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लोकल ट्रेन, यात्री ट्रेन चले तो कारोबार का पहिया भी डोले

Sun, 27 Dec 2020 08:13 PM IST
दीप्ति मिश्रा शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Sun, 27 Dec 2020 08:13 PM IST
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Covid -19: If the local train and passenger train runs the business also grow mumbai New delhi
train - फोटो : अमर उजाला

रंजीत बाबेल का जरी के कपड़ों का काम है और लेबर मेरठ, हापुड़, पलवल तमाम क्षेत्रों से आती हैं। केन्द्रीय मंत्रालय और सचिवालय का लोअर स्टाफ भी दूर दराज के क्षेत्र से आता है। यही स्थिति लक्ष्मीनगर, चांदनी चौक, गांधी नगर, नेहरू प्लेस और पीतम पुरा की भी है। छोटे, लघु उद्योंगों की संस्था से जुड़े अनिल खेतान का कहना है कि बाजार और कारोबार भले खुल गया है, लेकिन लेबर की समस्या के कारण रौनक नहीं आ पा रही है। राधेश्याम गोयल कहते हैं कि लोकोमोटिव, डेमू या लोकल ट्रेन जबतक नहीं चलेगी, तब तक इसी तरह के हालात बने रहेंगे।

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हापुड़ के पास से आने वाले विद्यानंद केन्द्रीय सचिवालय के पास नौकरी करते हैं। सात हजार रुपये की तनख्वाह है। पार्ट टाइम करके कुल 10-12 हजार तक कमाते हैं, लेकिन इन दिनों एक बार आने और जाने में उन्हें 198 रुपये का भुगतान किराये के रूप में करना पड़ता है। समय भी तीन गुना लगता है, इसलिए विद्यानंद आना ही नहीं चाहते। विद्यानंद का कहना है कि लोकल पैसेंजर ट्रेन चल जाए तो बात बने। विद्यानंद की तरह ही दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, साहिबाबाद, शहादरा, गांधी नगर, चादनी चौक, सदर बाजार समेत तमाम कामकाजी जगहों पर कामगार लोकल ट्रेन से आते हैं। जहां कामगारों को लोकल ट्रेन के चलने का इंतजार है। वहीं कारोबारियों को भी कामगारों की कमी अब खलने लगे हैं।
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लोकल ट्रेन चले तो छोटे-छोटे शहरों का धंधा चमके
जौनपुर, इलाहाबाद, बनारस, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, लखनऊ समेत उ.प्र. के तमाम छोटे-बड़े जिलों को भी लोकल ट्रेन का बेसब्री से इंतजार है। सुल्तानपुर के वकील प्रदीप पाठक बताते हैं कि हर रोज लोकल ट्रेन का कम किराया होने के कारण बड़ी संख्या में शहर में मजदूर, छोटे कामकागार, दफ्तर के बाबू, छात्र, मास्टर, मुकदमा की पैरवी करने वाले और दूधिए आते हैं। इससे न केवल कचहरी गुलजार रहती है, बल्कि शहर का कामकाज भी तेजी से चलता है। कोुिवड-19 संक्रमण के ट्रेनों का परिचालन रुका और इसका सीधा लोगों को कारोबार तथा शहरों की रौनक पर पड़ रहा है। सिरकोनी के दयाराम यादव अपने बेटे और सहायक के साथ प्रतिदिन लोकल ट्रेन पर दूध का टंका लादकर बनारस में पांच क्विंटल दूध की आपूर्ति करने जाते थे। दयाराम बताते हैं कि उनके इस कारोबार पर लोकल ट्रेन न चलने से प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उनकी तरह करीब 50 दूध कारोबारी इस समस्या से जूझ रहे हैं। दयाराम बताते हैं कि लोकल ट्रेन से दूध ले जाना काफी सस्ता पड़ जाता था, जबकि बसों में लादकर इसे ले जाना काफी मंहगा सौदा है।
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मुंबई की तो लाइफ लाइन है लोकल ट्रेन
महाराष्ट्र इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में असिस्टेंट इंजीनियर विजय यादव प्रतिदिन लोकल ट्रेन से ही दफ्तर जाते थे। अभी वह कार का सहारा लेते हैं। विजय कहते हैं कि लोकल ट्रेन तो मुंबई की लाइफ लाइन मानी जाती है। यह रोज मुंबई में 75 लाख यात्रियों को उनके गंतव्य तक ले जाती है। अभी तो तमाम पाबंदियों के कारण लाखों यात्रियों को मन मसोस कर रह जाना पड़ रहा है। पालघर से मुंबई आकर कामकाज करके शाम को लौट जाने वाले वरुण चौबे कहते हैं कि आंशिक तौर पर लोकल ट्रेन चल रही है। सभी लोगों को उसमें यात्रा की इजाजत नहीं है। 15 दिसंबर के बाद से लोकल ट्रेन के परिचालन में थोड़ी ढिलाई बरते जाने से अभ धीरे-धीरे कामकाज पटरी पर लौट रहा है। यही स्थिति नाला सोपाड़ा स्टेशन के पास भूजा बेचने वाले छेदी राम गुप्ता की भी है। गुप्ता का कहना है कि वह अभी भी कोविड-19 की त्रासदी झेल रहे हैं। उन्हें भी पहले की तरह लोकल ट्रेन और उसमें लोगों के यात्रा करने वाले समय का इंतजार है।

राजधानी, शताब्दी से भी ज्यादा लोकल ट्रेन के परिचालन की मांग

निहालगढ़ रेलवे स्टेशन में परिचालन विभाग से जुड़े सूत्र की माने तो राजधानी, शताब्दी, पैसेंजर ट्रेन से ज्यादा मांग लोकोमोटिव, डेमू ट्रेनों की है। सूत्र बताते हैं कि कम पैसे में यात्रा के कारण के कारण रोजमर्रा के कामकाजी लोगों को इसके न चलने से काफी परेशानी हो रही है। बनारस रेलवे स्टेशन के प्रमुख सूत्र का भी कहना है कि जौनपुर-बनारस-सुल्तानपुर जैसी ट्रेनों की काफी मांग है। हर दिन रेलवे का स्टाफ इन ट्रेनों के परिचालन की जानकारी देते-देते थक जाता है। सूत्र बताते हैं कि कोविड-19 की स्थिति को देखते हुए अभी इन ट्रेनों के परिचालन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है।

अभी रेलवे बोर्ड कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं
रेलवे बोर्ड के चेयरमैन विनोद कुमार यादव शनिवार को एक रूपरेखा के साथ प्रेसवार्ता में आए, लेकिन अभी यात्री ट्रेनों को चलाने को लेकर उनके पास भी कोई ठोस जवाब नहीं था। रेलवे बोर्ड चेयरमैन का कहना है कि अधिकारी यात्री ट्रेनों के परिचालन के लिए राज्य सरकारों से संपर्क  कर रहे हैं। समझा जा रहा है कि कोविड-19 की स्थिति और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखकर रेलवे बोर्ड ट्रेनों के परिचालन के मामले में काफी फूंक-फूंककर कदम रख रहा है। नादर्न रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि यात्री ट्रेनों के परिचालन का दबाव है, लेकिन इससे ज्यादा जरूरी लोगों की सुरक्षा है। सूत्र का कहना है कि रेलवे का देश की अर्थ व्यवस्था और कारोबार में प्रत्याक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से काफी बड़ा योगदान रहता है, लेकिन स्थितियों को देखते हुए अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

गौरतलब है कि रेलवे 13523 से अधिक यात्री ट्रेनों का परिचालन करता है। इसमें हर दिन करीब 8.5 अरब लोग यात्रा करते हैं। 12,147 के करीब लोकोमोटिव ट्रेन चलती है और पूरे देश में 7231 रेलवे स्टेशनों को रेलवे जोड़ता है। इस तरह से जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को जोडऩे वाला रेल नेटवर्क देश के आर्थिक विकास में काफी बड़ा योगदान करता है। कोविड के चलते यह सब प्रभावित हुआ है।

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