सोशल मीडिया में अपनी बात रखने वाले CRPF के 12 अफसरों पर कार्रवाई, प्रमोशन न मिलने से हैं नाराज
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सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद केंद्र सरकार कॉडर अफसरों को इनका हक नहीं दे रही है। प्रमोशन के स्तर पर ये अधिकारी 15 साल पीछे चल रहे हैं। कॉडर अफसरों को अपनी बात रखने के लिए आगे नहीं आने दिया जाता। इस मामले में बातचीत के लिए जब बुलाया जाता है, तो वहां गृह मंत्रालय यह शर्त रख देता है कि बैठक में एडीजी रैंक से नीचे के अधिकारी न हों।
क्या है 'आईपीएस बनाम कॉडर अफसर' विवाद
विभिन्न अर्धसैनिक बलों के करीब दस हजार कॉडर अफसर अपने प्रमोशन को लेकर परेशान हैं। इनमें सहायक कमांडेंट से लेकर आईजी रैंक तक के अधिकारी शामिल हैं। जिस तरह से केंद्र सरकार की दूसरी संगठित सेवाओं में एक तय समय के बाद रैंक या फिर उसके समकक्ष वेतन मिलता है, वैसा सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों को नहीं मिल पा रहा है। करीब बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन कॉडर अफसर उस वक्त कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। कॉडर अफसर 33 साल की नौकरी के बाद बड़ी मुश्किल से आईजी बनता है।
डीओपीटी ने दिया था आदेश
डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों में ओजीएएस यानी 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। अभी तक सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और दूसरी कई सेवाओं में सर्विस रूल्स नहीं बनाए गए हैं। इतना ही नहीं, इन कॉडर अधिकारियों को समय पर गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) और गैर-कार्यात्मक चयन ग्रेड (एनएफएसयू) का लाभ मिल जाए, इसके लिए आरआर यानी रिक्रूटमेंट रूल में भी संशोधन नहीं किया गया। इस वजह से आज बहुत से कॉडर अधिकारी परमोशन और आर्थिक फायदों से वंचित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना
सीआरपीएफ के रिटायर्ड आईजी वीपीएस पवार और एसएस संधू जैसे कई अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2019 में कॉडर अफसरों के पक्ष में फैसला सुनाया था। अब साल बीतने वाला है, लेकिन फैसला अभी तक लागू नहीं हुआ। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पहले 31 जुलाई तक का समय मांगा था। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर कि इस मामले में काम हो रहा है, 30 सितंबर तक का वक्त ले लिया। इसके बावजूद कॉडर अफसरों को कुछ नहीं मिला।
पता चला कि सरकार ने फिर से अदालत से 30 नवंबर का वक्त मांगा लेकिन वह तारीख भी निकल गई। सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि हमने अधिकांश काम पूरा कर लिया है। चूंकि यह जटिल मामला है, हर अफसर का अलग से रिकॉर्ड चेक हो रहा है, इसलिए कहीं कोई चूक न हो, 31 मार्च 2020 तक का समय दे दिया जाए।

सरकार पर आईपीएस लॉबी का दबाव
रिटायर्ड अफसरों का कहना है कि सरकार आईपीएस लॉबी के दबाव में है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने में टालमटोल हो रहा है। जो अफसर सोशल मीडिया में अपनी बात रख रहा है, उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है। एक तरफ सरकार कुछ देने की बात कहती है, तो दूसरी ओर युवा अफसरों को परेशान करने के लिए उनके खिलाफ rule of 9 CCS (conduct) Rules 1964 and GOI decision no. 26 below Rule 3 C of CCS (conduct) Rules 1964. का उल्लंघन बता कर कार्रवाई कर रही है।
नए सर्विस रूल्स बनाने की बात
विभिन्न अर्धसैनिक बलों में तैनात हजारों कॉडर अफसर वेतन विसंगतियां खत्म कराने और समय पर पदोन्नति के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके पक्ष में फैसला दे दिया है। अदालत के फैसले से हरकत में आई केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले ही यह घोषणा कर दी कि इन अधिकारियों को संगठित कॉडर के सभी फायदे मिलेंगे। यानी अब इन अफसरों को एनएफएफयू और एनएफएसयू का लाभ मिल जाएगा।
सरकार ने इन्हें संगठित कॉडर सेवा के सभी फायदे देने की घोषणा तो कर दी, लेकिन उसके लिए डीओपीटी के आदेशों का पालन नहीं किया गया। डीओपीटी ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के कॉडर अफसरों के लिए नए सर्विस रूल बनाने की बात कही थी। केंद्र सरकार ने इस दिशा में कोई काम ही नहीं किया।
सरकार ने खेला खेल!
कॉडर अफसरों का कहना है कि जब तक पुराने भर्ती नियमों में संशोधन नहीं हो जाता और नए सर्विस नियम नहीं बन जाते, तब तक केंद्र सरकार की घोषणा बेमानी है। ऐसे हालात में तो केवल 20 फीसदी अफसरों को ही लाभ मिल पाएगा। इस बाबत 10 दिसंबर को अदालत में सुनवाई है। गृह मंत्रालय ने आदेश दिया कि उक्त डेट से पहले सीआरपीएफ के अफसर एडीशनल सॉलिसटर जनरल के पास जाकर अपनी बात कह सकते हैं।
खास बात है कि यहां पर भी एक शर्त लगा दी गई, गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा कि एएसजी की बैठक में एडीजी रैंक से नीचे का अधिकारी न हो। वीपीएस पवार के अनुसार, यह तो ज्यादती है। सभी अर्धसैनिक बलों को मिलाएं तो दर्जनभर कॉडर अफसर भी एडीजी के पद तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में एएसजी के पास इन कॉडर अफसरों का पक्ष कौन रखेगा। मतलब आईपीएस अधिकारी ही जाएंगे। इससे तो यह मामला लटका ही रहेगा।
कोई समय सीमा तय नहीं है
केंद्र सरकार की 55 संगठित कॉडर वाली नौकरियों में अधिकतम बीस साल बाद सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड मिलता है। यानी कि बीस साल की नौकरी के बाद आईएएस जेएस रैंक पर और आईपीएस आईजी के पद पर चला जाता है। चूंकि ये कॉडर सर्विस हैं, इसलिए इनमें टाइम बाउंड प्रमोशन यानी एक तय समय के बाद पदोन्नति मिल जाती है। खास बात है कि इन सेवाओं में रिक्त स्थान नहीं देखा जाता। जगह खाली हो या न हो, मगर तय समय पर प्रमोशन मिल जाती है।
दूसरी ओर, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में परमोशन उसी वक्त होता है, जब सीट खाली होती है। यदि किसी फोर्स में एक साथ कई बटालियनों का गठन होता है तो ही परमोशन की कुछ संभावना बनती है। इसे नॉन प्लान ग्रोथ कहा जाता है। डीओपीटी ने इस बाबत भी दिशा निर्देश जारी कर कहा था कि किसी भी फोर्स में नॉन प्लान ग्रोथ नहीं होगी। जो भर्ती होगी, वह योजनाबद्ध तरीके से ही की जाएगी। 2001 और 2010 में भर्ती नियमों को बदला गया, लेकिन उनमें इतनी ज्यादा विसंगतियां थी कि उससे अफसरों को फायदा होने की बजाए नुकसान हो गया। केंद्र सरकार अब जो फायदा देने की बात कह रही है, वह पुराने भर्ती नियमों पर आधारित है।
अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान समय में जो भर्ती नियम हैं, वे ओजीएएस और एनएफएफयू की मूल भावना को लागू नहीं होने देंगे। अगर सरकार नए सर्विस रूल फ्रेम किए बिना एनएफएफयू देती है तो उसका फायदा सभी को नहीं मिलेगा। अस्सी फीसदी कॉडर अफसर इससे वंचित रह जाएंगे।
अपनी मर्जी से नहीं कर सकते कोर्स
कॉडर अधिकारियों का कहना है कि अब सरकार ने एनएफएफयू देने के लिए कई तरह की शर्तें लगा दी हैं। इनमें प्रमोशन कोर्स, वह पद पहले ग्रहण किया हो, मेडिकल फिटनेस, किसी मामले की जांच लंबित न हो यानी विजिलेंस क्लीयरेंस, फील्ड सर्विस, लीव रिजर्व, ट्रेनिंग रिजर्व और डेपुटेशन रिजर्व जैसी कई शर्तें शामिल हैं। छह दिन का प्रमोशन कोर्स अहम माना जाता है। खास बात है कि ये कोर्स अधिकारी अपनी मनमर्जी से नहीं कर सकता। इसके लिए तो विभाग ही उसे कोर्स पर भेजता है। सीआरपीएफ की बात करें तो 90 फीसदी अधिकारियों को प्रमोशन कोर्स नहीं कराया गया है। अब 40-40 के बैच में डीआईजी को माउंट आबू स्थित संस्थान में कोर्स पर भेजा जा रहा है।
इस बारे में अधिकारियों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें उक्त शर्तों से वन टाइम छूट प्रदान की जाए। फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में माना था कि सीएपीएफ के ग्रुप-ए के अधिकारियों को छठे वेतन आयोग के संदर्भ में 2006 से एनएफएफयू सहित सभी लाभ दिए जाने चाहिएं।शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट के दो फैसलों को सही ठहराया था, जिनमें इन बलों को ‘संगठित सेवा’ का दर्जा दिया गया था।