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गुजरते साल की टीस: कोरोना ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर क्या कदम उठाने को मजबूर किया,क्या देश अगली चुनौती के लिए तैयार है?

Thu, 30 Dec 2021 07:24 AM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Thu, 30 Dec 2021 07:24 AM IST
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सार
देश में अचानक आई दूसरी लहर ने सरकार और नागरिकों को बेहद मुश्किल में डाल दिया था।  हालांकि जब से दूसरी लहर आई है, देश लगातार अपनी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार कर रहा है ताकि वह आने वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सके। इस रिपोर्ट में समझें कि भारत ने अपनी स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए क्या काम किया?
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Coronavirus Omicron coronavirus updates What steps did Corona force to take regarding health facilities, is the country ready for the next big challenge?
ऑक्सीजन नहीं मिलने से बेचैन कोरोना मरीज (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ओमिक्रॉन के बढ़ते खतरे के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर की रात 10 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि तीन जनवरी से 15 साल से ऊपर के बच्चों को भी टीका लग सकेगा। उन्होंने यह भी एलान किया कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, अग्रिम पंक्ति के कार्मिकों और 60 साल से अधिक उम्र के बीमार लोगों को टीके की एक और एहतियाती खुराक दी जाएगी। पीएम का यह संबोधन निराशा और हताशा की इस खबर के बीच कि ऑमिक्रॉन वैरिएंट की वजह से अगले साल फरवरी में कोरोना की तीसरी लहर आ सकती है, उम्मीद की एक और किरण ले कर आया। वैक्सीन की एक दिशा में हमने एक और कदम आगे बढ़ाया। 


दूसरी लहर, इस त्रासदी से क्या सबक मिला?
इस साल कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। दुनिया में अब तक करीब 27 करोड़ 65 लाख से अधिक कोरोना संक्रमित हो चुके हैं और करीब 54 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत में यह आंकड़ा पांच लाख होने वाला है। भारत को कोरोना महामारी के शिकार शीर्ष पांच देशों में रखा गया है। 


भारत में अप्रैल-मई में हालात भयावह हो गए थे और लोगों ने अपनों को खोने का भयानक मंजर देखा। दवाओं की मारामारी, अस्पताल में बिस्तरों की कमी और ऑक्सीजन की कमी से मौतों की बेबसी हमने झेली। देश में कोरोना के कारण  होने वाली सभी आधिकारिक मौतों में से लगभग 20 फीसदी अप्रैल के चार हफ्तों में हुई। अनुमान है कि इस दौरान एक  लाख 10 हजार बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया। 

दूसरी लहर के दौरान लोगों कें सांसों पर संकट आ गई थी। अस्पतालों में ऑक्सीजन की मांग 12 गुना बढ़ गई थी और ऑक्सीजन सिलेंडर बेचने वाले मुनाफाखोरी कर रहे थे। इस दौरान देश अस्पतालों के अंदर, अस्पताल के दरवाजे पर, फुटपाथों पर,  गाड़ियों और घरों में ऑक्सीजन के लिए हांफने लगा। जल्द ही, देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली अपने घुटनों पर थी। हालांकि केंद्र सरकार ने संसद में दिए बयान में कहा कि पूरे देश में ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई।  
 

नवजात बच्ची का जमीन पर ऑक्सीजन लगाकर इलाज किया गया (फाइल फोटो)
नवजात बच्ची का जमीन पर ऑक्सीजन लगाकर इलाज किया गया (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
उदासीनता का नतीजा
स्वास्थ्य पर 2017-18 में किए गए  पिछले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था खराब है। निजी स्वास्थ्य प्रणाली महंगी है और केवल महानगरों में अच्छी है। ग्रामीण भारत में एक बड़ी आबादी छोटे, निजी और अनौपचारिक चिकित्सा देखभाल प्रदाताओं पर निर्भर है।

सर्वेक्षण में कहा गया था भारत की 45 फीसदी ग्रामीण आबादी सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधा पर, 51.9 फीसदी निजी सुविधाओं (अस्पतालों, क्लीनिकों और चिकित्सकों) पर और 2.4 फीसदी गैर सरकारी संगठनों/धर्मार्थ/अनौपचारिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर है। विशेषज्ञों ने कहा कि सार्वजनिक-निजी वितरण प्रणाली गंभीर बीमारी, आपात स्थिति या महामारी के दौरान बदल जाती है।

कोरोना महामारी के दौरान यह देखा गया कि कई निजी क्लीनिकें बंद कर दी, कई प्राइवेट अस्पतालों ने कोरोना रोगियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। तब लोगों ने  सार्वजनिक अस्पतालों की ओर रुख किया। तो क्या महामारी की पहली दो लहरों के बाद भारत बदल गया? क्या सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे के निर्माण के प्रति सात दशकों की उदासीनता को दूर कर लिया गया है?

पोर्टेबल वेंटिलेटर
पोर्टेबल वेंटिलेटर - फोटो : social media
सुविधाएं बढ़ीं
कोरोना की दूसरी लहर से सबक लेकर स्वास्थ्य सेवाओं में कई सुधार किए गए। सरकार ने सबसे पहले जीवनरक्षक दवाईयों, ऑक्सीजन, उपकरणों और अन्य चिकित्सा साधनों को बढ़ाने और उस तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अप्रैल 2020 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की अप्रैल 2020 तक हालत अच्छी नहीं थी। केंद्र या राज्य सरकार की ओर से संचालित भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में सिर्फ 16,644 वेंटिलेटर थे। जिनमें 16,325 राज्य सरकारें और 319 केंद्र सरकार संचालित कर रही थीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान लगभग 65 फीसदी भारतीय सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर थे। लोगों के लिए वेंटिलेटर की भारी कमी थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में वेंटिलेटर के वितरण में भी असमानता थी। उदाहरण के लिए सात करोड़ आबादी वाले तमिलनाडु की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में 3,495 वेंटिलेटर थे। यानी हर 20,000 लोगों पर एक वेंटिलेटर था। लेकिन 24 करोड़ से अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में केवल 723 वेंटिलेटर थे। यानी प्रत्येक 3.31 लाख लोगों के लिए एक वेंटिलेटर उपलब्ध था।

केंद्र ने मार्च-अप्रैल 2020 में बुनियादी ढांचे में सुधार करने की योजना पर काम करना शुरू किया। वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सिलेंडर जैसे चिकित्सा उपकरणों की कमी की पहचान की गई थी। वेंटिलेटर के निर्माण के लिए तीन कंपनियों को सूचीबद्ध किया गया। जून 2021 तक वेंटिलेटर की कुल संख्या 16,644 से 57,557 तक पहुंच गई।  इसके लिए भारी मात्रा में धन पीएमकेयर फंड से आया, जिसकी विपक्ष ने आलोचना की थी।

ऑक्सीजन गैस सिलेंडर लेने के लिए लगी लाइन
ऑक्सीजन गैस सिलेंडर लेने के लिए लगी लाइन - फोटो : amar ujala
ऑक्सीजन की उपलब्धता और तैयारी
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी, उसके लिए मारमारी और उसकी कालाबाजारी के कारण सरकार को विपक्ष, जनता और अदालतों की आलोचना का सामना करना पड़ा। चूंकि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही और सिलेंडरों को रिफिलिंग थी, ऑक्सीजन का उत्पादन मांग के हिसाब से कम पड़ने लगा। 

संकट में फंसे सांसों को उखड़ने से रोकने के लिए अस्पतालों को ऑक्सीजन के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई संयंत्र स्थापित किए गए। पीएम केयर्स के तहत, 2020 में 162 ऐसे संयंत्रों को मंजूरी दी गई थी। मार्च और 21 अप्रैल में पीएम केयर्स फंड के तहत स्वीकृत अतिरिक्त 1,051 ऑक्सीजन प्लांट डीआरडीओ और सीएसआईआर के माध्यम से खरीदे गए। मीडिया रिपोट्स के मुताबिक सितंबर तक 1,200 से अधिक ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित किए गए। 

आपूर्ति और आवटंन का एहसास
अप्रैल और मई के दौरान पूरे भारत में हुई त्रासदी ने केंद्र और राज्य सरकारों को ऑक्सीजन आपूर्ति और आवश्यकता के हिसाब से उसके आवंटन की जरूरत का एहसास कराया। अप्रैल और मई 2020 के दौरान मेडिकल ऑक्सीजन की आसान पहुंच को आसान बनाने के लिए 1,02,400 ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदे गए और राज्यों को बांटे गए। लेकिन अप्रैल-मई 2021 के संकट में देश में सिलेंडर की भारी कमी हो गई। अप्रैल के तीसरे सप्ताह में अतिरिक्त 1,27,000 सिलेंडरों के लिए ऑर्डर दिए गए थे और इसकी डिलीवरी अप्रैल के अंत तक शुरू हो गई।

‘कोविशिल्ड’ और भारत बायोटेक की ‘कोवैक्सीन’
‘कोविशिल्ड’ और भारत बायोटेक की ‘कोवैक्सीन’ - फोटो : twitter
स्वदेशी टीके बनाए, आत्मनिर्भर बने 
केंद्र सरकार ने इस महामारी से लड़ने के लिए देश में बने टीके को मान्यता दी और पहले 45 साल से अधिक उम्र वाले लोगों को टीका लगाने की इजाजत मिली। लेकिन शुरुआत में एक तरफ लोगों में टीके को लेकर हिचकिचाहट थी, दूसरी तरफ टीके की आपूर्ति की समस्या भी सामने आने लगी थी। हालांकि कोरोना की दूसरी लहर के बाद लोगों में टीके को लेक जागरुकता बढ़ी। भारत में बने दो टीके कोवाक्सीन और कोविशील्ड ने लोगों के प्राण बचाने में अहम भूमिका निभाई। 16 जनवरी से अब तक एक अरब 40 करोड़ से अधिक लोगों को टीके की खुराक दी जा चुकी है।

अब तक देश के दस राज्यों में 90 फीसदी लोगों को टीके की पहली खुराक मिल चुकी है। सरकार ने इसी सप्ताह कोरोना की दो वैक्सीन और दवा को आपात इस्तेमाल की मंजूरी दी है। जिन दो वैक्सीन्स को मंजूरी मिली है, उनमें एक कोवोवैक्स और दूसरी कोर्बिवैक्स है। 

क्या आने वाली चुनौती के लिए देश तैयार हैं?
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि कोरोना की पहली के दौरान ही सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का महत्व सबको समझ में आ गया, इसलिए उसी दौरान और उसके बाद भी इस बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का प्रयास किया गया था। कोरोना की तीसरी लहर यदि आती है तो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली इसे बेहतर तरीके से संभालने के लिए तैयार है। राज्यों में वेंटिलेटर पहुंच गए हैं और ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी नहीं होने दी जाएगी। राज्य सरकारों को हर चुनौती से तैयार रहने को कहा गया है। स्वास्थयकर्मियों का प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया गया है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि अब देश में कोरोना की दूसरी लहर की तरह आपात स्थिति पैदा नहीं होगी।
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