#LadengeCoronaSe: कोरोना संक्रमण से बचने के लिए डॉक्टर-नर्स कैसे रख रहे हैं अपना ख्याल?
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भारत समेत दुनिया कई 200 से भी अधिक देश कोरोना से लड़ रहे हैं और इस वैश्विक लड़ाई सबसे आगे कोई है तो वे दुनियाभर के डॉक्टर्स और नर्स हैं। कोरोना से मरीजों को बचाने के लिए ये डॉक्टर्स अपनी जान की परवाह किए बगैर रात-दिन लगे हुए हैं। आप जरा सोचिए कि कोरोना के जिस मरीज के पास जाने से लोग कतरा रहे हैं उसी मरीज के साथ डॉक्टर और नर्स 24 घंटे रहे हैं। तो अब सवाल यह है कि कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति का इलाज करते हुए डॉक्टर्स और नर्स खुद को कैसे सुरक्षित रखने के लिए क्या कर रहे हैं? आइए जानते हैं...
चीन में 3,300 से अधिक कोरोना से संक्रमित
मेडिकल जर्नल Lancet की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च की शुरुआत में 22 स्वास्थ्यकर्मियों की कोरोना से मौत हुई और 3,300 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित थे। इटली, जहां कोरोना के कारण सबसे अधिक मौते हुई हैं, वहां 20 फीसदी से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों के संक्रमित होने की खबर है। इनमें से कुछ की मौत भी हुई है। यह आंकड़ा समय के साथ बढ़ भी सकता है। स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा लैब में कोरोना का टेस्ट करने वाले डॉक्टर्स पर भी खतरा है। साथ भी अस्पताल में साफ-सफाई करने वाले की जान भी दांव पर लगी हुई है।
स्वास्थ्यकर्मियों के लिए सबसे जरूरी है PPE
कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स, नर्स और स्टाफ के लिए सबसे जरूरी पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स यानी पीपीई है। पीपीई को डॉक्टर्स कपड़े की तरह पहने लेते हैं। इस पीपीई में एंटी इंफेक्शन मास्क भी लगा होता है। पीपीई में ग्लव्स भी मौजूद रहता है। अमेरिका और चीन जैसे देशों में तो हाईटेक पीपीई मौजूद हैं लेकिन भारत में हालत थोड़ी नाजुक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साल 2014 में इबोला वायरस के फैलने के बाद पहली बार पीपीई का इस्तेमाल हुआ था। देश के कई अस्पतालों में पीपीई उपलब्ध नहीं हैं। हाल ही में बिहार के एक सरकारी अस्पताल से एक फोटो सामने आई थी जिसमें डॉक्टर्स और नर्स को पीपीई की जगह प्लास्टिक पहने हुए देखा जा सकता था। ऐसे में सरकारी की जिम्मेदारी है कि अस्पतालों में कोरोना के मरीजों का ध्यान रख रहे स्वास्थ्यकर्मियों को पीपीई और मास्क जैसे जरूरी सामान उपलब्ध कराए जाएं।
स्वास्थ्यकर्मी की सेहत को लेकर किस तरह का खतरा है?
एनल्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि SARS-CoV-2 से संक्रमण से बचाने में PPE का उपयोग करने की प्रभावशीलता की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन निमोनिया के साथ COVID-19 रोगी के साथ काम करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का अध्ययन करने वाले अध्ययन में पाया गया कि मरीजों के इलाज के दौरान 85 प्रतिशत स्वास्थकर्मी सर्जिकल मास्क पहने हुए थे और अन्य ने एन95 मास्क का इस्तेमाल किया। रिसर्च में पाया गया कि इनमें से कोई भी स्वास्थ्यकर्मी संक्रमण का शिकार नहीं हुआ था। इस रिसर्च का मकसद ही यह पता लगाना था कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पीपीई जैसे सिक्योरिटी किट कितने उपयोगी हैं।
कोरोना का इलाज कर रहे स्वास्थकर्मियों को है खास ट्रेनिंग की जरूरत
देशभर के जिन अस्पतालों में कोरोना वायरस का इलाज हो रहा है, वहां काम करने वाले स्वास्थकर्मियों को स्पेशल ट्रेनिंग की जरूरत होती है। साथ ही उन्हें उन सावधानियों के बारे में प्रशिक्षित करने की जरूरत है जिसमें मरीजों को संभालने से लेकर संक्रमण रोकने संबंधी जानकारी दी जाए। इसके अलावा अस्पतालों में पीपीई और मास्क जैसी जरूरी चीजें पर्याप्त मात्रा में रहें। भारत की बात करें तो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कोरोना का इलाज कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं जिसमें क्या करें, क्या ना करें से लेकर संक्रमण से खुद को बचाने की जानकारी शामिल हैं।
दिशा-निर्देश में यह भी बताया गया है कि आइसोलेशन वार्ड में जाने से पहले हाइजिन का किस तरह ख्याल रखना है और पीपीई को कैसे पहनना है। इसके अलावा आंख, नाक और हाथों पर भी खास ध्यान देने की दरकार है। 10 बेड वाले एक आइसोलेश वार्ड के लिए 2,000 स्क्वॉयर फीट जगह की जरूरत है। आइसोलेशन वार्ड में जाने और बाहर आने के लिए अलग-अलग दरवाजे हैं। आइसोलेशन वार्ड में मरीजों का ख्याल रख रहे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए नेत्र सुरक्षा गियर, फेस शील्ड, दस्ताने, दोबार इस्तेमाल होने वाले रबर के दस्ताने, हेयर कवर, पार्टिकुलेट रेस्पिरेटर, मेडिकल मास्क, गाउन, कंटेनर, साबुन और अल्कोहल वाले सैनेटाइजर की काफी जरूरी हैं।