केंद्रीय सुरक्षा बलों से आवास खाली कराने को अड़ा शहरी विकास मंत्रालय, जवानों के परिजनों को संक्रमण का खतरा!
बीएसएफ डीजी ने तो केंद्रीय गृह सचिव को लिखा था कि वे इस मामले में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय से बात करें। डीजी ने तो इतना भी कहा कि तीन साल वाली शर्त हटा दी जाए...
विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ और बीएसएफ में बहुत से कर्मी ऐसे हैं, जो नक्सल प्रभावित क्षेत्र, कश्मीर या उत्तर-पूर्व जैसे जोखिम भरे इलाकों में ड्यूटी दे रहे हैं। इनके परिवार दिल्ली में शहरी विकास मंत्रालय की तरफ से अलॉट सरकारी आवासों में रहते हैं।
अब उन्हें आवास खाली करने का नोटिस थमा दिया गया है। अगर वे मकान खाली नहीं करते हैं, तो उन्हें हर महीने करीब 32 हजार रुपये जमा कराने होंगे। इस वजह से दोनों बलों के कर्मी दिल्ली हाईकोर्ट में चले गए हैं। अगस्त माह की 11 तारीख को मामले की सुनवाई होगी।
केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों का कहना है कि अभी देश में कोरोना वायरस का संक्रमण खत्म नहीं हुआ है। वे अपनी ड्यूटी पर हैं। शहरी विकास मंत्रालय के 'डायरेक्टोरेट ऑफ एस्टेट' ने सरकारी आवास खाली करने का नोटिस जारी कर दिया। बल कर्मियों को 30 जून तक मकान खाली करने के लिए कहा गया।
बता दें कि दिल्ली में जिन कर्मियों के परिजनों को सरकारी आवास मिला है, वे जोखिम भरे इलाकों में ड्यूटी करते हैं। इसी वजह से उन्हें तीन साल के लिए दिल्ली में सरकारी आवास दे दिया जाता है। दरअसल, शहरी विकास मंत्रालय जिस नियम के तहत सिविल स्टाफ के लिए आवास अलॉट करता है, उसी के जरिए सुरक्षा बलों को भी मकान मिलता है।
दोनों की ड्यूटी में बहुत फर्क है। सिविल स्टाफ अपनी सर्विस का अधिकांश समय दिल्ली में ही पूरा करता है, केवल विभाग बदलता रहता है। ऐसे में उसे रिटायरमेंट तक सरकारी आवास मिलता है। दूसरी ओर, केंद्रीय सुरक्षा बल हैं। इनके वे कर्मी जो जोखिम भरे इलाकों में तैनात होते हैं, उनके परिवारों को दिल्ली में केवल तीन साल के लिए सरकारी आवास की सुविधा दी जाती है।
अधिकांश कर्मी अभी तक नक्सल, उत्तर-पूर्व या कश्मीर में तैनात हैं। अब ऐसे हालात में वे सरकारी आवास कैसे खाली करें। बीएसएफ के एक अधिकारी के अनुसार, हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। हमारी ड्यूटी बहुत सख्त है। रोजाना किसी न किसी ऑपरेशन में जाना पड़ता है। कोई आतंकवादियों से लड़ रहा है, तो दूसरा कर्मी नक्सलियों से लोहा ले रहा है। उत्तर पूर्व में भी यही स्थिति रहती है। वहां भी जोखिम कम नहीं होता।
सरकारी आवास छोड़ने से परिजनों की सुरक्षा खतरे में
सीआरपीएफ के एक अधिकारी के मुताबिक जोखिम वाले इलाकों में हमें कई तरह के खतरों से गुजरना पड़ता है। धमकियों के अलर्ट आते हैं, ऐसे में परिजनों को साथ नहीं रख सकते। वजह, आप बेहतर समझ सकते हैं। जिस जगह पर ड्यूटी होती है, वहां कोई भरोसा नहीं होता कि कब हमला हो जाए।
सड़क से कोई ग्रेनेड फेंक दे। दूसरे कई तरह के जोखिम होते हैं। इन सब के चलते हम अपने परिवारों को दिल्ली में छोड़ आते हैं। बीएसएफ डीजी ने तो केंद्रीय गृह सचिव को लिखा था कि वे इस मामले में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय से बात करें। डीजी ने तो इतना भी कहा कि तीन साल वाली शर्त हटा दी जाए।
इसके बाद भी मंत्रालय ने अपने आदेश वापस नहीं लिए, बल्कि कर्मियों को आवास खाली करने के लिए दो माह का समय दे दिया। यानी 31 अगस्त तक वे सरकारी मकान में रह सकते हैं। कई कर्मी ऐसे हैं, जिनके बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे हैं, मां-बाप का इलाज चल रहा है, ऐसे में अब वे दूसरी जगह कैसे शिफ्ट करेंगे।
मजबूरन, कर्मियों को अदालत की शरण लेनी पड़ी। अभी तो उन्हें सरकारी आवास के लिए हर माह साढ़े सात सौ रुपये देने पड़ते हैं। अगस्त के बाद उन्हें 32 हजार रुपये देने पड़ सकते हैं। कर्मियों की मांग थी कि उन्हें अगले वित्तीय वर्ष तक सरकारी आवास में रहने दिया जाए। हालांकि अब मामला अदालत में चला गया है।