उत्तराखंड में सियासी चक्रव्यूह में घिरी भाजपा
- अदालती और तकनीकी पेच ने बढ़ाई परेशानी
- संसद से राष्ट्रपति शासन की मंजूरी हासिल करना बनेगी नई सिरदर्दी
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उत्तराखंड में आराम से सत्ता हासिल करने की राह बढ़ती दिख रही भाजपा और मोदी सरकार सियासी चक्रव्यूह में उलझ कर रह गई है। एक तरफ जहां नैनीताल हाईकोर्ट के प्रतिकूल रुख से पार्टी परेशान है, वहीं दूसरी ओर उसे अब सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में राष्ट्रपति शासन पर सहमति की मुहर लगवाने की चिंता खाए जा रही है।
पार्टी के लिए मुश्किल यह है कि कांग्रेस के खिलाफ बगावत की राह पकड़ने वाले 9 विधायकों की सदस्यता का मामला भी अदालत के विचाराधीन है, जबकि पूरे मामले में राज्यपाल भी अदालत में एक पक्ष हैं।
इस बीच बुधवार को नैनीताल हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने राज्य के वरिष्ठ नेता भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व सांसद सतपाल महाराज और राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी के साथ अलग-अगल चर्चा की। विजयवर्गीय ने जल्द कुछ न कुछ होने की बात कही और यह भी कहा कि मौका मिला तो भाजपा राज्य में सरकार बनाने की कोशिश करेगी।
अदालती और तकनीकी पेच ने बढ़ाई परेशानी
दरअसल नैनीताल हाईकोर्ट ने भाजपा की बनी बनाई रणनीति पर पानी फेर दिया है। पार्टी को उम्मीद थी कि हाईकोर्ट का निर्णय न केवल राष्ट्रपति शासन के पक्ष में होगा, बल्कि इस आशय का निर्णय भी जल्दी आएगा।
इसलिए पार्टी का निर्णय आते ही खुद के 27 और कांग्रेस के 9 बागियों के सहारे सरकार बनाने की रणनीति तैयार कर ली गई। हालांकि नैनीताल हाईकोर्ट में न केवल राष्ट्रपति शासन पर सुनवाई जारी है, बल्कि हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले पर सख्त टिप्पणियां की हैं।
भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि कांग्रेस के बागी विधायकों का मामला अदालत के विचाराधीन होने के कारण वह महज 27 विधायकों के सहारे सरकार बनाने का दावा नहीं कर सकती। फिर सवाल यह भी है कि जब राज्यपाल भी इस मामले में अदालत में एक पक्ष हैं तो आखिरकार दावा कैसे पेश किया जाएगा। सबसे बड़ी मुश्किल राष्ट्रपति शासन पर संसद की अनुमति हासिल करने की है। सोमवार से शुरू हो रहे बजट सत्र के दूसरे चरण में सरकार को इस पर संसद की मंजूरी लेनी होगी, मगर राज्यसभा में उसके पास बहुमत नहीं है।