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नटराजन का नामांकन रद्द: कांग्रेस समर्थकों का फूटा गुस्सा, CJI-CEC को चिट्ठी लिख निष्पक्षता पर उठाए सवाल
Thu, 11 Jun 2026 11:27 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 11 Jun 2026 11:27 PM IST
सार
मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने पर 300 नागरिकों ने सीजेआई और सीईसी को पत्र लिखा है। पत्र में इस कार्रवाई को चुनावी नियमों और लोकतांत्रिक निष्पक्षता के खिलाफ बताया गया है। हलफनामे में जानकारी छिपाने के आरोप में रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से की गई इस कार्रवाई के खिलाफ नटराजन ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
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मीनाक्षी नटराजन
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज होने के बाद देश का सियासी पारा गरमा गया है। इस फैसले के विरोध में कांग्रेस समर्थकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों सहित करीब 300 लोगों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को एक खुला पत्र लिखा है। 11 जून को लिखे गए इस पत्र में हस्ताक्षरकर्ताओं ने नामांकन रद्द किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे महज एक उम्मीदवार का मामला न मानकर चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक भागीदारी का एक बड़ा संकट बताया है।
चुनावी नियमों और पारदर्शिता का उठा मुद्दा
कांग्रेस प्रवक्ता अवनी बंसल की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए इस पत्र में चुनाव आयोग और देश की शीर्ष अदालत से दखल देने की मांग की गई है। पत्र में दलील दी गई है कि किसी भी उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने की शक्ति का उपयोग अत्यंत संयम, पूर्ण पारदर्शिता और कानून के प्रति अटूट निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए। हस्ताक्षरकर्ताओं का दावा है कि इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के वैधानिक सुरक्षा उपायों और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का ठीक से पालन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार किसी भी नामांकन को तब तक वैध माना जाना चाहिए जब तक कि उसके विपरीत कोई पुख्ता सबूत न हो।
यह भी पढ़ें: Explainer: एमपी में लगे झटके के बाद भी फायदे में कांग्रेस, किस वजह से राज्यसभा में नहीं बढ़ेंगी BJP की सीटें?
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हलफनामे और नियमों पर छिड़ी कानूनी जंग
इस खुले पत्र में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 36 का विशेष रूप से हवाला दिया गया है। पत्र के मुताबिक, नामांकन पत्रों को ऐसे आधारों पर खारिज नहीं किया जा सकता जो बहुत गंभीर या ठोस प्रकृति के न हों। इसके साथ ही चुनाव आयोग की 'रिटर्निंग ऑफिसर्स हैंडबुक' का जिक्र करते हुए यह दावा भी किया गया है कि केवल इस आरोप पर नामांकन रद्द नहीं किया जा सकता कि हलफनामे में कोई गलत जानकारी दी गई है। पत्र में साफ तौर पर लिखा गया है कि यह घटना केवल एक उम्मीदवार या एक राजनीतिक दल की नहीं है, बल्कि यह देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के संवैधानिक वादे से जुड़ी है।
मध्य प्रदेश से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक रार
पूरा विवाद मीनाक्षी नटराजन के हलफनामे में जानकारी छिपाने के आरोपों के बाद शुरू हुआ। राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा के आदेश के अनुसार, नटराजन का फॉर्म 26 अधूरा पाया गया, जिसमें एक अदालती शिकायत का जिक्र नहीं था। मध्य प्रदेश विधानसभा के एक अधिकारी के मुताबिक, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार महेश केवट ने शिकायत दर्ज कराई थी कि नटराजन ने तेलंगाना में दर्ज एक मामले की जानकारी अपने हलफनामे में नहीं दी है। इस फैसले के खिलाफ मीनाक्षी नटराजन ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है।
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चुनावी नियमों और पारदर्शिता का उठा मुद्दा
कांग्रेस प्रवक्ता अवनी बंसल की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए इस पत्र में चुनाव आयोग और देश की शीर्ष अदालत से दखल देने की मांग की गई है। पत्र में दलील दी गई है कि किसी भी उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने की शक्ति का उपयोग अत्यंत संयम, पूर्ण पारदर्शिता और कानून के प्रति अटूट निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए। हस्ताक्षरकर्ताओं का दावा है कि इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के वैधानिक सुरक्षा उपायों और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का ठीक से पालन नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार किसी भी नामांकन को तब तक वैध माना जाना चाहिए जब तक कि उसके विपरीत कोई पुख्ता सबूत न हो।
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हलफनामे और नियमों पर छिड़ी कानूनी जंग
इस खुले पत्र में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 36 का विशेष रूप से हवाला दिया गया है। पत्र के मुताबिक, नामांकन पत्रों को ऐसे आधारों पर खारिज नहीं किया जा सकता जो बहुत गंभीर या ठोस प्रकृति के न हों। इसके साथ ही चुनाव आयोग की 'रिटर्निंग ऑफिसर्स हैंडबुक' का जिक्र करते हुए यह दावा भी किया गया है कि केवल इस आरोप पर नामांकन रद्द नहीं किया जा सकता कि हलफनामे में कोई गलत जानकारी दी गई है। पत्र में साफ तौर पर लिखा गया है कि यह घटना केवल एक उम्मीदवार या एक राजनीतिक दल की नहीं है, बल्कि यह देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के संवैधानिक वादे से जुड़ी है।
मध्य प्रदेश से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक रार
पूरा विवाद मीनाक्षी नटराजन के हलफनामे में जानकारी छिपाने के आरोपों के बाद शुरू हुआ। राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा के आदेश के अनुसार, नटराजन का फॉर्म 26 अधूरा पाया गया, जिसमें एक अदालती शिकायत का जिक्र नहीं था। मध्य प्रदेश विधानसभा के एक अधिकारी के मुताबिक, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार महेश केवट ने शिकायत दर्ज कराई थी कि नटराजन ने तेलंगाना में दर्ज एक मामले की जानकारी अपने हलफनामे में नहीं दी है। इस फैसले के खिलाफ मीनाक्षी नटराजन ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बता दें कि मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है।