Supreme Court: 500 रुपये की घड़ी बनी थी युवक के मौत की वजह, 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया आजाद
करीब तीन दशक पहले घड़ी को लेकर हुए विवाद में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। इस मामले में करीब 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए जीवित बचे आरोपी की पांच साल की सजा घटाकर उसे पहले से काटी गई डेढ़ साल की सजा के बराबर मान लिया और मामले का निपटारा कर दिया।
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विस्तार
साल 1997 में 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर शुरू हुआ पड़ोसियों का मामूली विवाद आखिरकार एक व्यक्ति की मौत का कारण बन गया। इस मामले में करीब तीन दशक बाद सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए लंबे समय से चली आ रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 के तहत दोषी ठहराए गए तीन लोगों के मामले का निपटारा करते हुए कहा कि दोषसिद्धि तो बरकरार रहेगी, लेकिन अब जीवित बचे एक आरोपी को उतनी ही सजा मान ली जाएगी, जितनी वह पहले ही काट चुका है।
क्या था मामला?
मामले के अनुसार, पदम सिंह ने अपने पड़ोसी महुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। लेकिन महुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे लौटाने पहुंचा। इसी बात पर दोनों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो देखते ही देखते हाथापाई में बदल गई। इस दौरान महुआ के साथ रामू और मथु भी आ गए। तीनों ने मिलकर पदम सिंह पर हमला कर दिया। झगड़े के दौरान तीनों ने पदम सिंह को सूखी नहर में धक्का दे दिया गया। आरोप था कि झगड़े के दौरान मथु ने पदम सिंह के सिर पर भारी पत्थर से भी वार किया। सिर पर चोट लगने की वजह से सिंह नहर की पथरीली सतह पर गिर गएन जिससे उन्हें गंभीर चोटें आ गईं। घटना के बाद पदम सिंह को इलाज के लिए दून अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी।
तीन में से दो आरोपियों की हो चुकी मौत
देहरादून की ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2002 में तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। बाद में 2012 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना। इसके बाद आरोपियों ने उसी साल सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि अपील लंबित रहने के दौरान तीन दोषियों में से दो की मौत हो चुकी है। तीसरे आरोपी मथु की उम्र अब 60 वर्ष से अधिक हो चुकी है और वह पहले ही करीब डेढ़ साल जेल में बिता चुका है।
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'पांच साल की सजा पूरी करवाना उचित नहीं'
बेंच ने कहा कि घटना को लगभग 29 साल बीत चुके हैं। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि मृतक के चेहरे और सिर पर जो चोटें थीं, वे सूखी नहर की पथरीली सतह पर गिरने से भी लगी थीं। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय बाद पांच साल की सजा पूरी करवाना उचित नहीं होगा। इसलिए मथु की सजा को घटाकर उतनी ही अवधि माना जाता है, जितनी वह पहले ही जेल में काट चुका है। हालांकि, उसकी दोषसिद्धि बरकरार रहेगी। इस तरह 500 रुपये की एक घड़ी से शुरू हुआ विवाद, जिसने एक व्यक्ति की जान ले ली थी, करीब तीन दशक बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ अपने अंतिम मुकाम पर पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी खरीदार को फ्लैट मिलने में देरी हुई है तो वह फ्लैट पर कब्जा लेने के बाद भी देरी के लिए मुआवजे की दावा कर सकता है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के 2016 के एक आदेश को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा कि कब्जा मिलने मात्र से ही खरीदार का मुआवजे का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। पीठ एनसीडीआरसी के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता शिकायत दर्ज कराए जाने के समय उपभोक्ता नहीं था, क्योंकि वह बिना किसी विरोध के फ्लैट का कब्जा पहले ही ले चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोग के फैसले को रद्द किया
पीठ ने एनसीडीआरसी के इस तर्क को पूरी तरह गलत बताया। कोर्ट ने 4 जून के अपने आदेश में कहा कि देरी के लिए मुआवजे की मांग हमेशा कब्जा मिलने से पहले की अवधि के लिए होती है, इसलिए कब्जा मिलने के बाद भी खरीदार कानूनी रूप से मुआवजा पाने का हकदार है। याचिकाकर्ता जनवरी 2003 में दिल्ली की एक सहकारी समूह आवास समिति का सदस्य बना था और उसे देरी से फ्लैट आवंटित किया गया था।
मामले को मध्यस्थता के लिए भेजना गलत
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जिला फोरम ने उपभोक्ता शिकायत स्वीकार कर समिति को नोटिस जारी किया था। इसके बाद समिति ने विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध करते हुए आवेदन दाखिल किया। अपीलकर्ता ने शीर्ष अदालत में दलील दी कि पक्षकारों के बीच समझौते में मध्यस्थता संबंधी प्रावधान होने मात्र के आधार पर उपभोक्ता की शिकायत को मध्यस्थता के लिए नहीं भेजा जा सकता था।
एनसीडीआरसी के आदेश में खामी
पीठ ने कहा, राष्ट्रीय आयोग ने पुनरीक्षण याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि शिकायत दर्ज करते समय अपीलकर्ता उपभोक्ता नहीं था, क्योंकि वह बिना विरोध के फ्लैट का कब्जा पहले ही ले चुका था। अदालत ने कहा कि ऐसा करते समय एनसीडीआरसी जिला फोरम और राज्य आयोग के आदेशों से उत्पन्न अधिकार क्षेत्र संबंधी मुख्य प्रश्न पर विचार करने में विफल रहा।
उपभोक्ता फोरमों के आदेश रद्द
पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए एनसीडीआरसी, राज्य आयोग और जिला फोरम के आदेशों को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने उपभोक्ता की शिकायत बहाल कर दी और उसे गुण-दोष के आधार पर फैसले के लिए द्वारका जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष रखने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जिला आयोग दोनों पक्षों को सुनवाई और साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर देने के बाद शिकायत पर फैसला करेगा। पीठ ने कहा, चूंकि यह शिकायत 2005 की है, इसलिए द्वारका जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग इस आदेश की प्रति मिलने की तारीख से यथासंभव एक वर्ष के भीतर इसका निपटारा करने का प्रयास करे।