलों के उत्पादन को प्रमुखता दी जानी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह भी पढ़िए: क्या ज्यादा MSP के लालच में किसानों ने बढ़ाया धान-गेहूं का उत्पादन? जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पंजाब से प्राप्त जानकारी के अनुसार 1960-61 के समय पंजाब में कुल फसल उत्पादन का 4.8 फीसदी हिस्सा धान का हुआ करता था, जो हरित आंदोलन अपनाए जाने के बाद 1970-71 में 6.9 फीसदी, 1980-81 में 17.5 फीसदी, 1990-91 में 26.9 फीसदी, 2000-01 में 31.3 फीसदी और 2018-19 में 39.6 फीसदी हो गया।

इसी प्रकार गेहूं के उत्पादन में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई। जानकारी के मुताबिक 1960-61 में पंजाब में 27.3 फीसदी उत्पादन गेहूं का हुआ करता था, जो 1970-71 में 40.5 फीसदी, 2000-01 में 43.1 फीसदी, 2018-19 में 44.9 फीसदी हो गया।

इन फसलों के उत्पादन में आई कमी

इसी दौरान अन्य फसलों के उत्पादन में रिकॉर्ड कमी दर्ज की गई है। 1960 के दशक की तुलना में 2018-19 में मक्का का उत्पादन 6.9 फीसदी से 1.4 फीसदी हो गया। इसी प्रकार तेल उत्पादक फसलों का उत्पादन 3.9 फीसदी से 0.5 फीसदी हो गया। कपास की फसल का उत्पादन 9.4 फीसदी से 5.1 फीसदी और अन्य फसलों का उत्पादन 17.7 फीसदी से 2.4 फीसदी हो गया।

Due to high minimum support price on Rice and wheat Farmers of Punjab leaving others crops, experts suggest changing strategy
मक्के का उत्पादन - फोटो : अमर उजाला

पानी की खपत में वृद्धि

जल विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं-धान की फसलों के उत्पादन को बहुत अधिक महत्व दिए जाने के कारण यहां की जलशक्ति का बहुत ज्यादा उपयोग हो रहा है। इससे इन राज्यों में जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और यह बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। अगर किसान गेहूं-धान की पारंपरिक फसलों की बजाय अन्य फसलों का उत्पादन करें तो इससे आर्थिक लाभ में वृद्धि होगी और जल शक्ति की भी बचत होगी।

वैज्ञानिकों ने बताई ये चौंकाने वाली वजह

द इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी पूसा इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक अनिल दुबे ने अमर उजाला को बताया कि किसी भी खेत में एक ही प्रकार की फसल को लगातार बोने से उसकी मृदा शक्ति कमजोर होती है। इससे इस फसल की उत्पादकता में भी कमी आती है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग फसलों की जड़ों की लंबाई अलग-अलग होती है। जिस प्रकार की जड़ वाली फसल लगातार बोई जाती है, मिट्टी के उस स्तर पर उर्वरता कम होती चली जाती है, जबकि मिट्टी के अलग स्तर पर उर्वरता बनी रहती है।



अगर एक बार गहरी जड़ वाली और दूसरी बार मध्यम या लघु जड़ वाली फसल बोई जाए तो अलग-अलग स्तर की उर्वरता का उपयोग होता है, साथ ही दो फसलों के बीच में एक स्तर की मिट्टी को अपनी उर्वरता फिर से प्राप्त करने का समय मिल जाता है। इससे अलग-अलग फसलों को बोने से मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता बरकरार रहती है। जबकि एक ही प्रकार की फसल बोने से उर्वरता दुबारा नहीं प्राप्त हो पाती और इसमें कमी आती है।

Due to high minimum support price on Rice and wheat Farmers of Punjab leaving others crops, experts suggest changing strategy
गेहूं का उत्पादन - फोटो : अमर उजाला

वैज्ञानिक अनिल दुबे के मुताबिक, गेंदा जैसी कई फसलों की जड़ों में कीटों के मारने की भी शक्ति होती है। अगर कुछ फसलों के बीच एक बार गेंदे की फसल बोई जाए, तो इससे आमदनी में भी वृद्धि होती है, साथ ही अगली फसल के लिए कीटनाशकों के उपयोग की भी कम आवश्यकता रहती है। इसके कीटनाशी गुणों से केवल हानिकारक कीट ही खत्म होते हैं, अच्छे कीट बने रहते हैं, जबकि रासायनिक कीटनाशकों का नुकसान ये होता है कि उनके उपयोग से अच्छे कीट भी मर जाते हैं जो फसल के लिए हानिकारक होते हैं।



इसी प्रकार दाल-तिलहन की फसलों में लेग्यूमिनस कीट होते हैं जो मिट्टी में नाइट्रोजन क्षमता को बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए किसी भी खेत में दो-तीन फसलों के बाद एक बार लेग्यूमिनस फसलों का उत्पादन किया जाना चाहिए। अलग-अलग फसलों के उत्पादन से इनमें पानी की खपत भी काफी कम होती है, जबकि गेहूं-धान की फसलों में ज्यादा मात्रा में पानी का उपयोग होता है, जो किसी राज्य-देश के लिए नुकसानदायक होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed