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भाजपा के लिए 'करो या मरो' के सवाल की तरह है दिल्ली विधानसभा चुनाव

Tue, 07 Jan 2020 02:07 AM IST
संजीव कुमार झा हिमांशु मिश्र, अमर उजाला
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 07 Jan 2020 02:07 AM IST
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Delhi assembly election 2020 is do or die for bjp

लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए चौथी चुनौती है, जिसमें पार्टी के लिए करो या मरो का सवाल है। हरियाणा में मुश्किल से सत्ता बचाने वाली भाजपा से अगर महाराष्ट्र, झारखंड की तरह दिल्ली भी दूर हुई, तो उसकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी। सबसे प्रतिकूल असर पार्टी और मोदी सरकार के राष्ट्रवादी एजेंडे पर पड़ेगा।

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जीत से जहां पार्टी को उसके राष्ट्रवादी एजेंडे को बल मिलेगा, वहीं हार को विपक्ष एनआरसी, एनपीआर और सीएए पर जनमत सर्वेक्षण बता निशाना साधेगा।

भाजपा की मुश्किल यह है कि वह लोकसभा में विपक्ष पर मिली जबर्दस्त बढ़त को बरकरार नहीं रख पा रही। लोकसभा चुनाव के मुकाबले हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी के वोट प्रतिशत में काफी गिरावट दर्ज की गई। लोकसभा चुनाव के मुकाबले हरियाणा और झारखंड में पार्टी के वोट प्रतिशत में क्रमश: 22 फीसदी और 17 फीसदी की कमी आई।
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लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हरियाणा की तरह दिल्ली में भी क्लीन स्वीप किया था। पार्टी को लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 22.5 फीसदी, आप 18.1 फीसदी के मुकाबले 56 फीसदी वोट मिले थे।

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फिर राष्ट्रवाद और मोदी का सहारा

दिल्ली में दमदार चेहरे के अभाव में भाजपा को फिर से पीएम मोदी और राष्ट्रवाद के मुद्दों का सहारा लेना पड़ रहा है। पार्टी की मुश्किल यह है कि जिन नेताओं को राज्यों में सीएम बना कर फ्री हैंड दिया, वह अपना दमदार व्यक्तित्व तैयार करने में नाकाम रहे। हरियाणा में मनोहर लाल, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और झारखंड में रघुवर दास अपने दम पर कोई कमाल नहीं दिखा पाए। दिल्ली में भी पार्टी के पास कोई सर्वमान्य कद्दावर नेता नहीं है।

आप-कांग्रेस के वोट बंटे तो सीधा लाभ भाजपा को

दिल्ली में भाजपा की जीत या हार आप और कांग्रेस के प्रदर्शन से तय होगी। पार्टी की दोनों प्रतिद्वंद्वियों के वोट बैंक (दलित-मुस्लिम-झुग्गी झोपड़ी) करीब करीब एक ही है। ऐसे में अगर आप और कांग्रेस के वोट बंटे तो इसका सीधा लाभ भाजपा को होगा। इसके इतर अगर इन वोटों का किसी एक दल के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ, तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ेंगी। पिछले चुनाव में यह वोट बैंक सीधे आप की झोली में गया था। लोकसभा चुनाव में दलित-मुस्लिम और झुग्गी के मतदाताओं के वोट में बिखराव से भाजपा ने क्लीन स्वीप किया था।

जीतने पर सहयोगियों को साधने में मदद

देश में सीएए, एनआरसी, एनपीआर पर उबाल है। भाजपा इन मुद्दों पर आक्रामक है, तो विपक्ष विरोध में। झारखंड के बाद अब अगर दिल्ली में भी पार्टी को जीत नहीं मिली तो मोदी सरकार के एजेंडे पर सवाल उठेंगे। झारखंड के नतीजे के बाद नाराजगी जता रहे सहयोगी दल खुल कर विरोध में उतर सकते हैं।

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