कोविड-19 राहत पैकेज-1 : आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास...
- प्रधानमंत्री ने हमें हेडलाइन दी और पेज सादा छोड़ दिया-पी चिदंबरम
- गरीब, मजदूर, सीमांत किसान, एमएसएमई के नौकरीपेशा की जेब में क्या गया
- सरकार ने राहत पैकेज के नाम पर लोन का मेला लगा दिया : गौरव वल्लभ
विस्तार
ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत (कर्ज लेकर घी पीने) प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का कभी कांग्रेस की आर्थिक नीति पर मशहूर तंज हुआ करता था। आज कांग्रेस के प्रवक्ता गौरव वल्लभ कुछ इसी अंदाज में मोदी सरकार पर कोविड-19 के राहत पैकेज के नाम पर लोन का मेला लगाने का तंज कस रहे हैं। पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री पी चिदंबरम भी गौरव वल्लभ के तंज से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं।
एमएसएमई इंटरप्राइजेज के अनिल भारदज का कहना है कि राहत पैकेज-1 नहीं इसे कर्ज लेकर आगे बढ़ने का सहयोग पैकेज कहिए। नॉर्थ इंडिया सीआईआई लाइफ साइंसेज कमेटी के चेयरमैन दिनेश दुआ का भी सवाल गंभीर है, वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है, लेकिन उन्हें इसमें केंद्र सरकार की जेब से एकाध हजार करोड़ से अधिक खर्च होते नहीं दिखाई दे रहे हैं।
आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास
दिनेश दुआ और अनिल भारद्वाज दोनों कहते हैं कि केंद्रीय मंत्रियों से मिलकर उन्होंने इस तरह की मांग नहीं की थी। उन्होंने एमएसएमई के लिए प्रोत्साहित करने वाले राहत पैकेज की मांग की थी। उन्हें वित्त मंत्री की घोषणा में कहीं भी राहत पैकेज नहीं दिखाई देता। यह तो वही हालत है, जैसे आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास। एमएसएमई काम शुरू करने के लिए स्ट्रेस फ्री वर्किंग कैपिटल चाहती हैं। उन्हें अपने कर्मियों को वेतन देने, ईएमआई भरने, बिजली बिल भरने या किराए पर चल रही यूनिट को किराये का भार सता रहा है। सरकार ने इस दिशा में कुछ नहीं किया, बस लोन के रास्ते दिखा दिए।
सबका सवाल बस एक... लोगों की जेब में क्या आया?
एक रुपया आने और खर्च होने के सिद्धांत पर केंद्र सरकार का बजट टिका है। इसी सिद्धांत पर समाज, कंपनियों, संस्थाओं का आय-व्यय भी टिका होता है। केंद्र सरकार के पास आने वाले एक रुपये में 20 पैसा देनदारी, 18 कारपोरेशन टैक्स, 18 जीएसटी व अन्य, 17 आयकर,10 कर भिन्न राजस्व स्रोतों से, सात केंद्रीय एक्साइज, छह पूंजी प्राप्तियों और चार पैसा कस्टम ड्यूटी का होता है।
सरकार इस एक रुपये को विभिन्न मदों (20 पैसा राज्यों को, 18 ब्याज अदायगी,13 केन्द्रीय योजनाओं, 10 वित्त आयोग और अन्य, 09 केन्द्र सरकार प्रायोजित योजनाओं, 08 रक्षा क्षेत्र, 06 आर्थिक सहायता, 06 पेंशन और 10 पैसा अन्य मद) में खर्च करती है। लेकिन प्रधानमंत्री की 20 लाख करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा के प्रथम चरण में लोगों को न तो राहत पैकेज दिखाई दिया और न ही इसका खर्च का अधार।
चाहे एमएसएमई हो या उद्योग जगत, पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा हो या पी चिदंबरम, सबका सवाल एक है? पीडित लोगों की जेब में क्या कितना पैसा आया? गौरव वल्लभ पंत भी कहते हैं कि यह आपात काल का समय पीड़ित लोगों को प्रोत्साहित करने वाला राहत पैकेज देने का है। इसे ऐसा पैकेज नहीं कहते।
वित्त मंत्री की घोषणा और बिंदुवार जवाब
दिनेश दुआ और अनिल भारद्वाज बिंदुवार वित्त मंत्री की घोषणा पर सवाल उठा रहे हैं। वित्त मंत्री ने घोषणा में बताया कि एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का फ्री आटोमैटिक, बिना गारंटी के लोन दिया जाएगा। एक साल तक प्रिंसिपल का कुछ नहीं पे करना है और चार साल में कर्ज लौटाना है। जो एमएसएमई की फाइनेंशियल का वर्क कैपिटल को लेकर दबाव में हैं उन्हें 20 हजार करोड़ रुपये का कर्ज और जो वायबिल एमएसएमई हैं उनके लिए 50 हजार करोड़ रुपये इक्विटी इंफ्यूजन के रुप में विस्तार के लिए। दोनों विशेषज्ञों का कहना है कि यह तीनों घोषणा सब ब्याज पर ही मिलने वाला कर्ज है। इसे लौटाना भी है। यहां तक कि एनबीएफसी (हाऊसिंग फानेंस कंपनी और अन्य) के लिए 30 हजार करोड़ भी उसकी गारंटी में दिया जाने वाला लोन होगा।
एमएसएमई की परिभाषा बदलने के सवाल पर भी अनिल भारद्वाज सवाल उठाते हैं। इसमें सरकार ने उत्पादन इकाई और सर्विस क्षेत्र को बराबर का दर्जा दे दिया है। वह कहते हैं कि इससे मझोले उद्योग को नुकसान उठाना पड़ सकता है। दिनेश दुआ कहते हैं कि यह पुरानी मांग थी, इसे कोविड-19 राहत पैकेज से मत जोड़िए। पांचवी घोषणा 200 करोड़ रुपये तक की आपूर्ति के लिए ग्लोबल निविदा नहीं आमंत्रित होगी। इस पर दिनेश दुआ और भारद्वाज का कहना है कि बहुत ही कम मामले में ग्लोबल टेंडर होता था, लेकिन अधिकांश में देश की बड़ी निजी कंपनियां ही हावी रहती हैं। इसका एमएसएमई को फायदा कम मिलेगा। छठवीं और आखिरी घोषणा कि एमएसएमई को सरकार 45 दिन में भुगतान करेगी, यह स्वागत योग्य है।
सरकार की जेब से क्या जाएगा?
दिनेश दुआ, अनिल भारद्वाज, गौरव वल्लभ, पी चिदंबरम सभी का मानना है कि केंद्र सरकार 15 हजार मासिक वेतन वालों के पीएफ खाते में नियोक्ता और कर्मचारी के हिस्से का छह महीने का पैसा जमा कराएगी। इसमें सरकार के बजट का पैसा खर्च होगा। दूसरा, सरकार चार साल तक के लिए तीन लाख करोड़ रुपये के बिना गारंटी लोन का क्रेडिट गारंटी फंड बनाएगी। इसमें उसके बजट से पैसा खर्च होगा। लेकिन एमएसएमई इसे ब्याज समेत चार साल के भीतर बैंक को लौटाएगी।
छह महीने की राहत का क्या अर्थ?
विशेषज्ञों का कहना है कि चाहे रियल स्टेट हो या रेलवे या सड़क की परियोजनाएं। कोविड-19 और लॉकडाउन में काम कहां होना है? यह तो सबको पता है। वैसे भी मजदूर गांव चला जा रहा है, जल्दी लौटेगा नहीं। ऐसे में सरकार का छह महीने का समय बढ़ाना, या परियोजना के कुछ पूरे हुए हिस्से की बैंक गारंटी का हिस्सा लौटाना, यह कैसे राहत पैकेज में आएगा? इसमें सरकार के बजट से क्या खर्च हो रहा है? दिनेश दुआ को समझ में नहीं आ रहा है कि इसे कैसे 20 लाख करोड़ के पैकेज में सरकार जोड़ रही है। इसी तरह से टीडीएस, टीसीएस में 25 फीसदी की छूट भी लोगों को अभी भ्रमित कर रही है।
पैसा जॉब में डालती तो राहत पैकेज होता
दिनेश दुआ, अनिल भारद्वाज का कहना है कि अमेरिका, जापान, यूरोप में देशों ने लोगों को छह महीने का 70-80 फीसदी का वेतन दिया है। वेतन का यह बोझ कंपनियों पर नहीं पड़ा है। पी चिदंबरम भी यही कहते हैं। गौरव वल्लभ का कहना है कि जिसकी नौकरी चली गई या जिसे दो महीने से तनख्वाह नहीं मिल रही है, उसे सरकार ने कौन सी राहत दे दी। यशवंत सिन्हा का कहना है कि पैसा न इम्प्लायर की जेब में गया, न इम्प्लाई के तो यह राहत पैकेज कैसे हो गया?
कंपनियां लोन लेंगी और उसके आधार पर अपनी जिम्मेदारी पूरा करेगी। अनिल भारद्वाज भी यही कहते हैं कि लोन लो सेलरी दो। कर्ज, ईएमआई दो। यहां तो सरकार केवल लोन देने, दिलाने में सहयोग कर रही है। यशवंत सिन्हा का कहना है कि लोन देना, दिलाना तो ठीक है, लेकिन बाजार में मांग नदारद है। सरकार सप्लाई चेन को कैसे ठीक करेगी, उसका रोडमैप ही नहीं दिखता। इसलिए यहां अर्थव्यवस्था का कोई रिवाइवल नहीं दिखता। चिदंबरम की भाषा में यह 'हेडलाइन' से 'हेल्पलाइन' पैकेज में बदल चुका है।