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अवसाद: डॉ. श्याम भट्ट बोले- मन और शरीर को एकत्र कर ध्यान जैसी परंपरा के सहारे पाइए तनाव से मुक्ति
Wed, 24 Jan 2024 10:27 PM IST
शक्तिराज सिंह
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शक्तिराज सिंह
Updated Wed, 24 Jan 2024 10:27 PM IST
सार
द लैंसेट सैक्रिएट्री रिपोर्ट का हवाला देते हुए डा. श्याम भट्ट कहते हैं कि 2017 में सात में से एक भारतीय अलग अलग गंभीरता के मानसिक रोगों से पीडित था।
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गंभीर डिप्रेशन के लिए क्या किया जाना चाहिए?
- फोटो : istock
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विस्तार
देश में कामकाजी लोगों में तनाव बढ़ रहा है। कॉरपोरेट शहरी लोग तेजी से इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। देश के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ. श्याम भट्ट कहते हैं कि अनियंत्रित जीवन शैली, मन और शरीर के बीच में बिगड़ रहा तालमेल, रहन-सहन और भागम-भाग की जिंदगी ने लोगों को तेजी से मानसिक रूप से तंग किया है। डॉ. श्याम भट्ट द लिव लव लाइफ फाउंडेशन के अध्यक्ष भी हैं। वह कहते हैं कि मन और शरीर को एकत्र कर ध्यान जैसी परंपरा के सहारे लोगों को मानसिक अवसाद, तनाव आदि से मुक्ति दिलाई जा सकती है।
डॉ. श्याम भट्ट के अनुसार द लिव लव लाइफ फाउंडेशन इस दिशा में काफी उल्लेखनीय काम कर रहा है। द लैंसेट सैक्रिएट्री रिपोर्ट का हवाला देते हुए डा. श्याम भट्ट कहते हैं कि 2017 में सात में से एक भारतीय अलग अलग गंभीरता के मानसिक रोगों से पीडित था। लेकिन इस समय भारत में मानसिक रोगियों की संख्या 19.73 करोड़ तक पहुंच गई है। इनमें से 4.57 लोग मानसिक अवसाद से ग्रसित हैं। जबकि 4.49 करोड़ लोग तनाव की समस्या से पीड़ित हैं।
वह कहते हैं कि तनाव का दायरा अनुमान से कहीं ज्यादा है। शहर और गांव के बीच में फर्क का जिक्र करने पर डा. श्याम ने कहा कि शहर के लोग नौकरी पेशा आदि से जुड़े होते हैं। मानसिक रूप से तनाव की स्थिति बढ़ने या असहज होने पर यह लोग चिकित्सक से संपर्क करके आवश्यक उपाय शुरू कर देते हैं। लेकिन गांवों में ऐसा नहीं है। वहां तो जब तक बीमारी कुछ गंभीर नहीं हो जाती, लोग मानसिक इलाज के लिए आगे नहीं आते। इसमें भी सबसे खराब स्थिति तब आती है, जब शिक्षा और जागरुकता की कमी के कारण लोग इसके इलाज के लिए झाड़-फूंक, ओझा और तांत्रिक के पास चले जाते हैं। इससे मर्ज नहीं घटता, उल्टे बीमारी और जटिल होती जाती है। डॉ. भट्ट के अनुसार यह ट्रेंड जारी रहा तो आने वाले समय में समाज में कई तरह की विसंगतियों को जन्म दे सकता है।
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मानसिक रोग की दशा में व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
डॉ. श्याम भट्ट के मुताबिक कोई भी बिमारी हो, रोगी को खुद उसका विशेषज्ञ बनने से बचना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि मानसिक अवसाद और तनाव के मामले में ध्यान, योग और कुछ आयुर्वेदिक औषधियां अच्छा काम करती हैं। ध्यान जैसी परंपरा का उपयोग आधुनिक मानसिक चिकित्सा पद्धति में भी किया जाता है। इससे मन और शरीर को एकत्र करने, उत्तेजना को कम और धीरे धीरे नियंत्रित करने में मदद मिलती है। चिकित्सा के दौरान मिले प्रमाणों से पता चलता है कि ध्यान आटोनॉमिक नर्वस सिस्टम को व्यवस्थित करने में बहुत सहायता करता है। शरीर के साथ-साथ दिमाग को बेहतर बनाता है। हालांकि इस क्षेत्र में अभी काफी शोध और अनुसंधान किए जाने की आवश्यकता है। डा. श्याम के मुताबिक गंभीर मानसिक रोग के मामले में इलाज किसी मनोचिकित्सक की देखरेख में ही होना चाहिए।
टहलिए, व्यायाम कीजिए, खाइए, सोइए और स्वस्थ रहिए
डॉ. श्याम भट्ट के मुताबिक मानसिक रोगियों के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि इसकी ज्यादातर वजहें हमारा रहन, सहन है। अव्यवस्थित खान-पान, समय पर न सोना, मन माफिक सहूलियत के अनुसार जीवन शैली तनाव और मानसिक अवसाद को बढ़ाती है। इसलिए मनुष्य को पोषण युक्त खाना, समय पर 7-9 घंटे सोना, फल, फूल खाना, फास्टफूड से बचना और रोज आधा घंटा व्यायाम करना चाहिए। डॉ. भट्ट के अनुसार चाइनीज फूड, फास्ट फूड आदि ट्रांस न्यूरोट्रांसमीटरों आदि को प्रभावित करते हैं। इसलिए इससे परहेज करना चाहिए। ऐसा करने से मानसिक तनाव और अवसाद की स्थिति से बचे रहने में बड़ी सहायता मिलती है।
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डॉ. श्याम भट्ट के अनुसार द लिव लव लाइफ फाउंडेशन इस दिशा में काफी उल्लेखनीय काम कर रहा है। द लैंसेट सैक्रिएट्री रिपोर्ट का हवाला देते हुए डा. श्याम भट्ट कहते हैं कि 2017 में सात में से एक भारतीय अलग अलग गंभीरता के मानसिक रोगों से पीडित था। लेकिन इस समय भारत में मानसिक रोगियों की संख्या 19.73 करोड़ तक पहुंच गई है। इनमें से 4.57 लोग मानसिक अवसाद से ग्रसित हैं। जबकि 4.49 करोड़ लोग तनाव की समस्या से पीड़ित हैं।
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वह कहते हैं कि तनाव का दायरा अनुमान से कहीं ज्यादा है। शहर और गांव के बीच में फर्क का जिक्र करने पर डा. श्याम ने कहा कि शहर के लोग नौकरी पेशा आदि से जुड़े होते हैं। मानसिक रूप से तनाव की स्थिति बढ़ने या असहज होने पर यह लोग चिकित्सक से संपर्क करके आवश्यक उपाय शुरू कर देते हैं। लेकिन गांवों में ऐसा नहीं है। वहां तो जब तक बीमारी कुछ गंभीर नहीं हो जाती, लोग मानसिक इलाज के लिए आगे नहीं आते। इसमें भी सबसे खराब स्थिति तब आती है, जब शिक्षा और जागरुकता की कमी के कारण लोग इसके इलाज के लिए झाड़-फूंक, ओझा और तांत्रिक के पास चले जाते हैं। इससे मर्ज नहीं घटता, उल्टे बीमारी और जटिल होती जाती है। डॉ. भट्ट के अनुसार यह ट्रेंड जारी रहा तो आने वाले समय में समाज में कई तरह की विसंगतियों को जन्म दे सकता है।
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मानसिक रोग की दशा में व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
डॉ. श्याम भट्ट के मुताबिक कोई भी बिमारी हो, रोगी को खुद उसका विशेषज्ञ बनने से बचना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि मानसिक अवसाद और तनाव के मामले में ध्यान, योग और कुछ आयुर्वेदिक औषधियां अच्छा काम करती हैं। ध्यान जैसी परंपरा का उपयोग आधुनिक मानसिक चिकित्सा पद्धति में भी किया जाता है। इससे मन और शरीर को एकत्र करने, उत्तेजना को कम और धीरे धीरे नियंत्रित करने में मदद मिलती है। चिकित्सा के दौरान मिले प्रमाणों से पता चलता है कि ध्यान आटोनॉमिक नर्वस सिस्टम को व्यवस्थित करने में बहुत सहायता करता है। शरीर के साथ-साथ दिमाग को बेहतर बनाता है। हालांकि इस क्षेत्र में अभी काफी शोध और अनुसंधान किए जाने की आवश्यकता है। डा. श्याम के मुताबिक गंभीर मानसिक रोग के मामले में इलाज किसी मनोचिकित्सक की देखरेख में ही होना चाहिए।
टहलिए, व्यायाम कीजिए, खाइए, सोइए और स्वस्थ रहिए
डॉ. श्याम भट्ट के मुताबिक मानसिक रोगियों के विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि इसकी ज्यादातर वजहें हमारा रहन, सहन है। अव्यवस्थित खान-पान, समय पर न सोना, मन माफिक सहूलियत के अनुसार जीवन शैली तनाव और मानसिक अवसाद को बढ़ाती है। इसलिए मनुष्य को पोषण युक्त खाना, समय पर 7-9 घंटे सोना, फल, फूल खाना, फास्टफूड से बचना और रोज आधा घंटा व्यायाम करना चाहिए। डॉ. भट्ट के अनुसार चाइनीज फूड, फास्ट फूड आदि ट्रांस न्यूरोट्रांसमीटरों आदि को प्रभावित करते हैं। इसलिए इससे परहेज करना चाहिए। ऐसा करने से मानसिक तनाव और अवसाद की स्थिति से बचे रहने में बड़ी सहायता मिलती है।