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वर्चुअल आतंक: फरीदाबाद-दिल्ली मॉड्यूल ने व्हाइट कॉलर टेरर का खतरनाक अध्याय खोला, नए मोड़ पर पहुंच चुका आतंकवाद
Tue, 18 Nov 2025 05:08 AM IST
लव गौर
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: लव गौर
Updated Tue, 18 Nov 2025 05:08 AM IST
सार
आतंकवाद नए मोड़ पर पहुंच चुका है। जहां हथियारों और विस्फोटकों के साथ-साथ अब मोबाइल फोन, लैपटॉप, डिजिटल नेटवर्क, एन्क्रिप्टेड चैट और क्लाउड-आधारित कट्टरपंथ प्रशिक्षण सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं।
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मोबाइल फोन, लैपटॉप और हाई-प्रोफाइल पेशेवरों की आड़ में पनपता वर्चुअल आतंक
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
इंटरपोल और रैंड कॉरपोरेशन की नवीनतम टेरर बिहेवियर इंटेलिजेंस रिपोर्ट बताती है कि विश्व आतंकवाद नए मोड़ पर पहुंच चुका है। जहां हथियारों और विस्फोटकों के साथ-साथ अब मोबाइल फोन, लैपटॉप, डिजिटल नेटवर्क, एन्क्रिप्टेड चैट और क्लाउड-आधारित कट्टरपंथ प्रशिक्षण सबसे बड़ा हथियार बन चुके हैं।
देश में फरीदाबाद–दिल्ली में उजागर हुआ डॉक्टरों से जुड़ा आतंकी मॉड्यूल इस वैश्विक पैटर्न की पुष्टि करता है कि डिजिटल कट्टरता अब सफेदपोशों तक फैल चुकी है और इसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ दो दशक में आतंकवाद का सबसे खतरनाक और अदृश्य रूप मान रहे हैं।
काउंटर टेररिज्म डायरेक्टरेट का कहना है कि ट्विन टावर (2001), पेरिस (2015), श्रीलंका (2019) और काबुल (2021) जैसे बड़े हमलों की जांच में पाया गया कि आतंकी भर्ती, ट्रेनिंग और आदेश का केंद्र अब डिजिटल दुनिया है। इंटरपोल के विश्लेषण के अनुसार, फरीदाबाद-दिल्ली मॉड्यूल उन्हीं नेटवर्क रणनीतियों पर आधारित है। कट्टरपंथी सामग्री क्लाउड पर, प्रशिक्षण इनक्रिप्टेड ऐप्स पर, निर्देश डिजिटल नोट्स में और फंड ट्रांसफर भी ऑनलाइन।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मॉड्यूल में एमबीबीएस डॉक्टर, मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर और उच्च शिक्षित टेक-सेवी युवा शामिल थे, यानी आतंकवाद अब संगठित अपराधियों के बजाय सम्मानित पेशेवर वर्ग में भी प्रवेश कर चुका है।
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ये भी पढ़ें: दिल्ली ब्लास्ट में पंजाब का लिंक!: NIA के रडार पर लुधियाना का डॉक्टर, अल फलाह यूनवर्सिटी से की है MBBS
धार्मिक नैरेटिव और डिजिटल इंजीनियरिंग नेटवर्क
इंटरपोल और रैंड कॉरपोरेशन टेररिज्म बिहेवियर इंटेलिजेंस डिवीजन का मूल्यांकन है कि कट्टर संगठन धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि धर्म को भावनात्मक हथियार की तरह उपयोग करते हैं। फरीदाबाद– दिल्ली मॉड्यूल में भी वही पैटर्न है। धार्मिक ग्रंथों और इतिहास की मनचाही व्याख्याएं, अन्य समुदायों के प्रति घृणा और कथित बलिदान को महिमामंडित करने वाली सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दी जाती है।
नेक्स्ट ग्रीन टेरर इनक्यूबेशन मॉडल: पहचान-संकट और धार्मिक-न्याय नैरेटिव, भाईचारा, मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग और अंत में वीडियो ग्लोरी वादा यानी मृत्यु को महान बलिदान के रूप में पेश करना।
समाधान क्या...
ये भी पढ़ें: 'सफेदपोश' आतंकी मॉड्यूल: बांग्लादेश गए बिना ही मिल जाती है MBBS की डिग्री, जांच में चौंकाने वाला खुलासा
दिल्ली केस की अब तक की जांच से उजागर 7-स्टेप पैटर्न
कट्टरता की प्रक्रिया बिल्कुल वैश्विक 7-स्टेप मॉडल पर चलती है: सोशल मीडिया टारगेटिंग, फिर पहचान-संकट, धार्मिक-न्याय नैरेटिव, समूह चैट के माध्यम से भाईचारा, इनक्रिप्टेड ट्रेनिंग, मिशन की मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग, अंत में वीडियो ग्लोरी वादा यानी मृत्यु को महान बलिदान के रूप में पेश करना।
महत्वपूर्ण यह है कि भारत के इस मॉड्यूल में किसी हथियार प्रशिक्षण शिविर में शारीरिक उपस्थिति की जरूरत नहीं थी पूरा प्रशिक्षण ऑनलाइन था। इसे इंटरपोल नेक्स्ट ग्रीन टेरर इनक्यूबेशन मॉडल कह रहा है। यह एक ऐसा नया उभरता हुआ आतंकी मॉडल है, जिसमें आतंकवादी नेटवर्क जंगल बचाओ, खेती, पर्यावरण आंदोलन, इको-फंडिंग और क्लाइमेट एक्टिविज्म के नाम पर गुप्त रूप से अपने कैंप, फंड और भर्ती नेटवर्क तैयार करते हैं।
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देश में फरीदाबाद–दिल्ली में उजागर हुआ डॉक्टरों से जुड़ा आतंकी मॉड्यूल इस वैश्विक पैटर्न की पुष्टि करता है कि डिजिटल कट्टरता अब सफेदपोशों तक फैल चुकी है और इसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ दो दशक में आतंकवाद का सबसे खतरनाक और अदृश्य रूप मान रहे हैं।
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काउंटर टेररिज्म डायरेक्टरेट का कहना है कि ट्विन टावर (2001), पेरिस (2015), श्रीलंका (2019) और काबुल (2021) जैसे बड़े हमलों की जांच में पाया गया कि आतंकी भर्ती, ट्रेनिंग और आदेश का केंद्र अब डिजिटल दुनिया है। इंटरपोल के विश्लेषण के अनुसार, फरीदाबाद-दिल्ली मॉड्यूल उन्हीं नेटवर्क रणनीतियों पर आधारित है। कट्टरपंथी सामग्री क्लाउड पर, प्रशिक्षण इनक्रिप्टेड ऐप्स पर, निर्देश डिजिटल नोट्स में और फंड ट्रांसफर भी ऑनलाइन।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मॉड्यूल में एमबीबीएस डॉक्टर, मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर और उच्च शिक्षित टेक-सेवी युवा शामिल थे, यानी आतंकवाद अब संगठित अपराधियों के बजाय सम्मानित पेशेवर वर्ग में भी प्रवेश कर चुका है।
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धार्मिक नैरेटिव और डिजिटल इंजीनियरिंग नेटवर्क
इंटरपोल और रैंड कॉरपोरेशन टेररिज्म बिहेवियर इंटेलिजेंस डिवीजन का मूल्यांकन है कि कट्टर संगठन धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि धर्म को भावनात्मक हथियार की तरह उपयोग करते हैं। फरीदाबाद– दिल्ली मॉड्यूल में भी वही पैटर्न है। धार्मिक ग्रंथों और इतिहास की मनचाही व्याख्याएं, अन्य समुदायों के प्रति घृणा और कथित बलिदान को महिमामंडित करने वाली सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दी जाती है।
नेक्स्ट ग्रीन टेरर इनक्यूबेशन मॉडल: पहचान-संकट और धार्मिक-न्याय नैरेटिव, भाईचारा, मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग और अंत में वीडियो ग्लोरी वादा यानी मृत्यु को महान बलिदान के रूप में पेश करना।
समाधान क्या...
- डिजिटल डी-रेडिकलाइजेशन और साइबर सर्विलांस: इंटरनेट, इनक्रिप्टेड प्लेटफार्म, डार्क-वेब और सोशल मीडिया पर चल रहे कट्टरपंथी नेटवर्क की कड़ी निगरानी।
- प्रोफेशनल इंस्टिट्यूशंस में साइकोलॉजिकल और एथिकल काउंसलिंग: ताकि मेडिकल, इंजीनियरिंग व यूनिवर्सिटी सेक्टर के युवा न भटकें।
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दिल्ली केस की अब तक की जांच से उजागर 7-स्टेप पैटर्न
कट्टरता की प्रक्रिया बिल्कुल वैश्विक 7-स्टेप मॉडल पर चलती है: सोशल मीडिया टारगेटिंग, फिर पहचान-संकट, धार्मिक-न्याय नैरेटिव, समूह चैट के माध्यम से भाईचारा, इनक्रिप्टेड ट्रेनिंग, मिशन की मनोवैज्ञानिक कंडीशनिंग, अंत में वीडियो ग्लोरी वादा यानी मृत्यु को महान बलिदान के रूप में पेश करना।
महत्वपूर्ण यह है कि भारत के इस मॉड्यूल में किसी हथियार प्रशिक्षण शिविर में शारीरिक उपस्थिति की जरूरत नहीं थी पूरा प्रशिक्षण ऑनलाइन था। इसे इंटरपोल नेक्स्ट ग्रीन टेरर इनक्यूबेशन मॉडल कह रहा है। यह एक ऐसा नया उभरता हुआ आतंकी मॉडल है, जिसमें आतंकवादी नेटवर्क जंगल बचाओ, खेती, पर्यावरण आंदोलन, इको-फंडिंग और क्लाइमेट एक्टिविज्म के नाम पर गुप्त रूप से अपने कैंप, फंड और भर्ती नेटवर्क तैयार करते हैं।