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कांग्रेस का साथ नहीं मिला तो अकेले चुनाव में उतरेगी सीपीआई, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में है अच्छी पकड़
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Updated Fri, 06 Jul 2018 02:01 PM IST
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राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस किसी महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव में उतरेगी या अकेले दम पर अपनी ताकत आजमाएगी, अभी इस पर स्थिति बहुत साफ नहीं है। लेकिन इसी बीच खबर है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में असर रखने वाली सीपीआई ने कांग्रेस से संभावित गठबंधन के लिए संपर्क किया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक दोनों पार्टियों के बीच किसी तरह की संभावना बनती है तो ठीक, अन्यथा सीपीआई कुछ क्षेत्रीय संगठनों-स्वयं सेवा समूहों को साथ लेकर अकेले भी चुनाव में उतर सकती है। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस को आदिवासी बहुल क्षेत्रों में नुकसान हो सकता है।
जुलाई तक इंतजार
सीपीआई के कांग्रेस से संपर्क करने के बारे में जब पार्टी के नेता अतुल अंजान से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यह सही है कि उनकी पार्टी चाहती है कि इन विधानसभा चुनावों में मतों का विभाजन न हो जिसका फायदा भाजपा जैसी पार्टी को मिले, इसलिए कांग्रेस के कुछ नेताओं से उनकी बातचीत हुई है। लेकिन गठबंधन जैसी बात पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
सीपीआई नेता अंजान ने कहा कि जुलाई तक वे कांग्रेस का इंतजार करेंगे, लेकिन कांग्रेस से कोई तालमेल न होने की सूरत में वे अगस्त माह में इन राज्यों के आदिवासी संगठनों और एनजीओज को लेकर अपने अलायंस की घोषणा कर देंगे।
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क्षेत्रों की हो चुकी है पहचान
दरअसल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ही राज्यों में आदिवासी जनजातियों की अच्छी संख्या निवास करती है। कई विधानसभा क्षेत्रों में वे निर्णायक भूमिका में भी हैं। सीपीआई इन आदिवासी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और उसके कई संगठन और नेता इसके अच्छे संपर्क में हैं।
अतुल अंजान के मुताबिक छत्तीसगढ़ की 14 सीटें, मध्यप्रदेश की 16 और राजस्थान की कुछ सीटें ऐसी हैं जिन पर उनके समर्थक अच्छी संख्या में हैं और वे चुनाव परिणाम को प्रभावित करेंगे। ऐसे में अगर वोटों को बिखरने से रोका जा सके तो यह बेहतर होगा।
आदिवासी वोटों के दावेदार
पिछले दिनों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए कई प्रदर्शनों में आदिवासी समूहों ने सत्ता के खिलाफ अपनी मजबूत स्थिति दिखाई है। उनके आक्रोश को भुनाने के लिए दोनों ही राज्यों में कई दावेदार हैं। कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और छत्तीसगढ़ के इंचार्ज पीएल पुनिया ने कहा है कि वे आदिवासी समूहों के नेताओं के संपर्क में हैं। उनका दावा इस बात से भी मजबूत होता है कि पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुई राहुल गांधी की रैली में आदिवासी नेता पीवी राजगोपालन राहुल के बेहद करीब नजर आए थे। राजगोपालन एकता परिषद से जुड़े हैं जो आदिवासियों के बीच अच्छी पैठ रखती है।
इसके अलावा कांग्रेस ने अरविंद नेतम को भी पार्टी में वापस ले लिया है जिन्हें जून 2012 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया था। नेतम का अपना संगठन सर्व आदि समाज जंगल अधिकारों पर आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ता रहा है और इनके बीच अच्छा असर रखता है।
वहीं कांग्रेस के पुराने नेता अजीत जोगी खुद को आदिवासी बताकर इन वोटों पर अपना हक जताते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री जोगी का आदिवासी वोटों पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता और इस बार वे जनता कांग्रेस के नाम से अपनी पार्टी के साथ चुनाव में उतर रहे हैं।
उन्होंने कांग्रेस के साथ किसी गठबंधन की संभावना से भी इनकार किया है। जाहिर है कि इस स्थिति में आदिवासी वोटों का विभाजन तय है। जोगी का असर मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में भी हो सकता है। कांग्रेस और अजीत जोगी के अलावा भाजपा भी आरएसएस के आदिवासी समूहों में कार्य करने वाले संगठनों की मदद से अच्छा असर रखती है।
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जुलाई तक इंतजार
सीपीआई के कांग्रेस से संपर्क करने के बारे में जब पार्टी के नेता अतुल अंजान से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि यह सही है कि उनकी पार्टी चाहती है कि इन विधानसभा चुनावों में मतों का विभाजन न हो जिसका फायदा भाजपा जैसी पार्टी को मिले, इसलिए कांग्रेस के कुछ नेताओं से उनकी बातचीत हुई है। लेकिन गठबंधन जैसी बात पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
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सीपीआई नेता अंजान ने कहा कि जुलाई तक वे कांग्रेस का इंतजार करेंगे, लेकिन कांग्रेस से कोई तालमेल न होने की सूरत में वे अगस्त माह में इन राज्यों के आदिवासी संगठनों और एनजीओज को लेकर अपने अलायंस की घोषणा कर देंगे।
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क्षेत्रों की हो चुकी है पहचान
दरअसल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ही राज्यों में आदिवासी जनजातियों की अच्छी संख्या निवास करती है। कई विधानसभा क्षेत्रों में वे निर्णायक भूमिका में भी हैं। सीपीआई इन आदिवासी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और उसके कई संगठन और नेता इसके अच्छे संपर्क में हैं।
अतुल अंजान के मुताबिक छत्तीसगढ़ की 14 सीटें, मध्यप्रदेश की 16 और राजस्थान की कुछ सीटें ऐसी हैं जिन पर उनके समर्थक अच्छी संख्या में हैं और वे चुनाव परिणाम को प्रभावित करेंगे। ऐसे में अगर वोटों को बिखरने से रोका जा सके तो यह बेहतर होगा।
आदिवासी वोटों के दावेदार
पिछले दिनों मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए कई प्रदर्शनों में आदिवासी समूहों ने सत्ता के खिलाफ अपनी मजबूत स्थिति दिखाई है। उनके आक्रोश को भुनाने के लिए दोनों ही राज्यों में कई दावेदार हैं। कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और छत्तीसगढ़ के इंचार्ज पीएल पुनिया ने कहा है कि वे आदिवासी समूहों के नेताओं के संपर्क में हैं। उनका दावा इस बात से भी मजबूत होता है कि पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में हुई राहुल गांधी की रैली में आदिवासी नेता पीवी राजगोपालन राहुल के बेहद करीब नजर आए थे। राजगोपालन एकता परिषद से जुड़े हैं जो आदिवासियों के बीच अच्छी पैठ रखती है।
इसके अलावा कांग्रेस ने अरविंद नेतम को भी पार्टी में वापस ले लिया है जिन्हें जून 2012 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया था। नेतम का अपना संगठन सर्व आदि समाज जंगल अधिकारों पर आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ता रहा है और इनके बीच अच्छा असर रखता है।
वहीं कांग्रेस के पुराने नेता अजीत जोगी खुद को आदिवासी बताकर इन वोटों पर अपना हक जताते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री जोगी का आदिवासी वोटों पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता और इस बार वे जनता कांग्रेस के नाम से अपनी पार्टी के साथ चुनाव में उतर रहे हैं।
उन्होंने कांग्रेस के साथ किसी गठबंधन की संभावना से भी इनकार किया है। जाहिर है कि इस स्थिति में आदिवासी वोटों का विभाजन तय है। जोगी का असर मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में भी हो सकता है। कांग्रेस और अजीत जोगी के अलावा भाजपा भी आरएसएस के आदिवासी समूहों में कार्य करने वाले संगठनों की मदद से अच्छा असर रखती है।