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Congress: राहुल-प्रियंका के बिना नहीं बनेगी बात, दिल्ली न्याय यात्रा से शीर्ष नेताओं के गायब रहने पर उठे सवाल

Sun, 08 Dec 2024 01:52 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Sun, 08 Dec 2024 01:52 PM IST
सार

एक तरफ दिल्ली कांग्रेस के नेता जमीन पर पार्टी को खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली में रहने के बाद भी कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे इस पूरी यात्रा से दूर रहे। इसे लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

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Delhi Nyay Yatra Congress Rahul Gandhi Priyanka Gandhi news in hindi
राहुल गांधी, प्रियंका गांधी - फोटो : ANI

विस्तार

दिल्ली में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए कांग्रेस ने 8 नवंबर को राजघाट से 'दिल्ली न्याय यात्रा' की शुरुआत की थी। एक महीने तक दिल्ली की गलियों की खाक छानने के बाद शनिवार 7 दिसंबर को रोहिणी में यह यात्रा समाप्त हो गई। इस यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं ने जगह-जगह लोगों से बातचीत की, उनके मुद्दे समझने की कोशिश की और यह भी समझने की कोशिश की कि वर्तमान समय में उसके लिए दिल्ली की सियासत में कितनी संभावनाएं मौजूद हैं। इसका चुनावों पर कितना असर होगा, यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि शीला दीक्षित युग की समाप्ति के बाद पार्टी ने पहली बार पूरी राजधानी में अपनी उपस्थिति का एहसास कराने में सफलता पाई है। 
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आम आदमी पार्टी और भाजपा की तेज-तर्रार लड़ाई में दिल्ली की सियासत में अक्सर कांग्रेस की उपेक्षा हो जाती है। लोग यही मान चुके हैं कि मुसलमान और दलित मतदाता, जो कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक हुआ करता था, अब अपने-अपने कारणों से आम आदमी पार्टी के पास जा चुका है। कांग्रेस के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण यही रहा है। लेकिन इस यात्रा में हर विधानसभा में जिस तरह लोगों की भीड़ उमड़ी है, उसने यह बात साबित कर दी है कि इन्हीं मतदाताओं का एक वर्ग आज भी उसके आकर्षण से बंधा हुआ है। 
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यदि कांग्रेस नेतृत्व सही तरीके से इन मतदाताओं  को जोड़ने की कोशिश करे तो कांग्रेस न केवल इन्हें अपने साथ लाने में कामयाब हो सकती है, बल्कि वह लड़ाई में वापस भी आ सकती है। देवेंद्र यादव की मेहनत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में पहली बार यह भरोसा पैदा किया है कि कांग्रेस लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। बाकी का काम पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को करना है जिससे आम कार्यकर्ताओं में लड़ने का जुनून पैदा हो सके।  
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राहुल-प्रियंका गांधी दिल्ली से दूर क्यों 
एक तरफ दिल्ली कांग्रेस के नेता जमीन पर पार्टी को खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली में रहने के बाद भी कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे इस पूरी यात्रा से दूर रहे। इसे लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी लगातार संसद की कार्यवाही में भाग लेते रहे। संभल और अदाणी विवाद पर धरना-प्रदर्शन करते रहे। लेकिन दिल्ली में रहकर भी वे न्याय यात्रा में नहीं पहुंचे। जबकि कांग्रेस नेता भी मानते हैं कि राहुल-प्रियंका के बिना कांग्रेस दिल्ली की लड़ाई में वापस नहीं आ सकती। यदि दिल्ली की लड़ाई को त्रिकोणीय बनाना है तो इसके लिए गांधी परिवार को मैदान में उतरना पड़ेगा। 

माना यही जा रहा है कि कांग्रेस दिल्ली के संभावित कमजोर प्रदर्शन को राहुल-प्रियंका के माथे पर नहीं डालना चाहती है। कम से कम शुरुआती दौर में ही अपने सबसे बड़े योद्धा को मैदान में उतारने को किसी भी रणनीति से सही नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब विधानसभा चुनाव ठीक सामने हों तो क्या ऐसे समय में भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की इतनी महत्वपूर्ण यात्रा से दूरी को सही कहा जा सकता है। इस पर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। 

लेकिन कांग्रेस पार्टी में भी कई लोग यह मानते हैं कि कांग्रेस को इस अवसर का उपयोग कार्यकर्ताओं को और ज्यादा उत्साहित करने के लिए करना चाहिए था। कम से कम यात्रा की शुरुआत और अंत को भव्य तरीके से मनाकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की जा सकती थी। मल्लिकार्जुन खरगे जैसे नेताओं को इस अवसर पर अपना पूरा जोर उन मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए लगाना चाहिए था जो उनके प्रभाव में आकर पार्टी की ओर लौट सकते हैं।     

कांग्रेस की मजबूत उपस्थिति दिखी- कांग्रेस
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता डॉ. नरेश कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि दिल्ली न्याय यात्रा में यह साफ-साफ दिखाई पड़ा कि राजधानी की सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के कार्यकर्ता मौजूद हैं। इन्हीं कार्यकर्ताओं के बल पर हर विधानसभा में सफलतापूर्वक कार्यक्रम किए गए। उन्होंने कहा कि यात्रा में हमने यह देखा कि पूरी दिल्ली में लोग आज भी शीला दीक्षित सरकार के कामकाज को याद कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि केजरीवाल ने बड़े-बड़े वादे अवश्य किए थे, लेकिन उन्होंने उन्हें पूरा नहीं किया और लोग छले गए। अब यही लोग कांग्रेस की ओर वापस आने के लिए तैयार हैं और उन्हें विश्वास है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वे बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहेंगे। 

डॉ. नरेश कुमार शर्मा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल के साथ गठबंधन न होने से कांग्रेस को बड़ा लाभ होगा। पूरी दिल्ली में कांग्रेस का कार्यकर्ता अपने दम पर लड़ाई लड़ना और जीतना चाहता है। जबकि अरविंद केजरीवाल के विरोध में दस सालों का एंटी इनकंबेंसी फैक्टर काम कर रहा है। यदि पार्टी उनके साथ लड़ाई में उतरती तो इससे लाभ कम, नुकसान अधिक हो सकता था। यानी कांग्रेस कार्यकर्ता आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन न होने को एक सकारात्मक निर्णय की तरह देख रहे हैं। गांधी परिवार इस उत्साह को ऊर्जा में बदल सकता है।    

मुस्लिम बहुल सीटों पर दर्ज करेंगे जीत
कांग्रेस के एक पूर्व मुस्लिम विधायक ने अमर उजाला से कहा कि इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं रह गया है कि दिल्ली का बड़ा मुस्लिम वर्ग अब केवल कांग्रेस की ओर देख रहा है। कोरोना काल में घटी कुछ घटनाओं ने मुसलमानों के बीच केजरीवाल का विश्वास खत्म कर दिया है। इस वोट बैंक के दम पर और अन्य मतदाताओं को साथ लेकर पार्टी कम से कम सात से आठ विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है। इस हवा के सहारे वह कुछ अन्य सीटों पर भी अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। 


नेता के अनुसार, लेकिन कांग्रेस इस वोट बैंक को तभी अपना बनाने में सफल हो सकती है जब वह सही उम्मीदवार उतारे। जिससे मुसलमानों को यह भरोसा पैदा हो सके कि कांग्रेस का उम्मीदवार भाजपा को हराने में सक्षम है। यदि पार्टी ने किसी बड़े नेता के दबाव में आकर कमजोर उम्मीदवारों को मैदान में  उतारा तो पार्टी को एक बार फिर निराशा का सामना करना पड़ सकता है।
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