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CRPF: 'कॉम्बैट सोल्जर' बनेंगे 'राजमिस्त्री'; वे जवान जिन्हें पसंद है चिनाई का काम, उन्हें दी जाएगी ट्रेनिंग
सार
सीआरपीएफ, अभी भी उग्रवाद-नक्सल प्रभावित और चुनाव-संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात है। राजमिस्त्री के कार्य में आने से मौजूदा परिचालन संख्या पर असर पड़ेगा। प्रशिक्षण में व्यवधान की आशंका बनी रहेगी। गैर-रणनीतिक कार्य में निरंतर संलग्नता से हथियार संचालन, ड्रिल और लड़ाकू तैयारी में कौशल पर विपरित प्रभाव पड़ेगा।
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सीआरपीएफ, CRPF
- फोटो : ANI
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विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में इसी सप्ताह जारी हुआ एक अनूठा आदेश चर्चा का केंद्र बना हुआ है। बल के जवान आपस में पूछ रहे हैं कि क्या सीआरपीएफ के 'कॉम्बैट सोल्जर' अब 'राजमिस्त्री' बनेंगे। फोर्स हेडक्वार्टर की तरफ से कहा गया है कि जिन कार्मिकों को चिनाई आदि के काम में रूचि है, उनकी सूची बनाई जाए। उक्त कार्य के लिए जिन कार्मिकों का चयन होगा, उन्हें सीआरपीएफ द्वारा 'राजमिस्त्री' की ट्रेनिंग दी जाएगी।
दो दर्जन से ज्यादा बटालियनों में पहुंचा आदेश
सूत्रों के मुताबिक, सीआरपीएफ में 'पायनियर प्रशिक्षण टीम' बनाने के लिए सोनल वी. मिश्रा, आईजी महानिदेशालय की अध्यक्षता में इस सप्ताह वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई थी। मणिपुर एवं नागालैंड सेक्टर की दो दर्जन से ज्यादा बटालियनों के 'सीओ' से कहा गया है कि वे 'पायनियर ट्रेनिंग टीम' बनाएं। इसमें उन कार्मिकों का चयन करें, जो मेसन यानी 'राजमिस्त्री' के काम में रूचि रखते हों। इतना ही नहीं, आईजी द्वारा सभी कमांडेंट से कहा गया है कि ऐसे कार्मिकों को राजमिस्त्री के काम की ट्रेनिंग दिलाना भी सुनिश्चित करें।
परिचालन, कानूनी और संगठनात्मक चिंता
चर्चा है कि इस आदेश ने फोर्स में 'परिचालन, कानूनी और संगठनात्मक' बातों को लेकर चिंता पैदा कर दी है। सीआरपीएफ अधिनियम, 1949 के तहत जनरल ड्यूटी (जीडी) कार्मिकों की भर्ती, प्रशिक्षण और तैनाती संघ के सशस्त्र बल के रूप में मुख्यतः आंतरिक सुरक्षा, उग्रवाद-रोधी और कानून-व्यवस्था के कर्तव्यों के लिए की जाती है। अब उन्हें चिनाई जैसे निर्माण-संबंधी कार्य में लगाया जाएगा तो इससे बल की मूल कार्यात्मक पहचान कमजोर होगी। ऐसे में 'लड़ाकू' जवान अपने मूल कर्तव्यों के साथ न्याय कैसे कर पाएगा। हालांकि अनुशासित बलों में सीमित गैर-लड़ाकू कर्तव्य निहित हैं।
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यह भी पढ़ें - West Asia Crisis: पश्चिम एशिया संकट को लेकर ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की होगी बैठक, राजनाथ सिंह करेंगे अध्यक्षता
परिचालन तैयारी पर प्रतिकूल प्रभाव
सीआरपीएफ, अभी भी उग्रवाद-नक्सल प्रभावित और चुनाव-संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात है। राजमिस्त्री के कार्य में आने से मौजूदा परिचालन संख्या पर असर पड़ेगा। प्रशिक्षण में व्यवधान की आशंका बनी रहेगी। गैर-रणनीतिक कार्य में निरंतर संलग्नता से हथियार संचालन, ड्रिल और लड़ाकू तैयारी में कौशल पर विपरित प्रभाव पड़ेगा। कार्मिकों से परिचालन तैनाती के साथ-साथ शारीरिक निर्माण कार्य कराए जाने से उनकी दक्षता और सुरक्षा प्रभावित होगी। सीआरपीएफ के पास पहले से ही कैजुअल नॉन-परमानेंट आर्टिसन/डेली श्रम उपलब्ध है। एक जीडी जवान की राज्य पर लागत (वेतन, प्रशिक्षण, भत्ते) संविदा श्रम से काफी अधिक होती है। प्रशिक्षित लड़ाकों को कम-कुशल निर्माण कार्य में लगाने से सार्वजनिक संसाधनों का गलत आवंटन होता है। यह वित्तीय औचित्य और सरकारी जनशक्ति के कुशल उपयोग के सिद्धांतों के तहत चिंता पैदा करता है।
मनोबल पर दीर्घकालिक संस्थागत प्रभाव
बल के कार्मिक ऐसी तैनाती को लड़ाके के रूप में अपनी भूमिका का अवमूल्यन मान सकते हैं। इससे विशेषकर उच्च-जोखिम क्षेत्रों में सेवारत लोगों में व्यावसायिक विस्थापन की भावना पैदा हो सकती है। उनमें स्पष्ट स्वैच्छिकता या प्रोत्साहन संरचना के अभाव से मौन असंतोष पैदा होने की गुंजाइश बनी रहेगी। अनुशासित बलों में मनोबल एक बल-गुणक है, इस स्तर पर क्षरण के व्यापक परिचालन परिणाम होते हैं। ऐसे आदेश, मुख्यालय स्तर से आते हैं, लेकिन जवानों को लगता है कि यूनिट कमांडर उनसे यह काम करा रहा है। इससे कमांड शृंखला में विश्वास की कमी आती है। फील्ड परिस्थितियों में यह बात, सामंजस्य को कमजोर कर सकती है। इस बाबत बल मुख्यालय के एक अधिकारी का कहना है कि ये व्यवस्था उन जगहों के लिए है, जहां पर निर्माण कार्य के लिए ट्रेंड मिस्त्री नहीं मिलते। पहाड़ों पर फोर्स के लिए पक्के निर्माण की आवश्यकता होती है। बल में अगर कोई कार्मिक रूचि दिखाता है तो उसे ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे किसी जवान के मनोबल में कमी नहीं आएगी।
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दो दर्जन से ज्यादा बटालियनों में पहुंचा आदेश
सूत्रों के मुताबिक, सीआरपीएफ में 'पायनियर प्रशिक्षण टीम' बनाने के लिए सोनल वी. मिश्रा, आईजी महानिदेशालय की अध्यक्षता में इस सप्ताह वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई थी। मणिपुर एवं नागालैंड सेक्टर की दो दर्जन से ज्यादा बटालियनों के 'सीओ' से कहा गया है कि वे 'पायनियर ट्रेनिंग टीम' बनाएं। इसमें उन कार्मिकों का चयन करें, जो मेसन यानी 'राजमिस्त्री' के काम में रूचि रखते हों। इतना ही नहीं, आईजी द्वारा सभी कमांडेंट से कहा गया है कि ऐसे कार्मिकों को राजमिस्त्री के काम की ट्रेनिंग दिलाना भी सुनिश्चित करें।
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परिचालन, कानूनी और संगठनात्मक चिंता
चर्चा है कि इस आदेश ने फोर्स में 'परिचालन, कानूनी और संगठनात्मक' बातों को लेकर चिंता पैदा कर दी है। सीआरपीएफ अधिनियम, 1949 के तहत जनरल ड्यूटी (जीडी) कार्मिकों की भर्ती, प्रशिक्षण और तैनाती संघ के सशस्त्र बल के रूप में मुख्यतः आंतरिक सुरक्षा, उग्रवाद-रोधी और कानून-व्यवस्था के कर्तव्यों के लिए की जाती है। अब उन्हें चिनाई जैसे निर्माण-संबंधी कार्य में लगाया जाएगा तो इससे बल की मूल कार्यात्मक पहचान कमजोर होगी। ऐसे में 'लड़ाकू' जवान अपने मूल कर्तव्यों के साथ न्याय कैसे कर पाएगा। हालांकि अनुशासित बलों में सीमित गैर-लड़ाकू कर्तव्य निहित हैं।
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परिचालन तैयारी पर प्रतिकूल प्रभाव
सीआरपीएफ, अभी भी उग्रवाद-नक्सल प्रभावित और चुनाव-संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात है। राजमिस्त्री के कार्य में आने से मौजूदा परिचालन संख्या पर असर पड़ेगा। प्रशिक्षण में व्यवधान की आशंका बनी रहेगी। गैर-रणनीतिक कार्य में निरंतर संलग्नता से हथियार संचालन, ड्रिल और लड़ाकू तैयारी में कौशल पर विपरित प्रभाव पड़ेगा। कार्मिकों से परिचालन तैनाती के साथ-साथ शारीरिक निर्माण कार्य कराए जाने से उनकी दक्षता और सुरक्षा प्रभावित होगी। सीआरपीएफ के पास पहले से ही कैजुअल नॉन-परमानेंट आर्टिसन/डेली श्रम उपलब्ध है। एक जीडी जवान की राज्य पर लागत (वेतन, प्रशिक्षण, भत्ते) संविदा श्रम से काफी अधिक होती है। प्रशिक्षित लड़ाकों को कम-कुशल निर्माण कार्य में लगाने से सार्वजनिक संसाधनों का गलत आवंटन होता है। यह वित्तीय औचित्य और सरकारी जनशक्ति के कुशल उपयोग के सिद्धांतों के तहत चिंता पैदा करता है।
मनोबल पर दीर्घकालिक संस्थागत प्रभाव
बल के कार्मिक ऐसी तैनाती को लड़ाके के रूप में अपनी भूमिका का अवमूल्यन मान सकते हैं। इससे विशेषकर उच्च-जोखिम क्षेत्रों में सेवारत लोगों में व्यावसायिक विस्थापन की भावना पैदा हो सकती है। उनमें स्पष्ट स्वैच्छिकता या प्रोत्साहन संरचना के अभाव से मौन असंतोष पैदा होने की गुंजाइश बनी रहेगी। अनुशासित बलों में मनोबल एक बल-गुणक है, इस स्तर पर क्षरण के व्यापक परिचालन परिणाम होते हैं। ऐसे आदेश, मुख्यालय स्तर से आते हैं, लेकिन जवानों को लगता है कि यूनिट कमांडर उनसे यह काम करा रहा है। इससे कमांड शृंखला में विश्वास की कमी आती है। फील्ड परिस्थितियों में यह बात, सामंजस्य को कमजोर कर सकती है। इस बाबत बल मुख्यालय के एक अधिकारी का कहना है कि ये व्यवस्था उन जगहों के लिए है, जहां पर निर्माण कार्य के लिए ट्रेंड मिस्त्री नहीं मिलते। पहाड़ों पर फोर्स के लिए पक्के निर्माण की आवश्यकता होती है। बल में अगर कोई कार्मिक रूचि दिखाता है तो उसे ट्रेनिंग दी जाएगी। इससे किसी जवान के मनोबल में कमी नहीं आएगी।
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