क्या किसानों को मनाने में कामयाब रहे अमित शाह?: यदि किसान आंदोलन का असर होता तो क्या यही होता चुनाव परिणाम
किसान आंदोलन के कारण यह कयास लगाए जा रहे थे कि 2022 का चुनाव खेती-किसानी के मुद्दे इर्द-गिर्द ही लड़ा जाएगा। उस समय विपक्ष कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलनरत किसानों के हमदर्द बने हुए थे। चुनाव में इन्हीं सियासतदानों ने प्रचार के दौरान किसानों की समस्याओं से मुंह फेर लिया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
केंद्र सरकार ने जब तीनों विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला लिया था तब यही कहा गया था कि भाजपा को यूपी चुनाव में अपनी करारी हार होने का भय सता रहा है, इसलिए पीएम नरेंद्र मोदी को कानूनों को वापस लेने का फैसला करना पड़ा। गृहमंत्री अमित शाह कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद भी लगातार किसान नेताओं से मिलते रहे, जाट नेताओं से मुलाकात कर अपनी गलती मानते रहे। वे उन्हें यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते रहे कि केंद्र सरकार से गलती हो गई है, लेकिन आगे ऐसी गलती नहीं होगी। जाटों को उनका मुगलों से लड़ने तक का इतिहास याद दिलाया गया। क्या केंद्र सरकार किसानों को ‘समझाने’ में कामयाब हो गई? क्योंकि यदि किसान माने न होते तो भाजपा को इस तरह की सफलता मिलना संभव नहीं था।
राजनीतिक समीक्षक और किसान नेता योगेंद्र यादव ने अमर उजाला से कहा कि हमें किसान आंदोलन और एक राजनीतिक दल में अंतर करना चाहिए। किसान आंदोलन से जुड़े किसान कृषि के मुद्दे पर तो साथ थे, लेकिन राजनीतिक मुद्दे पर वे बंटे हुए थे। सच्चाई यह है कि विभिन्न दलों के मतदाता किसान भी आंदोलन से जुड़े, लेकिन जैसे ही चुनाव का रंग चढ़ा, लोगों ने अपनी-अपनी पार्टी का साथ दिया, और इसीलिए पंजाब में आम आदमी पार्टी और यूपी में भाजपा को सफलता मिलती दिख रही है। किसान नेताओं से लगातार संपर्क कर, एक दर्जन से ज्यादा जाट उम्मीदवार मैदान में उतारकर भाजपा ने उनके अंदर अपनी जगह बनाने में सफलता हासिल की। जाटों को उन्हें मुगलों के खिलाफ बड़ा योद्धा बताकर उनके बीच संप्रदायवाद के आधार पर बांटने की कोशिश हुई। फिलहाल चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा अपनी कोशिश में कामयाब रही।
विपक्ष ने किसानों का मुद्दा ही नहीं उठाया
किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल ने कहा कि पूरे उत्तर प्रदेश चुनाव में आंदोलन के किसी मुद्दे को विपक्षी दलों ने नहीं उठाया। पूरे चुनाव में जिन्ना-पाकिस्तान और हिजाब पर बहस होती रही। विपक्ष इन मुद्दों को गंभीरता के साथ उठाता तो उसे लाभ अवश्य मिलता, लेकिन बसपा-सपा-कांग्रेस किसी भी दल ने उन मुद्दों को छूने की कोशिश ही नहीं की। केवल घोषणा पत्र में कुछ वायदे लिखकर अपना फर्ज पूरा हुआ मान लिया गया। किसान नेता डॉ. मित्तल को लगता है कि विपक्ष के पिटारे में भी किसानों को देने के लिए कुछ नहीं था। यदि वे किसानों के मुद्दों से सहमत होते तो उन्हें भी कॉरपोरेट घरानों का विरोध झेलना पड़ता। शायद उनके लिए भी कॉरपोरेट कंपनियों का विरोध करने की हिम्मत नहीं थी, इसीलिए उन्होंने इन मुद्दों को पूरी मजबूती से नहीं उठाया। यदि वे किसान आंदोलन से सहमत होते तो किसान आंदोलन के मंच से न सही, अपने-अपने राजनीतिक क्षेत्रों में आंदोलन को लेकर समर्थन कर सकते थे। लेकिन उन्होंने किसानों के मुद्दों को मजबूती से नहीं उठाया और उन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ा।
पंजाब के किसान-आढ़तिया किसान संघ के नेता रविंदर सिंह चीमा ने कहा कि पहले दिन से ही किसान आंदोलन पूरी तरह गैर-राजनीतिक था। हमने अपने मंच का किसी राजनीतिक दल को इस्तेमाल करने ही नहीं दिया। ऐसे में किसान आंदोलन का राजनीतिक असर पड़ने की बड़ी गुंजाइश नहीं थी।
किसानों के मुद्दे पर EVM भारी
किसान नेता डॉ. सुनीलम ने कहा कि वे यह नहीं मानते कि किसानों का मुद्दा जमीन पर नहीं रहा। असलियत है कि किसानों का मुद्दा लगातार जमीन पर बना रहा और अखिलेश यादव-जयंत चौधरी की रैली में उमड़ी भारी भीड़ का ही असर हुआ है कि सपा बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि इसके बाद भी यदि भाजपा को जीत मिलती है तो यह मानना चाहिए कि इसका असली खेल ईवीएम के जरिए खेला गया है। उन्होंने कहा कि अकेले पश्चिमी यूपी में 20 से ज्यादा जगहों पर ईवीएम के खराब होने की शिकायतें आई थीं। माना जा रहा है कि असली खेल इन खराब ईवीएम के जरिए ही खेला गया। उन्होंने कहा कि इस मामले की जांच होनी चाहिए।
किसानो के मुद्दों को हमने हल किया
भाजपा नेता शैलेंद्र शर्मा ने कहा कि जहां तक किसानों के मुद्दे की बात है, सच्चाई यह है कि किसान आंदोलन के नाम पर केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन चलाया जा रहा था। आंदोलन पर बड़े किसानों का कब्जा था, जबकि केंद्र सरकार देश के छोटे किसानों को मजबूत करने के लिए लगातार कार्य कर रही थी। पूरे देश का किसान देख रहा था कि सरकार किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना, यूरिया को नीमकोटेड कर उसको मजबूत करने का काम कर रही थी। यही कारण रहा कि भाजपा को जनता का भारी समर्थन मिला।