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कृषि कानून से लेकर प्रधान की विदाई तक: बीते 12 साल में मोदी सरकार ने कब-कब पीछे खींचे कदम? जानें पूरा इतिहास

Sat, 25 Jul 2026 08:27 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Sat, 25 Jul 2026 08:27 PM IST
सार

नीट पेपर लीक विवाद के बाद उपजे छात्र आंदोलन और जन-आक्रोश के आगे झुकते हुए आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 2014 से लेकर 2026 तक का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि चाहे भूमि कानून हो, कृषि बिल या लैटरल एंट्री विवाद, जनता और राजनीतिक सहयोगियों का दबाव बनने पर शक्तिशाली मोदी सरकार को भी कई बार अपनी नीतियां और फैसले वापस लेने पड़े हैं।
 

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केंद्र सरकार ने मानी छात्रों की मांग - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता में आए 12 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस दौरान सरकार ने कई बड़े और विवादित फैसले लिए। कुछ फैसले लागू हुए, कुछ पर लंबी राजनीतिक लड़ाई चली और कुछ ऐसे भी रहे, जिन पर भारी विरोध के बाद सरकार को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा। अब 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी कड़ी में नया अध्याय बन गया है।
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नीट-यूजी पेपर लीक और परीक्षा की विश्वसनीयता पर उठे सवालों के बाद देश भर में छात्रों का आंदोलन तेज हुआ। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आंदोलन ने प्रधान के इस्तीफे को अपनी प्रमुख मांग बनाया। विपक्ष भी इस मांग के साथ खड़ा हो गया। आखिरकार प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। लेकिन क्या इसे सीधे-सीधे 'मोदी सरकार झुक गई' कहना सही होगा?
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यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प सवाल है। क्योंकि प्रधान ने अपने इस्तीफे को सरकार की हार के तौर पर पेश नहीं किया। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि पिछले दिनों की घटनाओं से वह बेहद दुखी हैं और छात्रों के भविष्य को लंबे राजनीतिक और कानूनी विवाद में फंसने से बचाने के लिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। यानी राजनीतिक तौर पर आंदोलन इसे अपनी जीत बता रहा है, जबकि सरकार की ओर से इसे जिम्मेदारी लेने और स्थिति को सामान्य करने के कदम के रूप में देखा जा सकता है।
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पहले समझिए, नीट विवाद इतना बड़ा कैसे बना?
नीट-यूजी 2026 परीक्षा तीन मई को हुई थी। परीक्षा के बाद पेपर से जुड़ी सामग्री के कथित तौर पर परीक्षा से पहले प्रसारित होने की शिकायत सामने आई। शिक्षा मंत्रालय की शिकायत पर सीबीआई ने 12 मई को मामला दर्ज किया और इसे आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, सबूत नष्ट करने और सार्वजनिक परीक्षा में अनुचित साधनों से जुड़े आरोपों के तहत जांच में लिया।

विवाद इतना बढ़ा कि नीट-यूजी 2026 की परीक्षा रद्द करनी पड़ी और दोबारा परीक्षा कराने का फैसला हुआ। करीब 22-23 लाख छात्रों पर इसका असर पड़ा। यानी यह सिर्फ पेपर लीक का मामला नहीं रहा, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य, उनकी तैयारी, फीस, करियर और मेडिकल कॉलेज में दाखिले से जुड़ा संकट बन गया। इसके बाद आंदोलन तेज होता गया।

छात्रों का कहना था कि परीक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्रालय की है, इसलिए जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। धीरे-धीरे आंदोलन की सबसे बड़ी मांग बन गई, धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। सरकार ने जांच, परीक्षा रद्द करने और दोबारा परीक्षा जैसे कदम उठाए, लेकिन आंदोलन शांत नहीं हुआ। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से विरोध का स्वर तेज हुआ और विपक्ष ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया। अंततः 25 जुलाई को प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। यहीं से सवाल उठता है कि क्या यह मोदी सरकार का एक और बड़ा ‘क्लाइंब डाउन’ है? इसका जवाब जानने के लिए 2014 के बाद की कुछ बड़ी घटनाओं को समझना होगा।



2015: भूमि अधिग्रहण कानून पर सरकार ने क्यों खींचे कदम?
मोदी सरकार के शुरुआती दौर में भूमि अधिग्रहण कानून सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में शामिल रहा। सरकार का तर्क था कि विकास परियोजनाओं, सड़क, रेलवे और दूसरे बुनियादी ढांचे के लिए जमीन हासिल करने की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए। इसी सोच के साथ साल 2014-15 में भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव का प्रयास किया गया।

लेकिन विपक्ष और किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित बदलाव किसानों के हितों को कमजोर कर सकते हैं। मामला संसद की संयुक्त समिति तक पहुंचा। विरोध बढ़ता गया और सरकार पर यह दबाव बनने लगा कि वह किसानों से जुड़े प्रावधानों में नरमी बरते। अगस्त 2015 में सरकार ने छह महत्वपूर्ण संशोधनों पर पीछे हटने की सहमति दी। इनमें सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन जैसे अहम प्रावधानों को बरकरार रखने की बात शामिल थी।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त 2015 को ‘मन की बात’ में घोषणा की कि भूमि अधिग्रहण से जुड़ा अध्यादेश आगे जारी नहीं किया जाएगा। बाद में संबंधित विधेयक भी 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ समाप्त हो गया। यानी सरकार ने यहां पूरा कानून वापस नहीं लिया, लेकिन अपने मूल प्रस्ताव से काफी पीछे हटना पड़ा।

2018: एमजे अकबर का इस्तीफा, #MeToo का राजनीतिक असर
अक्टूबर 2018 में #MeToo आंदोलन भारत में जोर पकड़ रहा था। इसी दौरान तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर पत्रकारिता के दौर से जुड़े यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार के आरोप लगे। एक के बाद एक कई महिलाओं ने आरोप लगाए। अकबर ने आरोपों से इनकार किया और एक शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी किया। लेकिन राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता गया। 17 अक्टूबर 2018 को अकबर ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
यह मामला बाकी उदाहरणों से अलग था। यहां सरकार ने कोई नीति वापस नहीं ली थी, बल्कि एक केंद्रीय मंत्री को विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच पद छोड़ना पड़ा था।

2020-21: तीन कृषि कानून और एक साल लंबा किसान आंदोलन
मोदी सरकार के सबसे बड़े राजनीतिक यू-टर्न की बात होगी तो तीन कृषि कानूनों का मामला सबसे ऊपर आएगा। 2020 में सरकार तीन कृषि सुधार कानून लेकर आई। सरकार का कहना था कि इनसे किसानों को नई मंडियों और खरीदारों तक पहुंच मिलेगी और कृषि क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ेगा। लेकिन किसान संगठनों ने इन कानूनों का जमकर विरोध किया। दिल्ली की सीमाओं पर बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन शुरू हुआ। आंदोलन कई महीनों तक चला। सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई।

जनवरी 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद राजनीतिक गतिरोध खत्म नहीं हुआ। आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। 29 नवंबर 2021 को संसद ने कृषि कानून निरसन विधेयक पास कर दिया। इस तरह 2020 में बनाए गए तीनों कानून औपचारिक रूप से खत्म हो गए। यह मोदी सरकार के लिए इसलिए भी बड़ा फैसला था क्योंकि सरकार लंबे समय तक इन कानूनों को कृषि सुधारों के लिए जरूरी बताती रही थी। यही वजह है कि 2021 का किसान आंदोलन आज भी मोदी सरकार के सबसे बड़े नीतिगत यू-टर्न के तौर पर याद किया जाता है।

यह भी पढ़ें: 'मान ली गई हैं हमारी मांगें': CJP ने किया विरोध प्रदर्शन खत्म करने का एलान, सरकार से क्या-क्या हुई बात?

2024: UPSC की लैटरल एंट्री, सहयोगी दल के दबाव में विज्ञापन वापस
2024 में मोदी सरकार तीसरी बार सत्ता में लौटी, लेकिन इस बार उसके पास पहले जैसी पूर्ण बहुमत वाली स्थिति नहीं थी। सहयोगी दलों की भूमिका बढ़ गई। इसी दौर में यूपीएससी ने केंद्र सरकार के वरिष्ठ पदों पर लैटरल एंट्री के लिए विज्ञापन निकाला। इसके तहत निजी क्षेत्र और दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सीधे वरिष्ठ नौकरशाही में नियुक्त करने का रास्ता था। विपक्ष ने सवाल उठाया कि इन नियुक्तियों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण का क्या होगा। मामला यहीं नहीं रुका। एनडीए के सहयोगी चिराग पासवान ने भी इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई।

इसके बाद 20 अगस्त 2024 को केंद्र सरकार ने यूपीएससी को विज्ञापन वापस लेने के लिए कहा। यूपीएससी ने विज्ञापन रद्द कर दिया। सरकार की ओर से कहा गया कि लैटरल एंट्री की प्रक्रिया को संविधान में दिए सामाजिक न्याय और आरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। सरकार ने अपनी ही शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया को राजनीतिक विरोध और सहयोगी दल की आपत्ति के बाद रोक दिया।

2026: 131वां संविधान संशोधन, संसद में सरकार को बड़ा झटका
2026 में 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर संसद में बड़ा राजनीतिक टकराव हुआ। विधेयक का संबंध लोकसभा की सीटों के पुनर्विन्यास, परिसीमन और महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया से जुड़ा था। सरकार के सामने इसे पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की चुनौती थी। लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं जुट पाया और विधेयक लोकसभा में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। इसे सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संसदीय झटका माना गया।

यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें सरकार ने खुद कोई फैसला वापस ले लिया हो, बल्कि यह संसद में सरकार के प्रस्ताव के आगे न बढ़ पाने का मामला है। इसलिए इसे ‘सरकार का बैकफुट’ कहने से ज्यादा सटीक होगा कि यह सरकार को मिला एक बड़ा संसदीय झटका था।

25 जुलाई 2026: NEET विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
अब आते हैं सबसे ताजा घटनाक्रम पर। नीट-यूजी 2026 पेपर लीक विवाद के बाद छात्र आंदोलन लगातार तेज होता गया। सीजेपी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को आंदोलन की प्रमुख मांग बना दिया। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला तेज किया। जंतर-मंतर पर आंदोलन बढ़ता गया और मामला केवल परीक्षा की गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा। यह सरकार की जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का मुद्दा बन गया। आखिरकार 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

अपने पत्र में प्रधान ने कहा कि उन्होंने छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह शुरुआत से स्थिति की जिम्मेदारी लेते रहे हैं और किसी भी योग्य छात्र के भविष्य को परीक्षा माफिया के कारण खराब नहीं होने देना चाहते। यानी आंदोलन की सबसे बड़ी मांग, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा पूरी हो गई। यही वजह है कि आंदोलनकारी इसे अपनी बड़ी जीत बता रहे हैं।

तो क्या मोदी सरकार सच में बार-बार झुकी?
2014 से 2026 के बीच इन घटनाओं को एक साथ रखने पर एक पैटर्न जरूर दिखाई देता है। 2015 में किसान दबाव के बीच भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव कमजोर पड़ा। 2018 में #MeToo विवाद के बीच एमजे अकबर को इस्तीफा देना पड़ा। 2021 में करीब एक साल चले किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानून वापस लिए गए।

2024 में विपक्ष और सहयोगी दलों के दबाव के बाद लैटरल एंट्री का विज्ञापन वापस लिया गया। 2026 में 131वां संविधान संशोधन विधेयक संसद में आगे नहीं बढ़ सका और अब नीट विवाद के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। लेकिन इन सभी घटनाओं को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं होगा। कहीं सरकार ने नीति वापस ली, कहीं अध्यादेश खत्म किया, कहीं मंत्री ने इस्तीफा दिया, कहीं संसद में विधेयक आगे नहीं बढ़ पाया और कहीं सहयोगी दलों के दबाव ने सरकार को निर्णय बदलने पर मजबूर किया।


यानी इन घटनाओं में समानता है, राजनीतिक दबाव के सामने सरकार को किसी न किसी स्तर पर अपना रुख बदलना या नुकसान सीमित करना पड़ा। लेकिन हर घटना को सीधे 'मोदी सरकार की हार' कहना राजनीतिक विश्लेषण होगा, तथ्य नहीं।

2024 के बाद क्या बदला?
2014 और 2019 में भाजपा को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। ऐसे में सरकार को कई बड़े फैसलों पर सहयोगी दलों की उतनी निर्भरता नहीं थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रह गई और सरकार को एनडीए के सहयोगी दलों के समर्थन के साथ आगे बढ़ना पड़ा। इसका असर फैसलों पर भी दिखाई देने लगा।

क्या यह सिर्फ एक मंत्री का इस्तीफा है?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ शिक्षा मंत्रालय में बदलाव की खबर नहीं है। इसके पीछे पिछले कुछ महीनों से बढ़ता छात्र असंतोष, परीक्षा व्यवस्था पर सवाल और सरकार की जवाबदेही को लेकर चल रही राजनीतिक लड़ाई है। 2014 के बाद मोदी सरकार ने कई मौकों पर अपने फैसलों का बचाव किया, लेकिन जब राजनीतिक दबाव बहुत बढ़ा तो उसे कुछ मामलों में पीछे भी हटना पड़ा। कभी किसान सड़क पर थे, कभी विपक्ष संसद में था, कभी सहयोगी दलों ने सवाल उठाए और अब छात्रों का आंदोलन केंद्र में है।
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