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इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के लिए तोड़े गए दलितों के घर
बीबीसी, हिंदी
Updated Mon, 05 Feb 2018 02:18 PM IST
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"बड़ जात के पइसा मिल गइलै, छोट जात के न मिलल। गरीबन के एगो रुपइया न मिलल अ बभना सब के मिल गइल। ठंडा में दुगो मौउतो भइल। अब गरमी में कग्गो मौत होई, के जाने। पहिले मेघे में भिजलीं, अब धूप में प्यासे मरबो हमनी के।" (ऊंची जाति के लोगों को पैसा मिला और छोटी जाति के लोगों को नहीं। गरीबों को एक रुपया तक नहीं मिला जबकि सभी ब्राह्मणों को पैसा मिल गया। मेरे टोले में ठंड से दो लोग मर गए। क्या पता अब गर्मी में कितने लोग मरेंगे? पहले बारिश और अब प्यास।" अपने टूटे घर को याद करते हुए और मुआवजे की बात करते हुए बाबूपुर गांव की कुसमी देवी आंखों को आंचल के किनारे से पोंछती हैं और फिर एकाएक भावशून्य हो जाती हैं। जाति से 'मुसहर' कुसमी देवी पढ़ी-लिखी नहीं हैं। न तो मायका इतना संपन्न था न ससुराल कि उन्हें पढ़ा सके। वो सिर्फ खोरठा (स्थानीय बोली) ही बोल पाती हैं लेकिन रांची में बैठे अधिकतर अधिकारियों को उनकी बोली समझ नहीं आती।
कुसमी देवी के घर से लगे ही कुछ और 'मुसहर' परिवार भी हैं। आस-पास दलितों के कुछ और मकान भी थे, जो अब मलबा बन चुके हैं। बाबूपुर गांव झारखंड के देवघर जिले के सातर खरपोस पंचायत का हिस्सा है। गांव में अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने वाला है। जिसके लिए गांव के 133 घरों को तोड़ दिया गया। जिन जमीनों पर ये घर थे वो सरकार ने ही भूदान आंदोलन के तहत इन लोगों को दी थी। लेकिन अब प्रशासन इसे अतिक्रमण बता रहा है। प्रशासनिक परिभाषा के मुताबिक, इन 133 घरों की जमीनें रैयती नहीं हैं, क्योंकि भूदान के तहत मिले जमीन के टुकड़ों का इन लोगों ने तब सरकार से 'कन्फर्मेशन' नहीं कराया था। हालांकि, ऐसा तर्क देने वाले अफसर यह नहीं बता पाते कि इस कथित 'कन्फर्मेशन' के लिए तब कोई 'स्पेशल कैंप' या 'लिट्रेसी शिविर' लगाया गया था या नहीं। वे कहते हैं कि यह बहुत पुरानी बात है, इसलिए कुछ नहीं बता सकते। बाबूपुर गांव में दिवाली के ठीक पहले लोगों के घर तोड़ दिए गए।
जिस दिन बुल्डोजर ने घर ढहाए, आसमान रो रहा था। लाखो देवी की बहू खुले आसमान में, गीली जमीन पर प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। उनका दावा है कि अफसरों को बहू की हालत का हवाला देकर मिन्नतें भी कीं लेकिन किसी ने उस दर्द को महसूस नहीं किया। लाखो देवी कहती हैं, "गांव की औरतों ने साड़ी का घेरा बनाया और प्रसव कराया।" अक्टूबर में घर टूटे और उसके बाद से सात बच्चे ऐसे ही मां की कोख से दुनिया में आए। जहां उनके लिए कोई छत नहीं थी। पहले कोख में और अब गोद में अपने बच्चों के साथ मलबे पर बैठी ये मांएं कहीं न कहीं इसे नियति मान चुकी हैं। घर टूट गए तो लोगों ने जोड़-तोड़ करके टीन शेड डाली लेकिन दावा है कि ठिठुरती ठंड ने तीन लोगों को लील लिया। मरने वालों में एक पोचा मांझी भी थे। उनकी विधवा कदमी देवी आहट सुनते ही भूदान के तहत मिली जमीन और अपने पति की बंधुआ मजदूरी से मुक्ति के प्रमाण पत्र लेकर खड़ी हो जाती हैं। उन्हें अब भी आस है कि सरकार उनकी सुनेगी। उनके अस्थायी टीन शेड के सामने कागज के सफ़ेद प्लेट बिखरे पड़े हैं। इन प्लेटों में गांव के लोगों ने पोचा मांझी के श्राद्ध का भोज खाया था। झारखंड सरकार ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआइ) और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के साथ एक करार किया है। इसके तहत देवघर एयरपोर्ट को अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाया जाना है।
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इस प्रोजेक्ट में झारखंड सरकार 50 करोड़ और डीआरडीओ 200 करोड़ रुपये दे रहा है। बाकी का खर्च एएआइ के जिम्मे है। प्रस्तावित एयरपोर्ट को इस लायक बनाया जाएगा ताकि यहां से 'ए-320' और 'सी-130' जैसे एयरक्राफ्ट उड़ान भर सकें। इसके लिए देवघर प्रखंड के 13 गांवों की 600 एकड़ जमीन खाली कराई गई है। इसमें से करीब 438 एकड़ जमीन रैयती है, जबकि 144 एकड़ सरकारी और 18 एकड़ जमीन वन विभाग की है। रैयती जमीनों के अधिग्रहण के क्रम में 500 से अधिक घर तोड़े गए हैं। इनमें बाबूपुर और कटिया गांव के करीब 150 घर भी शामिल हैं। बाबूपुर दलितों का गांव है, वहीं कटिया में तोड़े गए करीब बीस घर मुसलमानों के हैं। बाबूपुर के लोग अपने टूटे घरों के मलबों के बगल में टीन के शेड बनाकर रह रहे हैं, वहीं कटिया वालों ने अपने संबंधियों के यहां शरण ले रखी है। इनका आरोप है कि दलित और मुसलमान होने के कारण इन्हें मुआवजा नहीं दिया गया।
कटिया की गुलबान बीबी की उम्र करीब 65 साल है। जिस घर में वो ब्याह कर आई थीं अब वो मलबा बन चुका है। उनकी एक एकड़ जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई है। गुलबान बीबी ने बीबीसी से कहा, "घर तोड़ने के पहले हाकिम लोग बोले थे कि नया घर बना देंगे। जमीन का पैसा भी देंगे। मेरी एक एकड़ जमीन चली गयी और हम मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। मुझे एक करोड़ मिलना चाहिए था लेकिन एक चॉकलेट भी नहीं खा सके। अब हम दुमका जाते हैं, आते हैं लेकिन पैसा नहीं मिलता।" गुलबान बीबी के बेटे जलालुद्दीन अंसारी मजदूरी करते हैं। उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुआवजा मांगने पर अधिकारी उन्हें हड़काने लगते हैं। हमने रिश्वत नहीं दी तो विवाद में फंसाकर दुमका का चक्कर लगवा दिया। हम लोग हर तारीख पर दुमका कोर्ट जाते हैं और अगली तारीख लेकर वापस लौट आते हैं। अब हमारे पास जान देने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा है। अगर पैसा नहीं मिला, तो एयरपोर्ट के उद्घाटन के दिन ही जान दे देंगे।"
कानून के तहत अधिग्रहण?
वहीं देवघर में एडिशनल डीएम अंजनी कुमार दुबे का दावा है कि झारखंड सरकार की जमीन अधिग्रहण नीति के तहत जमीनें ली गई हैं और लोगों को उसके मुताबिक मुआवजा भी मिला है। कटिया के लोगों को मुआवजे न मिलने की बात पर वो कहते हैं कि उन्हीं लोगों के मुआवजे का मामला लंबित है, जिनकी जमीनों के एक से अधिक दावेदार हैं। लिहाजा, ऐसे लोगों का मामला दुमका कोर्ट भेज दिया गया है। अब कोर्ट तय करेगा कि वह राशि किसे मिलेगी। हालांकि झारखंड मुक्ति मोर्चा के देवघर प्रखंड अध्यक्ष सुरेश साह इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि अधिग्रहण नीति के मुताबिक, किसी का घर तोड़ने से पहले उसे बसाना जरूरी है, लेकिन बाबूपुर में इस पर अमल नहीं किया गया है।
वहीं, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दीपिका पांडेय सिंह ने इस मामले में अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की है। उन्होंने बीबीसी से कहा कि अगर इन्हें बसा दिया गया होता, तो तीन लोगों की ठंड से जान नहीं जाती. इसके लिए सरकार और उनके अधिकारी दोषी हैं। इधर, देवघर जिले के भू अर्जन पदाधिकारी अनिल कुमार यादव ने बीबीसी से कहा, ''भूदान के तहत मिली ज़मीनों का मुआवजा नहीं दे सकते क्योंकि, कानूनन वह जमीन सरकार की थी। अलबत्ता उनकी पीड़ा को देखते हुए हमने 61 लोगों को प्रति व्यक्ति 700 वर्गफीट जमीन और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उस पर पक्का घर बनाकर देने की योजना बनाई है। मंजूरी मिलते ही हम उनके लिए घर बना देंगे। हमारा सर्वे अभी जारी है, अगर कुछ और लोग छूटे होंगे तो उन्हें भी इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन, उन्हें अपना गांव छोड़कर बगल के नैयाडीह में शिफ्ट होना पड़ेगा।
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कुसमी देवी के घर से लगे ही कुछ और 'मुसहर' परिवार भी हैं। आस-पास दलितों के कुछ और मकान भी थे, जो अब मलबा बन चुके हैं। बाबूपुर गांव झारखंड के देवघर जिले के सातर खरपोस पंचायत का हिस्सा है। गांव में अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने वाला है। जिसके लिए गांव के 133 घरों को तोड़ दिया गया। जिन जमीनों पर ये घर थे वो सरकार ने ही भूदान आंदोलन के तहत इन लोगों को दी थी। लेकिन अब प्रशासन इसे अतिक्रमण बता रहा है। प्रशासनिक परिभाषा के मुताबिक, इन 133 घरों की जमीनें रैयती नहीं हैं, क्योंकि भूदान के तहत मिले जमीन के टुकड़ों का इन लोगों ने तब सरकार से 'कन्फर्मेशन' नहीं कराया था। हालांकि, ऐसा तर्क देने वाले अफसर यह नहीं बता पाते कि इस कथित 'कन्फर्मेशन' के लिए तब कोई 'स्पेशल कैंप' या 'लिट्रेसी शिविर' लगाया गया था या नहीं। वे कहते हैं कि यह बहुत पुरानी बात है, इसलिए कुछ नहीं बता सकते। बाबूपुर गांव में दिवाली के ठीक पहले लोगों के घर तोड़ दिए गए।
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जिस दिन बुल्डोजर ने घर ढहाए, आसमान रो रहा था। लाखो देवी की बहू खुले आसमान में, गीली जमीन पर प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। उनका दावा है कि अफसरों को बहू की हालत का हवाला देकर मिन्नतें भी कीं लेकिन किसी ने उस दर्द को महसूस नहीं किया। लाखो देवी कहती हैं, "गांव की औरतों ने साड़ी का घेरा बनाया और प्रसव कराया।" अक्टूबर में घर टूटे और उसके बाद से सात बच्चे ऐसे ही मां की कोख से दुनिया में आए। जहां उनके लिए कोई छत नहीं थी। पहले कोख में और अब गोद में अपने बच्चों के साथ मलबे पर बैठी ये मांएं कहीं न कहीं इसे नियति मान चुकी हैं। घर टूट गए तो लोगों ने जोड़-तोड़ करके टीन शेड डाली लेकिन दावा है कि ठिठुरती ठंड ने तीन लोगों को लील लिया। मरने वालों में एक पोचा मांझी भी थे। उनकी विधवा कदमी देवी आहट सुनते ही भूदान के तहत मिली जमीन और अपने पति की बंधुआ मजदूरी से मुक्ति के प्रमाण पत्र लेकर खड़ी हो जाती हैं। उन्हें अब भी आस है कि सरकार उनकी सुनेगी। उनके अस्थायी टीन शेड के सामने कागज के सफ़ेद प्लेट बिखरे पड़े हैं। इन प्लेटों में गांव के लोगों ने पोचा मांझी के श्राद्ध का भोज खाया था। झारखंड सरकार ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआइ) और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के साथ एक करार किया है। इसके तहत देवघर एयरपोर्ट को अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाया जाना है।
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कटिया की गुलबान बीबी की उम्र करीब 65 साल है। जिस घर में वो ब्याह कर आई थीं अब वो मलबा बन चुका है। उनकी एक एकड़ जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई है। गुलबान बीबी ने बीबीसी से कहा, "घर तोड़ने के पहले हाकिम लोग बोले थे कि नया घर बना देंगे। जमीन का पैसा भी देंगे। मेरी एक एकड़ जमीन चली गयी और हम मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं। मुझे एक करोड़ मिलना चाहिए था लेकिन एक चॉकलेट भी नहीं खा सके। अब हम दुमका जाते हैं, आते हैं लेकिन पैसा नहीं मिलता।" गुलबान बीबी के बेटे जलालुद्दीन अंसारी मजदूरी करते हैं। उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुआवजा मांगने पर अधिकारी उन्हें हड़काने लगते हैं। हमने रिश्वत नहीं दी तो विवाद में फंसाकर दुमका का चक्कर लगवा दिया। हम लोग हर तारीख पर दुमका कोर्ट जाते हैं और अगली तारीख लेकर वापस लौट आते हैं। अब हमारे पास जान देने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा है। अगर पैसा नहीं मिला, तो एयरपोर्ट के उद्घाटन के दिन ही जान दे देंगे।"
कानून के तहत अधिग्रहण?
वहीं देवघर में एडिशनल डीएम अंजनी कुमार दुबे का दावा है कि झारखंड सरकार की जमीन अधिग्रहण नीति के तहत जमीनें ली गई हैं और लोगों को उसके मुताबिक मुआवजा भी मिला है। कटिया के लोगों को मुआवजे न मिलने की बात पर वो कहते हैं कि उन्हीं लोगों के मुआवजे का मामला लंबित है, जिनकी जमीनों के एक से अधिक दावेदार हैं। लिहाजा, ऐसे लोगों का मामला दुमका कोर्ट भेज दिया गया है। अब कोर्ट तय करेगा कि वह राशि किसे मिलेगी। हालांकि झारखंड मुक्ति मोर्चा के देवघर प्रखंड अध्यक्ष सुरेश साह इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि अधिग्रहण नीति के मुताबिक, किसी का घर तोड़ने से पहले उसे बसाना जरूरी है, लेकिन बाबूपुर में इस पर अमल नहीं किया गया है।
वहीं, कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दीपिका पांडेय सिंह ने इस मामले में अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चलाने की मांग की है। उन्होंने बीबीसी से कहा कि अगर इन्हें बसा दिया गया होता, तो तीन लोगों की ठंड से जान नहीं जाती. इसके लिए सरकार और उनके अधिकारी दोषी हैं। इधर, देवघर जिले के भू अर्जन पदाधिकारी अनिल कुमार यादव ने बीबीसी से कहा, ''भूदान के तहत मिली ज़मीनों का मुआवजा नहीं दे सकते क्योंकि, कानूनन वह जमीन सरकार की थी। अलबत्ता उनकी पीड़ा को देखते हुए हमने 61 लोगों को प्रति व्यक्ति 700 वर्गफीट जमीन और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उस पर पक्का घर बनाकर देने की योजना बनाई है। मंजूरी मिलते ही हम उनके लिए घर बना देंगे। हमारा सर्वे अभी जारी है, अगर कुछ और लोग छूटे होंगे तो उन्हें भी इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा। लेकिन, उन्हें अपना गांव छोड़कर बगल के नैयाडीह में शिफ्ट होना पड़ेगा।