17 वर्षों से देश में नहीं हुआ परिसीमन, 24 साल से जम्मू-कश्मीर को भी है इसका इंतजार
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लोकसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं और केंद्र में नई सरकार ने कामकाज शुरू कर दिया है। नई सरकार बनते ही जम्मू-कश्मीर अचानक सुर्खियों में आ गया। वजह थी नई सरकार की नई नीतियां और राज्य के परिसीमन को लेकर आने वाली खबरें। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं है कि परिसीमन होगा भी या नहीं। लेकिन फिर भी हम आपको बताना चाहते हैं कि आखिर यह परिसीमन क्या होता है?
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लोकसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं और केंद्र में नई सरकार ने कामकाज शुरू कर दिया है। नई सरकार बनते ही जम्मू-कश्मीर अचानक सुर्खियों में आ गया। वजह थी नई सरकार की नई नीतियां और राज्य के परिसीमन को लेकर आने वाली खबरें। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं है कि परिसीमन होगा भी या नहीं। लेकिन फिर भी हम आपको बताना चाहते हैं कि आखिर यह परिसीमन क्या होता है?
अगर जम्मू-कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन क्षेत्रों- जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में विधानसभा सीटों की संख्या में बदलाव हो जाएगा। इसकी वजह से जम्मू और कश्मीर के विधानसभा क्षेत्रों का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। जम्मू और कश्मीर की राजनीति में अब तक कश्मीर का ही पलड़ा भारी रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि विधानसभा में कश्मीर की विधानसभा सीटें, जम्मू के मुकाबले ज्यादा हैं।
किसी राज्य के निर्वाचन क्षेत्र की सीमा का निर्धारण करने की प्रक्रिया को परिसीमन कहा जाता है। हमारे संविधान में हर 10 वर्ष में परिसीमन करने का प्रावधान है। लेकिन सरकारें जरूरत के हिसाब से परिसीमन करती हैं। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव होता है। 87 सीटों में से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में चार विधानसभा सीटें हैं। परिसीमन में सीटों में बदलाव में आबादी और वोटरों की संख्या का भी ध्यान रखा जाता है।
परिसीमन का अर्थ
परिसीमन आयोग को भारतीय सीमा आयोग भी कहा जाता है। परिसीमन से तात्पर्य किसी भी राज्य की लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं (राजनीतिक) का रेखांकन है। अर्थात इसके माध्यम से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की हदें तय की जाती हैं। संविधान के अनुच्छेद 82 के मुताबिक, सरकार हर 10 साल बाद परिसीमन आयोग का गठन कर सकती है। इसके तहत जनसंख्या के आधार पर विभिन्न विधानसभा व लोकसभा क्षेत्रों का निर्धारण होता है। जनसंख्या के हिसाब से अनुसूचित जाति-जनजाति सीटों की संख्या बदल जाती है।
परिसीमन का उद्देश्य
परिसीमन का उद्देश्य ताजा जनगणना के आधार पर सभी लोकसभा और विधानसभा सीटों की दोबारा सीमाएं निर्धारित करना है। हालांकि अब नई जनगणना 2021 में होगी। सीमाएं पुनर्निर्धारण में जनप्रतिनिधियों (सीटों) की संख्या यथावत रहती है अर्थात इनमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं होता। अनुसूचित जाति और जनजाति की विधानसभा सीटों का निर्धारण क्षेत्र की जनगणना के अनुसार होता है।
परिसीमन के चलते जातिगत आधार पर सीटों की संख्या कम या ज्यादा होती है। अंतिम परिसीमन के मुताबिक अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटें भी बढ़ी हैं और इनकी संख्या बढ़कर 125 हो गई। इसके चलते कई मौजूदा सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ीं। इनमें पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल और लोकसभा अध्यक्ष स्व. सोमनाथ चटर्जी भी शामिल हैं। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त होता है। वर्तमान में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा इस आयोग के अध्यक्ष हैं। वहीं राज्य के चुनाव आयुक्त इसके सदस्य होते हैं।
कश्मीर के हिस्से में ज्यादा विधानसभा सीटें क्यों हैं?
जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला को पसंद नहीं करते थे। लेकिन शेख अब्दुल्ला को पंडित नेहरू का आशीर्वाद प्राप्त था। पंडित नेहरू की सलाह पर ही महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री नियुक्त होने के बाद महाराजा हरि सिंह की शक्तियां तकरीबन खत्म हो गई थीं।
वर्ष 1951 में जब जम्मू कश्मीर के विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई, तब शेख अब्दुल्ला ने जम्मू को 30 विधानसभा सीटें, कश्मीर को 43 विधानसभा सीटें और लद्दाख को 2 विधानसभा सीटें आवंटित कर दीं।
वर्ष 1995 तक जम्मू और कश्मीर में यही स्थिति रही। वर्ष 1993 में जम्मू और कश्मीर में परिसीमन के लिए एक आयोग बनाया गया था। 1995 में परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया था। पहले जम्मू कश्मीर की विधानसभा में कुल 75 सीटें थीं। लेकिन परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर की विधानसभा में 12 सीटें बढ़ा दी गईं थीं। अब विधानसभा में कुल 87 सीटें थीं। इनमें से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में चार विधानसभा सीटें हैं।
जम्मू कश्मीर में बहुमत की सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को 44 सीटों की जरूरत होती है। कश्मीर में मुसलमानों की आबादी करीब 98 प्रतिशत है। वर्ष 2002 में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने परिसीमन को 2026 तक रोक दिया था। इसके लिए अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू कश्मीर जनप्रतिनिधि अधिनियम 1957 और जम्मू कश्मीर के संविधान की धारा 47(3) में बदलाव किया था। इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में भी चुनौती दी गई थी, लेकिन अदालत ने इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया था।
धारा 47(3) में हुए बदलाव के मुताबिक वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते हैं तब तक विधानसभा की सीटों में बदलाव करना जरूरी नहीं है। वर्ष 2026 के बाद जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में आएंगे। इसलिए अगर देखा जाए तो अब जम्मू कश्मीर में परिसीमन 2031 तक टल चुका है।