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सीआरपीएफ: 'एक शून्य जो बहुत कुछ कहता है', पीएम मोदी की इस पोस्ट के पीछे पढ़ें 'वीरता और बलिदान' की दो कहानियां
सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीआरपीएफ के उस रिकॉर्ड की सराहना की, जिसमें एक साल तक किसी जवान की ऑपरेशनल मौत नहीं हुई। 47 साल बाद यह उपलब्धि दोहराई गई है। शहीद नितिन भालेराव और अधिकारी पीआर मिश्रा की वीरता, बलिदान और नक्सल विरोधी अभियानों पर पढ़ें एक विशेष रिपोर्ट...
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सीआरपीएफ, CRPF
- फोटो : ANI
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में लिखा, 'एक शून्य जो बहुत कुछ कहता है'। यह बात देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' जवानों की वीरता को लेकर कही गई है। इसमें बल के उस रिकॉर्ड का जिक्र किया गया, जिसके तहत गत एक वर्ष में किसी भी जवान की ऑपरेशनल मौत नहीं हुई है। सीआरपीएफ के इतिहास में 47 साल बाद इस उपलब्धि को दोहराया गया है। इससे पहले जनवरी 1979 में यह रिकार्ड बना था। पीएम मोदी ने इसके लिए सीआरपीएफ जवानों के अथक प्रयासों की सराहना की है। इस उपलब्धि तक पहुंचने के लिए बल के अनेक जवानों और अफसरों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है। कुछ ने अपने शरीर के अंग खो दिए तो कई ऐसे भी जांबाज रहे, जिन्हें कई गोलियां लगी, मगर वे ठीक होकर दोबारा से नक्सलियों के साथ लोहा लेने के लिए जंगलों में उतरे।
ये हैं 'वीरता और बलिदान' की दो कहानियां
नक्सलियों के घर में घुसकर ललकारा था
कभी नक्सलियों का गढ़ रहे मिनपा में सुरक्षा बलों के लिए कैंप स्थापित करना एक बड़ी चुनौती था। उससे पहले वहां एक बड़ी मुठभेड़ हुई थी, जिसमें डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड, छत्तीसगढ़ पुलिस का विशेष एंटी-नक्सल दस्ता) के 17 जवान शहीद हुए थे। तीन नक्सली भी मारे गए थे। नक्सलियों ने इस हमले में जवानों की एके-47 स्वचालित राइफलें और वायरलैस उपकरण आदि लूट लिए थे। डीआरजी के करीब आठ हजार जवान नक्सलियों के इस गढ़ में कैंप लगाने का प्रयास कर चुके थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। दस साल से वहां कैंप स्थापित करने की कोशिशें चल रही थी। इसके बाद सीआरपीएफ की कोबरा इकाई को यहां कैंप लगाने का टॉस्क मिला। कोबरा ने नक्सलियों के इस गढ़ में भीतर घुस कर उन्हें ललकारा। नितिन पी भालेराव की टीम भी उसी ओर बढ़ रही थी। कोबरा दस्ते में कुल छह टीमें बनाई गई थीं। डी 206 से तीन टीमें 10, 11 व 12 गठित की गई, जबकि कोबरा 206ए से 1, 2 व 3 टीम बनी थी। कोबरा डी की टीमों की कमान चीता गणेश वलुंज के हाथ में थी, जबकि कोबरा 206ए टीमों की कमान पंथेर रमेश यादव को सौंपी गई। टू आईसी दिनेश कुमार सिंह इस ऑपरेशन को ओवरऑल कमांड कर रहे थे। उनके साथ असिस्टेंट कमांडेंट नितिन भालेराव भी थे।
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घायल हुए, मगर हथियार नहीं छोड़े
जिस वक्त जवानों ने आगे बढ़ना शुरू किया, उस वक्त रात थी। कोबरा दस्ते को बारूदी सुरंग का अंदाजा नहीं था। जिस जगह पर विस्फोट हुआ, वहां पहले से इस तरह की कोई संभावना नजर नहीं आई। विस्फोट के बाद दिनेश कुमार सिंह, नितिन भालेराव और सिपाही श्रीराम दूर जाकर गिरे। बारूदी सुरंग के विस्फोट में बुरी तरह से जख्मी होने के बावजूद उन्होंने अपने हथियार नहीं छोड़े। तय रणनीति के अंतर्गत विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घात लगाकर हमला बोल दिया। वे घायल जवानों के हथियार लूटने की ताक में थे। उसी के तहत नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। घायल होने के बाद भी इन तीनों ने उनकी फायरिंग का जवाब दिया। उन्हें अपने करीब नहीं आने दिया। कुछ ही देर में वहां दूसरी टीम भी पहुंच गई। उसके बाद नक्सलियों को वहां से खदेड़ दिया गया। इस हमले में नौ जवान घायल हो गए। नितिन भालेराव ने रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में दम तोड़ दिया था। तीन साल पहले भालेराव की पत्नी रश्मि का हार्ट अटैक होने से देहांत हो गया। इसके बाद परिवार में उनकी बेटी वेदांगी नितिन भालेराव बची हैं। तब वेदांगी आठ साल की थी। नितिन, सीआरपीएफ का जांबाज ग्राउंड कमांडर था। अखिल भारतीय पुलिस कमांडो मुकाबले में उसने सीआरपीएफ दल का नेतृत्व किया था। इंटरनल सिक्योरिटी अकादमी में उसे 'बेस्ट ट्रेनी इन आउटडोर सब्जेक्ट', का सम्मान मिला था।
2. पीआर मिश्रा
100 एनकाउंटर तो 500 नक्सली किए काबू
सीआरपीएफ में पीआर मिश्रा, एक ऐसे जांबाज अधिकारी रहे हैं, जिससे बड़े-बड़े नक्सली कमांडर कांप उठते थे। मिश्रा ने अपनी सेवा के दो दशक नक्सलियों के खिलाफ चले ऑपरेशनों में गुजारे। फिलहाल वे बतौर 'सेकंड इन कमांड', प्रतिनियुक्ति पर एनसीबी असम में तैनात हैं। एलडब्लूई एरिया में तैनाती के दौरान उन्होंने या उनकी टीम में लगभग पांच सौ नक्सलियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। उनके नेतृत्व में सौ से अधिक एनकाउंटर हुए हैं। पांच से पंद्रह लाख रुपये तक के इनामी कई नक्सली उन्होंने जिंदा पकड़े हैं या उन्हें मुठभेड़ में मार गिराया। 2012 में उन्हें एक नक्सली ऑपरेशन में पांच गोलियां लगी थीं। चंद महीनों में ठीक होकर वे दोबारा से नक्सलियों को ललकारने पहुंच गए। असाधारण वीरता के लिए उन्हें एक शौर्य चक्र, छह पीएमजी और एक पीपीएमजी से सम्मानित किया जा चुका है।
एक ऑपरेशन में पांच गोली लगी थी
प्रकाश मिश्रा को 2013 में शौर्य चक्र मिला था। सितम्बर 2012 में उन्हें एक ऑपरेशन में पाँच गोली लगी थी। हालाँकि इससे पहले वे अनेक दुर्दांत नक्सलियों का ख़ात्मा कर चुके थे। साल 2012 में उन्हें वीरता के लिए राष्ट्रपति के पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें जुलाई 2008 में एक ऐसे मुश्किल ऑपरेशन के लिया प्रदान किया गया था, जिसमें वे पांच जवानों को साथ लेकर 150 नक्सलियों के झुंड पर टूट पड़े थे। पहला पीएमजी इन्हें 2009 में मिला था। दूसरा 2011 में, तीसरा भी 2011 में, चौथा 2013 में, पाँचवां 2015 में और 2023 में छठा पीएमजी देने की घोषणा हुई है। 2015 में उन्होंने खूँटी (झारखंड) में एक ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों के बड़े कमांडर को मार गिराया था। 2013 में उन्होंने चतरा में नक्सलियों के रीजनल कमांडर, जिस पर सात लाख रुपये का इनाम था, को मुठभेड़ में मार दिया था। 2020 में भी प्रकाश मिश्रा ने 15 लाख रुपये के इनामी रीजनल कमांडर को मारा था।
इस ऑपरेशन के लिए मिला छठा पदक
झारखंड के धुर नक्सल प्रभावित इलाके, खूँटी जिले के कोयोंगसर और कुम्हारडीह वन क्षेत्र में 20 दिसंबर 2020 को, नक्सलियों की मौजूदगी का इनपुट मिला था। बिना किसी देरी के सीआरपीएफ की 94 बटालियन की एक टीम ने राज्य पुलिस को साथ लेकर ऑपरेशन शुरू किया। लक्षित क्षेत्र को हिट करने के लिए सीआरपीएफ की 3 स्ट्राइक टीमों का गठन किया गया था। सीआरपीएफ के ‘सेकंड-इन-कमांड’ प्रकाश रंजन मिश्रा, जिनके नाम से नक्सली थर-थर कांपते हैं, उन्होंने इस ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी सम्भाली। उनके साथ सहायक कमांडेंट प्रहलाद सहाय चौधरी भी थे। 25 जवानों के दस्ते को नक्सलियों के मुख्य क्षेत्र पर हमला करने का काम सौंपा गया था। स्ट्राइक 2 टीम को लक्षित क्षेत्र के चारों ओर कट-ऑफ लगाने का निर्देश दिया गया। स्ट्राइक 3 को एक सामरिक बिंदु पर रिजर्व में रखा गया था।
सिविल ट्रक में सवार हुआ था यह दस्ता
सीआरपीएफ की 94 वीं बटालियन के हेडक्वॉर्टर में इस ऑपरेशन को लेकर विस्तृत ब्रीफिंग हुई। 20 दिसंबर 2020 को घने अंधेरे में रात सवा आठ बजे तीनों टीमें एक सिविल ट्रक में सवार हो गई। तय स्थल पर ट्रक से उतरने के बाद दो स्ट्राइक टीमें, घने अंधेरे में पैदल आगे बढ़ीं। वह क्षेत्र पहाड़ियों, घनी वनस्पतियों, गहरे नालों और फिसलन वाली चट्टानों से भरा हुआ था। इन सभी बाधाओं से जूझते हुए दोनों स्ट्राइक टीम, सुबह होने से पहले ही अपने लक्ष्य बिंदुओं के समीप पहुंच गई थीं। प्रकाश रंजन मिश्रा, टूआईसी, जिनका नक्सल क्षेत्रों में जबरदस्त इंटेलिजेंस नेटवर्क है, वे अतिरिक्त अपडेट प्राप्त करने के लिए, विभाग की खुफिया टीम के साथ लगातार संपर्क में थे। गहरे जंगल में जब वे अपने लक्ष्य के निकट पहुँचे तो उन्हें कोयोंगसर वन क्षेत्र में नक्सलियों के मौजूद होने की पुष्टि हुई। स्ट्राइक वन टीम अपने लक्ष्य क्षेत्र की ओर बढ़ी। स्ट्राइक 2 टीम को कुम्हारडीह के पास कट ऑफ करने के लिए आगे बढ़ाया गया।
सामरिक रूप से लाभप्रद स्थिति में थे नक्सली
नक्सली ऊंचाई पर थे और वे एक गहरे नाले के किनारे पर छिपे थे। जवानों को उन तक पहुँचने के लिए नाला पार करना था। यह एक जोखिम भरा टास्क था। चूँकि नक्सली सामरिक रूप से लाभप्रद स्थिति में थे, इसलिए सीआरपीएफ टीम को बहुत संभलकर आगे बढ़ना था। तमाम बाधाओं के बावजूद, स्ट्राइक वन टीम के कमांडर ने यहाँ पर डटे रहने का फैसला किया। इलाके में चारों तरफ से घेरा डालने, सर्च ऑपरेशन और आपसी सहयोग बढ़ाने के मकसद से प्रकाश रंजन मिश्रा ने स्ट्राइक वन टीम को 3 उप-टीमों में विभाजित कर दिया। एक उप-टीम ने बाएं फ्लैंक से, दूसरी ने दाएं फ्लैंक से चलना शुरू किया। तीसरी उप-टीम में सिपाही राजू कुमार,योगेंद्र कुमार, एसी प्रहलाद सहाय चौधरी और टू-आईसी पीआर मिश्रा और सिपाही सुशील कुमार चेची, सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़े चले।
नक्सलियों ने जब जवानों पर फायरिंग की
जब यह दस्ता शीर्ष पर पहुंचने वाला था तो उन्होंने कुछ दूरी पर चट्टानों के पीछे हलचल देखी। पार्टी कमांडर को तुरंत यह सूचना दी गई। इसके बाद टीम ने दबे कदमों से संदिग्ध गतिविधि की ओर बढ़ना शुरू किया। जब वे अपने लक्ष्य से 10-15 गज की दूरी पर थे तो नक्सलियों ने जवानों पर फायरिंग शुरू कर दी। भारी जोखिम के बावजूद, सीआरपीएफ टीम पूरे जोश के साथ वहीं पर डटी रही। जवानों ने जवाबी कार्रवाई की। नक्सलियों से जीवन के लिए अत्यधिक खतरे और लगातार गोलाबारी के बीच, प्रकाश रंजन मिश्रा और प्रहलाद सहाय चौधरी अपने मुट्ठी भर जवानों के साथ नक्सलियों की ओर रेंगते हुए चलने लगे। थोड़ी देर बाद इन दोनों कमांडरों ने सिपाही राजू कुमार,योगेंद्र कुमार और सुशील कुमार चेची के साथ नक्सलियों पर सामने से हमला कर दिया।
तब नक्सलियों के पांव उखड़ने लगे थे
करीब 40-45 मिनट तक दोनों पक्षों के बीच जमकर गोलीबारी हुई। सीआरपीएफ टीम ने जिस रणनीति के साथ हमला बोला, उससे नक्सलियों के पाँव उखड़ गए। वे अपना अहम ठिकाना छोड़कर पीछे भागने के लिए मजबूर हो गए। बल के योद्धाओं की सामरिक रणनीति, नक्सलियों को समझ नहीं आई। वे सामरिक फायदे वाली स्थिति में होने के बावजूद सीआरपीएफ के हमले से बच नहीं पाए। मुठभेड़ के बाद जब आसपास के क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ तो वहाँ एक कट्टर नक्सली, जिदान गुरिया का शव, एक एके 47 राइफल, मैगजीन और गोला-बारूद बरामद किया गया। मारा गया नक्सली पीएलएफआई की क्षेत्रीय समिति का सदस्य था। उस पर 15 लाख रुपये का इनाम था। उसके खिलाफ झारखंड के अलग-अलग थानों में 152 मामले दर्ज थे। वह पिछले 20 वर्षों से राज्य के लिए एक अभिशाप बना हुआ था। वह अनेक मुठभेड़ों और सीआरपीएफ व पुलिस के खिलाफ आईईडी हमलों के कई मामलों में वांछित था।
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ये हैं 'वीरता और बलिदान' की दो कहानियां
- शहीद नितिन पी भालेराव
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नक्सलियों के घर में घुसकर ललकारा था
कभी नक्सलियों का गढ़ रहे मिनपा में सुरक्षा बलों के लिए कैंप स्थापित करना एक बड़ी चुनौती था। उससे पहले वहां एक बड़ी मुठभेड़ हुई थी, जिसमें डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड, छत्तीसगढ़ पुलिस का विशेष एंटी-नक्सल दस्ता) के 17 जवान शहीद हुए थे। तीन नक्सली भी मारे गए थे। नक्सलियों ने इस हमले में जवानों की एके-47 स्वचालित राइफलें और वायरलैस उपकरण आदि लूट लिए थे। डीआरजी के करीब आठ हजार जवान नक्सलियों के इस गढ़ में कैंप लगाने का प्रयास कर चुके थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। दस साल से वहां कैंप स्थापित करने की कोशिशें चल रही थी। इसके बाद सीआरपीएफ की कोबरा इकाई को यहां कैंप लगाने का टॉस्क मिला। कोबरा ने नक्सलियों के इस गढ़ में भीतर घुस कर उन्हें ललकारा। नितिन पी भालेराव की टीम भी उसी ओर बढ़ रही थी। कोबरा दस्ते में कुल छह टीमें बनाई गई थीं। डी 206 से तीन टीमें 10, 11 व 12 गठित की गई, जबकि कोबरा 206ए से 1, 2 व 3 टीम बनी थी। कोबरा डी की टीमों की कमान चीता गणेश वलुंज के हाथ में थी, जबकि कोबरा 206ए टीमों की कमान पंथेर रमेश यादव को सौंपी गई। टू आईसी दिनेश कुमार सिंह इस ऑपरेशन को ओवरऑल कमांड कर रहे थे। उनके साथ असिस्टेंट कमांडेंट नितिन भालेराव भी थे।
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घायल हुए, मगर हथियार नहीं छोड़े
जिस वक्त जवानों ने आगे बढ़ना शुरू किया, उस वक्त रात थी। कोबरा दस्ते को बारूदी सुरंग का अंदाजा नहीं था। जिस जगह पर विस्फोट हुआ, वहां पहले से इस तरह की कोई संभावना नजर नहीं आई। विस्फोट के बाद दिनेश कुमार सिंह, नितिन भालेराव और सिपाही श्रीराम दूर जाकर गिरे। बारूदी सुरंग के विस्फोट में बुरी तरह से जख्मी होने के बावजूद उन्होंने अपने हथियार नहीं छोड़े। तय रणनीति के अंतर्गत विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घात लगाकर हमला बोल दिया। वे घायल जवानों के हथियार लूटने की ताक में थे। उसी के तहत नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। घायल होने के बाद भी इन तीनों ने उनकी फायरिंग का जवाब दिया। उन्हें अपने करीब नहीं आने दिया। कुछ ही देर में वहां दूसरी टीम भी पहुंच गई। उसके बाद नक्सलियों को वहां से खदेड़ दिया गया। इस हमले में नौ जवान घायल हो गए। नितिन भालेराव ने रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में दम तोड़ दिया था। तीन साल पहले भालेराव की पत्नी रश्मि का हार्ट अटैक होने से देहांत हो गया। इसके बाद परिवार में उनकी बेटी वेदांगी नितिन भालेराव बची हैं। तब वेदांगी आठ साल की थी। नितिन, सीआरपीएफ का जांबाज ग्राउंड कमांडर था। अखिल भारतीय पुलिस कमांडो मुकाबले में उसने सीआरपीएफ दल का नेतृत्व किया था। इंटरनल सिक्योरिटी अकादमी में उसे 'बेस्ट ट्रेनी इन आउटडोर सब्जेक्ट', का सम्मान मिला था।
2. पीआर मिश्रा
100 एनकाउंटर तो 500 नक्सली किए काबू
सीआरपीएफ में पीआर मिश्रा, एक ऐसे जांबाज अधिकारी रहे हैं, जिससे बड़े-बड़े नक्सली कमांडर कांप उठते थे। मिश्रा ने अपनी सेवा के दो दशक नक्सलियों के खिलाफ चले ऑपरेशनों में गुजारे। फिलहाल वे बतौर 'सेकंड इन कमांड', प्रतिनियुक्ति पर एनसीबी असम में तैनात हैं। एलडब्लूई एरिया में तैनाती के दौरान उन्होंने या उनकी टीम में लगभग पांच सौ नक्सलियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। उनके नेतृत्व में सौ से अधिक एनकाउंटर हुए हैं। पांच से पंद्रह लाख रुपये तक के इनामी कई नक्सली उन्होंने जिंदा पकड़े हैं या उन्हें मुठभेड़ में मार गिराया। 2012 में उन्हें एक नक्सली ऑपरेशन में पांच गोलियां लगी थीं। चंद महीनों में ठीक होकर वे दोबारा से नक्सलियों को ललकारने पहुंच गए। असाधारण वीरता के लिए उन्हें एक शौर्य चक्र, छह पीएमजी और एक पीपीएमजी से सम्मानित किया जा चुका है।
एक ऑपरेशन में पांच गोली लगी थी
प्रकाश मिश्रा को 2013 में शौर्य चक्र मिला था। सितम्बर 2012 में उन्हें एक ऑपरेशन में पाँच गोली लगी थी। हालाँकि इससे पहले वे अनेक दुर्दांत नक्सलियों का ख़ात्मा कर चुके थे। साल 2012 में उन्हें वीरता के लिए राष्ट्रपति के पुलिस पदक से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें जुलाई 2008 में एक ऐसे मुश्किल ऑपरेशन के लिया प्रदान किया गया था, जिसमें वे पांच जवानों को साथ लेकर 150 नक्सलियों के झुंड पर टूट पड़े थे। पहला पीएमजी इन्हें 2009 में मिला था। दूसरा 2011 में, तीसरा भी 2011 में, चौथा 2013 में, पाँचवां 2015 में और 2023 में छठा पीएमजी देने की घोषणा हुई है। 2015 में उन्होंने खूँटी (झारखंड) में एक ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों के बड़े कमांडर को मार गिराया था। 2013 में उन्होंने चतरा में नक्सलियों के रीजनल कमांडर, जिस पर सात लाख रुपये का इनाम था, को मुठभेड़ में मार दिया था। 2020 में भी प्रकाश मिश्रा ने 15 लाख रुपये के इनामी रीजनल कमांडर को मारा था।
इस ऑपरेशन के लिए मिला छठा पदक
झारखंड के धुर नक्सल प्रभावित इलाके, खूँटी जिले के कोयोंगसर और कुम्हारडीह वन क्षेत्र में 20 दिसंबर 2020 को, नक्सलियों की मौजूदगी का इनपुट मिला था। बिना किसी देरी के सीआरपीएफ की 94 बटालियन की एक टीम ने राज्य पुलिस को साथ लेकर ऑपरेशन शुरू किया। लक्षित क्षेत्र को हिट करने के लिए सीआरपीएफ की 3 स्ट्राइक टीमों का गठन किया गया था। सीआरपीएफ के ‘सेकंड-इन-कमांड’ प्रकाश रंजन मिश्रा, जिनके नाम से नक्सली थर-थर कांपते हैं, उन्होंने इस ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी सम्भाली। उनके साथ सहायक कमांडेंट प्रहलाद सहाय चौधरी भी थे। 25 जवानों के दस्ते को नक्सलियों के मुख्य क्षेत्र पर हमला करने का काम सौंपा गया था। स्ट्राइक 2 टीम को लक्षित क्षेत्र के चारों ओर कट-ऑफ लगाने का निर्देश दिया गया। स्ट्राइक 3 को एक सामरिक बिंदु पर रिजर्व में रखा गया था।
सिविल ट्रक में सवार हुआ था यह दस्ता
सीआरपीएफ की 94 वीं बटालियन के हेडक्वॉर्टर में इस ऑपरेशन को लेकर विस्तृत ब्रीफिंग हुई। 20 दिसंबर 2020 को घने अंधेरे में रात सवा आठ बजे तीनों टीमें एक सिविल ट्रक में सवार हो गई। तय स्थल पर ट्रक से उतरने के बाद दो स्ट्राइक टीमें, घने अंधेरे में पैदल आगे बढ़ीं। वह क्षेत्र पहाड़ियों, घनी वनस्पतियों, गहरे नालों और फिसलन वाली चट्टानों से भरा हुआ था। इन सभी बाधाओं से जूझते हुए दोनों स्ट्राइक टीम, सुबह होने से पहले ही अपने लक्ष्य बिंदुओं के समीप पहुंच गई थीं। प्रकाश रंजन मिश्रा, टूआईसी, जिनका नक्सल क्षेत्रों में जबरदस्त इंटेलिजेंस नेटवर्क है, वे अतिरिक्त अपडेट प्राप्त करने के लिए, विभाग की खुफिया टीम के साथ लगातार संपर्क में थे। गहरे जंगल में जब वे अपने लक्ष्य के निकट पहुँचे तो उन्हें कोयोंगसर वन क्षेत्र में नक्सलियों के मौजूद होने की पुष्टि हुई। स्ट्राइक वन टीम अपने लक्ष्य क्षेत्र की ओर बढ़ी। स्ट्राइक 2 टीम को कुम्हारडीह के पास कट ऑफ करने के लिए आगे बढ़ाया गया।
सामरिक रूप से लाभप्रद स्थिति में थे नक्सली
नक्सली ऊंचाई पर थे और वे एक गहरे नाले के किनारे पर छिपे थे। जवानों को उन तक पहुँचने के लिए नाला पार करना था। यह एक जोखिम भरा टास्क था। चूँकि नक्सली सामरिक रूप से लाभप्रद स्थिति में थे, इसलिए सीआरपीएफ टीम को बहुत संभलकर आगे बढ़ना था। तमाम बाधाओं के बावजूद, स्ट्राइक वन टीम के कमांडर ने यहाँ पर डटे रहने का फैसला किया। इलाके में चारों तरफ से घेरा डालने, सर्च ऑपरेशन और आपसी सहयोग बढ़ाने के मकसद से प्रकाश रंजन मिश्रा ने स्ट्राइक वन टीम को 3 उप-टीमों में विभाजित कर दिया। एक उप-टीम ने बाएं फ्लैंक से, दूसरी ने दाएं फ्लैंक से चलना शुरू किया। तीसरी उप-टीम में सिपाही राजू कुमार,योगेंद्र कुमार, एसी प्रहलाद सहाय चौधरी और टू-आईसी पीआर मिश्रा और सिपाही सुशील कुमार चेची, सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़े चले।
नक्सलियों ने जब जवानों पर फायरिंग की
जब यह दस्ता शीर्ष पर पहुंचने वाला था तो उन्होंने कुछ दूरी पर चट्टानों के पीछे हलचल देखी। पार्टी कमांडर को तुरंत यह सूचना दी गई। इसके बाद टीम ने दबे कदमों से संदिग्ध गतिविधि की ओर बढ़ना शुरू किया। जब वे अपने लक्ष्य से 10-15 गज की दूरी पर थे तो नक्सलियों ने जवानों पर फायरिंग शुरू कर दी। भारी जोखिम के बावजूद, सीआरपीएफ टीम पूरे जोश के साथ वहीं पर डटी रही। जवानों ने जवाबी कार्रवाई की। नक्सलियों से जीवन के लिए अत्यधिक खतरे और लगातार गोलाबारी के बीच, प्रकाश रंजन मिश्रा और प्रहलाद सहाय चौधरी अपने मुट्ठी भर जवानों के साथ नक्सलियों की ओर रेंगते हुए चलने लगे। थोड़ी देर बाद इन दोनों कमांडरों ने सिपाही राजू कुमार,योगेंद्र कुमार और सुशील कुमार चेची के साथ नक्सलियों पर सामने से हमला कर दिया।
तब नक्सलियों के पांव उखड़ने लगे थे
करीब 40-45 मिनट तक दोनों पक्षों के बीच जमकर गोलीबारी हुई। सीआरपीएफ टीम ने जिस रणनीति के साथ हमला बोला, उससे नक्सलियों के पाँव उखड़ गए। वे अपना अहम ठिकाना छोड़कर पीछे भागने के लिए मजबूर हो गए। बल के योद्धाओं की सामरिक रणनीति, नक्सलियों को समझ नहीं आई। वे सामरिक फायदे वाली स्थिति में होने के बावजूद सीआरपीएफ के हमले से बच नहीं पाए। मुठभेड़ के बाद जब आसपास के क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ तो वहाँ एक कट्टर नक्सली, जिदान गुरिया का शव, एक एके 47 राइफल, मैगजीन और गोला-बारूद बरामद किया गया। मारा गया नक्सली पीएलएफआई की क्षेत्रीय समिति का सदस्य था। उस पर 15 लाख रुपये का इनाम था। उसके खिलाफ झारखंड के अलग-अलग थानों में 152 मामले दर्ज थे। वह पिछले 20 वर्षों से राज्य के लिए एक अभिशाप बना हुआ था। वह अनेक मुठभेड़ों और सीआरपीएफ व पुलिस के खिलाफ आईईडी हमलों के कई मामलों में वांछित था।