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Tamil Nadu: 'गवर्नर पर समयसीमा को लेकर कोर्ट ने टिप्पणी की', DMK सांसद बोले- फैसले के रूप में नहीं देखना चाहिए
Thu, 20 Nov 2025 10:29 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Thu, 20 Nov 2025 10:29 PM IST
सार
तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके ने सुप्रीम कोर्ट की इस राय को गैर-बाध्यकारी बताया है जिसमें कहा गया कि गवर्नरों पर बिलों पर निर्णय लेने की समयसीमा लागू नहीं की जा सकती। डीएमके का कहना है कि यह कोई फैसला नहीं बल्कि सिर्फ एक मत है, जो अप्रैल 2025 के तीन महीने वाली समयसीमा वाले फैसले को प्रभावित नहीं करता।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
तमिलनाडु की राजनीति में गवर्नर की भूमिका और राज्य सरकार के बिलों को मंजूरी देने की समयसीमा को लेकर विवाद एक बार फिर गहरा गया है। गुरुवार को सत्ताधारी द्रमुक (डीएमके) ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी पर सख्त प्रतिक्रिया दी जिसमें कहा गया था कि गवर्नरों पर किसी तरह की समयसीमा लागू नहीं की जा सकती। पार्टी ने स्पष्ट किया कि यह कोई फैसला नहीं बल्कि केवल एक मत है, जो अदालतों के लिए बाध्यकारी नहीं है।
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चेन्नई में पत्रकारों से बात करते हुए डीएमके सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के संदर्भ पर दी गई यह राय संवैधानिक प्रावधानों के तहत है और इसे फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना था कि यह राय न्यायिक प्रक्रिया में बाध्यकारी नहीं है और अदालतें किसी भी मामले की सुनवाई के दौरान इससे बंधी नहीं रहेंगी। उन्होंने 1974 के अहमदाबाद सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज मामले के फैसले का हवाला देकर यह बात मजबूत की।
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पुराने फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा
डीएमके नेता ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय के पैरा 26 में स्पष्ट कहा है कि यह टिप्पणी अप्रैल 2025 के उस फैसले को प्रभावित नहीं करेगी, जिसमें न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की अगुवाई वाले पीठ ने राष्ट्रपति और गवर्नरों को राज्य बिलों पर निर्णय लेने के लिए तीन महीने की समयसीमा तय की थी। इस फैसले के आधार पर तमिलनाडु सरकार ने 12 अप्रैल 2025 को 10 अधिनियमों को अधिसूचित किया था जिन्हें विधानसभा ने दोबारा पारित करके राष्ट्रपति के पास भेजा था।
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किन बिलों पर विवाद जारी है?
ये 10 बिल मुख्य रूप से राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति की शक्तियां गवर्नर-चांसलर से हटाकर राज्य सरकार को देने से जुड़े थे। इनमें तमिलनाडु फिशरीज यूनिवर्सिटी एक्ट और तमिलनाडु वेटनरी एंड एनिमल साइंसेस यूनिवर्सिटी एक्ट में संशोधन शामिल है। साथ ही तमिलनाडु डॉ. अंबेडकर लॉ यूनिवर्सिटी अधिनियम में संशोधन भी इन्हीं में से एक था। इन अधिनियमों पर मद्रास हाई कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाई थी, जिसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
राज्यपाल कार्यालय की सफाई
कुछ दिन पहले राजभवन ने उन आरोपों को खारिज किया था जिनमें कहा गया था कि राज्यपाल आर.एन. रवि विधानसभा से पारित बिलों पर मंजूरी देने में देरी कर रहे हैं। राजभवन के मुताबिक 31 अक्तूबर 2025 तक प्राप्त बिलों में से 81 प्रतिशत बिलों को मंजूरी दे दी गई थी। राजभवन ने कहा कि गवर्नर की कार्रवाई को ‘जनविरोधी’ बताना तथ्यों के खिलाफ है।
राजनीतिक टकराव का बढ़ता दायरा
डीएमके का यह बयान स्पष्ट संकेत है कि राज्य सरकार और राजभवन के बीच बिलों और संवैधानिक दायित्वों को लेकर तनातनी आगे भी बढ़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट की राय और पहले से मौजूद फैसले की व्याख्या को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या पर अड़े हैं। राज्य सरकार का कहना है कि गवर्नर द्वारा फैसले में देरी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करती है। मामला अब एक बार फिर न्यायिक और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर गरमाया हुआ है।