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नरेंद्र मोदी सरकार को 'दलित' शब्दावली से क्यों दिक्कत है?

Wed, 05 Sep 2018 03:46 PM IST
बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Updated Wed, 05 Sep 2018 03:46 PM IST
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Dalit thinkers question Narendra Modi government orders of not using word 'dalit'
- फोटो : BBC
भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों से कहा है कि वो दलित शब्दावली का इस्तेमाल ना करें। मंत्रालय का कहना है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्दावली है और इसी का इस्तेमाल किया जाए। मंत्रालय के इस फैसले का देश भर के कई दलित संगठन और बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि दलित शब्दावली का राजनीतिक महत्व है और यह पहचान का बोध कराता है। 
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इसी साल मार्च महीने में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था। मंत्रालय ने सभी राज्यों के सरकारों को निर्देश दिया था कि आधिकारिक संवाद या पत्राचार में दलित शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया जाए। 
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मंत्रालय का कहना है कि दलित शब्दावली का जिक्र संविधान में नहीं है। 

सरकार में ही मतभेद

सरकार के इस निर्देश पर केंद्र की एनडीए सरकार में ही मतभेद है। एनडीए की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता और मोदी कैबिनेट में सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले दलित के बदले अनुसूचित जाति शब्दावली के इस्तेमाल के निर्देश से खुश नहीं हैं। 
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अठावले महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन से जुड़े रहे हैं और कहा जाता है कि इसी आंदोलन के कारण दलित शब्दावली ज्यादा लोकप्रिय हुई। अठावले का कहना है कि दलित शब्दावली गर्व से जुड़ी रही है। 
वहीं सूचना प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि यह आदेश बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश पर दिया गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी मोहनलाल मनोहर नाम के एक व्यक्ति ने दलित शब्दावली के इस्तेमाल को बंद करने के लिए याचिका दायर की थी।

याचिका में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है और इसे अनुसूचित जातियों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसे लेकर कोर्ट का कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने सरकार को इस पर विचार करने के लिए कहा था। 

दलित शब्द का सामाजिक संदर्भ

यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है, ''मराठी में दलित का मतलब शोषित और अछूत से है। यह एक व्यापक शब्दावली है जिसमें वर्ग और जाति दोनों समाहित हैं। दलित शब्द का इस्तेमाल कहीं से भी अपमानजनक नहीं है। यह शब्दावली चलन में 1960 और 70 के दशक में आई। इसे साहित्य और दलित पैंथर्स आंदोलन ने आगे बढ़ाया।'' 

ब्राह्मणवाद के खिलाफ है दलित शब्दावली: कांचा इलैया

Dalit thinkers question Narendra Modi government orders of not using word 'dalit'
ambedkar jayanti - फोटो : अमर उजाला
जाने-माने दलित चिंतक कांचा इलैया सूचना प्रसारण मंत्रालय के इस आदेश की मंशा पर शक जाहिर करते हुए कहते हैं, ''दलित का मतलब उत्पीड़ित होता है। जिन्हें दबाकर रखा गया है या जिन पर जुल्म ढाया गया है, वो दलित हैं। इसकी एक सामाजिक पृष्ठभूमि है जो दलित शब्दावली में झलकती है।''

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ''दलित शब्दावली से हमें पता चलता है कि इस देश की बड़ी आबादी के हक को मारकर रखा गया है और उन पर जुल्म ढाए गए। ये आज भी अछूत हैं। दलित शब्द की जगह आप अनुसूचित जाति को लाते हैं तो यह केवल संवैधानिक स्थिति बताता है और सामाजिक, ऐतिहासिक संदर्भ को चालाकी से गोल कर देता है।'' 

'ब्राह्मणवाद के खिलाफ है दलित शब्दावली'

इलैया कहते हैं, ''दलित शब्दावली का मतलब दुनिया भर में पता है कि ऐसा देश जहां करोड़ों लोग आज भी अछूत हैं। सरकार को लगता है कि ये तो बदनामी है और इसे खत्म करने का आसान तरीका है कि शब्दावली ही बदल दो। दलित ब्राह्मणवाद के विरोध की एक शब्दावली है। यह एक बड़ा मुद्दा है। इसका समाजिक संदर्भ बहुत ही मजबूत है और शोषित तबकों को लामबंद करने का आधार है। यह पहचान मिटाने की कोशिश है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय संवाद में इस बड़े मुद्दे पर गुमराह करने जैसा है। हमलोग इसका विरोध करेंगे। इस सरकार में टर्म और शब्द बदलने का चलन बढ़ा है।''

इलैया कहते हैं, ''अगर हम किसी को दलित कहते हैं तो उसकी पहचान और सामाजिक हैसियत को इंगित करते हैं। अनुसूचित जाति का मतलब तो एक संवैधानिक स्टेटस हुआ। इसमें पहचान पूरी तरह से गायब है। दलित कहने में कुछ भी अपमानजनक नहीं है। सरकार इनकी सामाजिक पहचान को ऐसे नहीं मिटा सकती है। मुख्यधारा में शामिल करने का यह ढोंग नहीं चलेगा।'' 

'दलित शब्दावली अपमानजनक नहीं'

Dalit thinkers question Narendra Modi government orders of not using word 'dalit'
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोशल साइंस के प्रोफेसर बद्रीनारायण का मानना है कि इस फैसले से सरकार को बहुत राजनीतिक फायदा नहीं होगा। उन्होंने कहा, ''दलित शब्द का इस्तेमाल पत्रकारिता और साहित्य में लंबे समय से होता रहा है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। दलित शब्दावली का एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ है।''

भारतीय जनता पार्टी के सांसद उदित राज को भी लगता है कि दलित शब्दावली के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगनी चाहिए। उदित राज कहते हैं, ''दलित शब्द इस्तेमाल होना चाहिए क्योंकि ये देश-विदेश में ये प्रयोग में आ चुका है, सारे डॉक्युमेंट्स, लिखने-पढ़ने और किताबों में भी प्रयोग में आ चुका है। दलित शब्द द्योतक है कि लोग दबे हैं, कुचले हैं। ये शब्द संघर्ष, एकता का प्रतीक बन गया है। और जब यही सच्चाई है तो ये शब्द रहना चाहिए।''

वो कहते हैं, ''अगर यही दलित शब्द ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल किया जाता तो सम्मानित हो जाता। शब्दों से कुछ नहीं होता। ये शब्द गाली बिल्कुल नहीं है। अगर कोई शब्द (दलित की जगह) प्रयोग में आ जाएगा तो उसे गाली ही माना जाएगा। ये पिछड़े हैं, हजारों वर्ष से शोषित हैं। अगर इतिहास ठीक से पढ़ाया जाएगा तभी सवर्णों में संतोष होगा कि इन्हें आरक्षण देना उचित है। अगर दलितों को ब्राह्मण कह दिया जाएगा तो वो शब्द भी अपमानित मान लिया जाएगा। जब चमार को चोहड़ा कहा जाता था तो एतराज था। अब चोहड़ा से वाल्मीकि हो गया तो सम्मान बढ़ गया? कुछ नहीं बढ़ा। इतिहास को पढ़ाकर और सच्चाई को बताकर ही आगे बढ़ा जा सकता है।''

भारतीय समाज में जिनसे लोग छुआछूत करते थे गांधी ने उन्हें हरिजन कहना शुरू किया था जबकि बाबा साहेब आंबेडकर उन्हें दबाया हुआ तबका कहते था। आजाद भारत में हरिजन टर्म को लेकर काफी विवाद हुआ और फिर इसके इस्तेमाल से लोग बचने लगे और अब यह मीडिया में इस्तेमाल के चलन से बाहर है।

मंत्रालय के इस आदेश को लोग सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में हैं। कांचा इलैया ने भी बीबीसी से कहा कि वो इसे चुनौती देंगे।

बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले पंकज मेश्राम ने बीबीसी मराठी से कहा, ''मैंने याचिका इसलिए दायर की क्योंकि दलित अपमानजनक शब्द है। मैंने दलित शब्द का अर्थ खोजने की कोशिश की तो पता चला कि इसका मतलब अछूत, असहाय और नीचा होता है। यह उस समुदाय के लिए अपमानजनक है। डॉ बाबासाहेब आंबेडकर भी इस शब्द के पक्ष में नहीं थे। दलित शब्द का इस्तेमाल संविधान में कहीं नहीं किया गया है। अगर संविधान में इस समुदाय के लिए अनुसूचित जाति टर्म का इस्तेमाल किया गया है तो फिर दलित क्यों कहा जा रहा है?'' 
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