पदोन्नति मामला: कोर्ट के जुर्माना लगाने के बाद एक्शन में आए CRPF डीजी, कैडर अफसरों को अपने जवाब से दिया 'झटका'
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 'सीआरपीएफ' डीजी कुलदीप सिंह पर 20 हजार रुपये का अर्थ दंड लगाते ही बल प्रमुख एक्शन में आ गए हैं। कुलदीप सिंह ने डिप्टी कमांडेंट रणजीत कुमार सिंह और बीस अन्य याचिकाकर्ताओं को उनके प्रतिवेदन का जवाब दे दिया है। डीजी का यह जवाब, बल के उन एग्जीक्यूटिव कैडर अफसरों के लिए एक झटका माना जा रहा है, जो लंबे समय से पदोन्नति में अपने साथ हो रहे भेदभाव को लेकर आवाज उठा रहे हैं। इससे पहले, केस की सुनवाई की तिथि यानी 24 नवंबर नजदीक आए, डीजी ने याचिकाकर्ताओं का प्रतिवेदन खारिज कर दिया है। इसमें कहा गया है कि बल के मेडिकल अफसरों का जीडी कैडर के अधिकारियों से कोई लिंक नहीं है।
मेडिकल अफसर प्रमोशन बैज लगाते रहेंगे
जैसे ही मेडिकल अफसर को प्रमोशन मिलेगा, वह उसके मुताबिक अपने कंधे पर बैज रैंक लगा सकता है। एग्जीक्यूटिव कैडर के अधिकारी और मेडिकल अफसर, इन दोनों की भर्ती, सेवा शर्तें, कार्यक्षेत्र व पदोन्नति के नियम अलग हैं, इसलिए उस बात को नहीं माना जा सकता कि एक ही वर्ष में भर्ती हुए मेडिकल अफसरों को बैज रैंक लगाने की इजाजत उस वक्त तक नहीं दी जाएगी, जब तक जीडी कैडर वाला अधिकारी वहां तक न पहुंच जाए। बल के डॉक्टरों को समयबद्ध पदोन्नति मिलती है।
गृह मंत्रालय ने जून 2010 में दिया था आदेश
बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 10 जून 2010 को सीआरपीएफ के डॉक्टरों को पदोन्नति मिलने पर बैज रैंक लगाने का आदेश जारी किया था। डिप्टी कमांडेंट रणजीत कुमार सिंह व 20 अन्य कैडर अफसरों ने 28 मार्च 2020 को डीजी को प्रतिवेदन दिया था। इसमें गृह मंत्रालय के 2010 में जारी आदेश को चुनौती दी गई थी। कैडर अधिकारियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका लगाई। इसमें यह मांग की गई कि 2010 का गृह मंत्रालय का आदेश और सीआरपीएफ के मेडिकल निदेशालय द्वारा 12 फरवरी 2019 को जारी सिग्नल को निरस्त किया जाए। इन दोनों आदेशों में मेडिकल अफसर को उसके वेतन की श्रेणी के साथ ही बैज रैंक लगाने की इजाजत देने की बात कही गई थी। सीआरपीएफ में हर तरह का जोखिम उठाने वाले एग्जीक्यूटिव कैडर के अधिकारी परमोशन में पिछड़ रहे हैं।
कई केसों में यह देखने को मिलता है कि तीन-चार साल बाद सेवा में आने वाले डॉक्टर, जीडी कैडर के अधिकारियों से आगे निकल गए हैं। 2014 में बतौर एमओ यानी मेडिकल अफसर ज्वाइन करने वाले अब एसएमओ बन चुके हैं। वे डिप्टी कमांडेंट का रैंक लगाते हैं। दूसरी तरफ एग्जीक्यूटिव कैडर में 2010 में सहायक कमांडेंट भर्ती हुए अधिकारी अब डॉक्टर के सामने जूनियर बन गए हैं। 2010 में एग्जीक्यूटिव कैडर में आए अफसरों को तो अभी पहला प्रमोशन तक नहीं मिला है। कुछ समय बाद ये एसएमओ, सीएमओ बन जाएंगे। इस तरह से उनके बीच पदोन्नति का अंतर बढ़ता जाएगा।
'मेडिकल अफसर कैडर' नियम 1996
दिल्ली हाईकोर्ट ने नौ जून 2021 को यह कहते हुए इस केस को खत्म कर दिया था कि 12 सप्ताह में इस बाबत एक 'स्पीकिंग ऑर्डर' निकाला जाए। डीजी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया। नतीजा, हाईकोर्ट ने उन पर जुर्माना लगा दिया। गृह मंत्रालय ने 10 जून 2010 को अपने आदेश में कहा था कि सीआरपीएफ सहित सीएपीएफ के डॉक्टर यानी मेडिकल अफसर की तुलना एग्जीक्यूटिव कैडर के अधिकारियों से न की जाए। मेडिकल अफसर अपने वेतनमान के आधार पर बैज रैंक लगा सकते हैं। खास बात ये है कि इससे पहले सीआरपीएफ के 'मेडिकल अफसर भर्ती' नियम 1996 में कहा गया था कि यदि मेडिकल अफसर और एग्जीक्यूटिव कैडर अधिकारी यदि उसी साल में भर्ती हुए हैं, तो मेडिकल अफसर तब तक बैज रैंक नहीं लगाएगा, जब तक एग्जीक्यूटिव कैडर का अधिकारी वहां तक नहीं पहुंच जाता। याचिकाकर्ता रणजीत सिंह व अन्य का कहना था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय का 2010 का आदेश, जो कि सीआरपीएफ के 'मेडिकल अफसर भर्ती' नियम 1996 के विपरित है, उसे रद्द किया जाए।
गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय के उलझन भरे आदेश
इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय और सीआरपीएफ के आदेश उलझन भरे रहे हैं। भले ही 2010 और 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने डॉक्टरों के पक्ष में आदेश दिया है, लेकिन 1999 के आदेश में कुछ और बात कही गई थी। 22 सितंबर 1999 को गृह मंत्रालय की तरफ से आदेश आया था कि मेडिकल अफसर को समयबद्ध प्रमोशन मिलेगा, लेकिन वह रैंक तभी लगाएगा, जब जीडी कैडर का अधिकारी, जो मेडिकल अधिकारी वाले साल में ही भर्ती हुआ है, उस पद तक न पहुंच जाए। इससे पहले सीआरपीएफ के 'मेडिकल अफसर भर्ती' नियम 1996 में दूसरी बात कही गई थी। साल 2010 में कहा गया कि मेडिकल अफसर को पहले प्रमोशन मिलता है तो वह रैंक लगा सकता है। उसे जीडी कैडर के अधिकारी का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। अब डीजी कुलदीप सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के 2010 और 2019 के आदेशों को आधार बनाकर रणजीत कुमार सिंह का प्रतिवेदन खारिज कर दिया है। उन्होंने अपने आदेशों में कहा है कि मेडिकल अफसर का जीडी कैडर से कोई लिंक नहीं है। जैसे ही मेडिकल अफसर को परमोशन मिलेगी, वह रैंक के अनुसार अपने कंधे पर बैज लगा सकते हैं।
डीजी कुलदीप सिंह ने अपने आदेशों में क्या कहा है.
इस प्रतिवेदन को खारिज करते हुए डीजी ने लिखा, दोनों श्रेणी के पदों की योग्यताएं और भर्ती के नियम अलग हैं। कार्यक्षेत्र भी समान नहीं हैं। मेडिकल अफसर को वैकेंसी बेस्ड प्रमोशन नहीं, बल्कि समयबद्ध प्रमोशन मिलता है। इस बाबत समय-समय पर जारी आदेशों का हवाला दिया गया है। डेंटिस्ट के पदों पर भर्ती के नियम, डॉक्टरों के लिए सीजीएचएस के प्रावधान, स्वास्थ्य मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के दिशानिर्देशों को ध्यान में रखकर डीजी ने उक्त प्रतिवेदन को खारिज किया है। कमांडेंट ही बटालियन को लीड करता है। प्रशासनिक मामलों में अस्पताल इंचार्ज उन्हें रिपोर्ट करते रहेंगे। ऐसे में याचिकाकर्ता के क्लेम का कोई आधार नहीं है। साल 2002 में डीएसीपी यानी डायनेमिक एर्सोड कैरियर प्रोग्रेशन स्कीम लागू की गई थी। डॉक्टरों को समयबद्ध प्रमोशन देने के लिए यह भी एक बड़ा आधार रहा है। मौजूदा समय में सभी बलों में जीडीएमओ भर्ती के सामान्य नियम बन रहे हैं। इन सबके मद्देनजर मैरिट आधार पर रणजीत सिंह का प्रतिवेदन खारिज किया जाता है।