कांग्रेस के सामने नेतृत्व का संकट, विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी नेता चिंतित
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शीला दीक्षित दिल्ली में कांग्रेस की पर्याय बन गईं थीं। उनकी सहज, सरल, निश्चल मुस्कान आम आदमी में वह भरोसा पैदा करती थी जिसमें वह अपने लिए जगह खोज पाता था। अपने इसी व्यवहार की वजह से वे जनता के दिलों में बस गईं और 15 सालों तक दिल्ली पर एकछत्र राज किया। यूपीए 2 के दौरान पार्टी पर लगे आरोपों के तूफान में उनकी सरकार भले ही चली गई, लेकिन उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। यही कारण है कि दिल्ली में जब पार्टी को दोबारा मजबूत करने की समस्या खड़ी हुई तो पार्टी को शीला दीक्षित के नाम के आलावा दूसरा कोई भरोसेमंद चेहरा नजर नहीं आया।
प्रदेश कांग्रेस नेता मंगतराम सिंघल ने कहा कि शीला दीक्षित के नेतृत्व का ही परिणाम था कि लोकसभा चुनाव में पार्टी ने तेजी से अपना खोया जनाधार वापस लाने में सफल रही। वे विधानसभा चुनाव के दौरान भी मजबूती के साथ वापसी की उम्मीद कर रहे थे लेकिन शीला दीक्षित के अचानक चले जाने से पार्टी की उम्मीदों को करारा झटका लगा है। अब केंद्रीय नेतृत्व के सामने मजबूत नेतृत्व की तलाश करना एक बड़ी चुनौती है जो शीला दीक्षित की तरह सबको एक साथ लेकर चल सके। शीला दीक्षित के विशेष सहयोगी रहे मंगतराम ने बताया कि शीला दीक्षित की यही सबसे बड़ी खासियत थी कि प्रदेश नेतृत्व से असहमति के बावजूद वे पार्टी और कार्यकर्ताओं का साथ पाने में सफल रहती थीं। यहां तक कि उनसे अलग विचार रखने वाले प्रदेश अध्यक्ष भी जरूरी मौकों पर उनके साथ खड़े नजर आते थे। लेकिन अब इस तरह का नेतृत्व खोजना आसान नहीं होगा।
कांग्रेस नेता की चिंता बेवजह नहीं है। शीला दीक्षित के पूर्व पार्टी ने अरविंदर सिंह लवली और अजय माकन को प्रदेश संभालने की जिम्मेदारी दी थी लेकिन इन दोनों ही युवा नेता पार्टी को मजबूत बनाने में कोई ठोस जमीनी परिणाम नहीं दे सके। अजय माकन तो अपनी प्रदेश कार्यकारिणी का गठन तक नहीं कर पाए क्योंकि उन्हें इस बात का भय था कि पार्टी में चल रही गुटबाजी उजागर हो जायेगी और इसका नकारात्मक असर पड़ेगा।
पार्टी के एक अन्य नेता कहते हैं कि केंद्र में भी नये नेतृत्व का गठन तय है। इसलिए नए प्रदेश अध्यक्ष का गठन नए अध्यक्ष के तालमेल के साथ ही बनाया जायेगा। लेकिन चूंकि विधानसभा चुनाव में अब बहुत कम समय बचा हुआ है, नेतृत्व के गठन में देरी पार्टी के लिहाज से नुकसानदेह साबित हो सकती है।