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कोरोना: निजामुद्दीन मरकज की घटना को धार्मिक रंग देने से मुस्लिम नेता खफा, बोले- मीडिया बरते सावधानी

Wed, 01 Apr 2020 10:14 PM IST
आसिम खान डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला Published by: आसिम खान Updated Wed, 01 Apr 2020 10:14 PM IST
सार

  • नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई हो, धार्मिक रंग देने से बिगड़ता है सामाजिक सौहार्द
  • मैंने खुद भी किसी मस्जिद में जाने की बजाय अपने घर में रहकर नमाज पढ़ीः सैयद अरशद मदनी
  • मीडिया से ज्यादा संवेदनशीलता और सावधानी दिखाने की अपील

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Coronavirus: Muslim leaders upset over Nizamuddin Markaz incident giving religious colour on Covid 19 cases
कोरोना वायरस - फोटो : जी पाल

विस्तार

निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में लगभग दो हजार लोगों के इकट्ठे होने को कोरोना संक्रमण के लिहाज से बड़ी चूक माना जा रहा है। कार्यक्रम में शामिल सात लोगों की कोरोना संक्रमण के कारण मौत हो गई है और सैकड़ों लोगों को क्वारंटीन किया जा रहा है। पुलिस ने इस कार्यक्रम से जुड़े सात लोगों पर प्राथमिकी भी दर्ज की है। लेकिन इस घटना की मीडिया में जिस तरह की रिपोर्टिंग की जा रही है, उसे लेकर कुछ मुसलमान धार्मिक नेताओं में रोष है। 

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धार्मिक रंग देने की कोशिश की जा रही: मुस्लिम नेता
उनका कहना है कि इस मामले को धार्मिक रंग देने की कोशिश की जा रही है जो बिलकुल अनुचित है। जमीयत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष सैयद अरशद मदनी ने कहा है कि यह पूरी तरह से लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। अगर इसमें किसी तरह की त्रुटी हुई है तो उसे उसी नजर से देखा जाना चाहिए, लेकिन इसे धार्मिक रंग देना किसी भी तरह से सही नहीं है। 
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इस तरह के मामलों को धार्मिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए: अरशद मदनी
लॉकडाउन देश के लोगों को कोरोना के संक्रमण से बचाने के लिए किया गया है और हर देशवासी को इसमें साथ देना चाहिए। मदनी ने कहा कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए ही उन्होंने मस्जिदों में नमाज पढ़ने को लेकर रोक लगाने की बात कही थी। उन्होंने खुद भी किसी मस्जिद में जाने की बजाय अपने घर में रहकर नमाज पढ़ी। लेकिन इस तरह के मामलों को धार्मिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।  
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स्थिति ज्यादा खराब होती तो कार्यक्रम पहले ही टाल देते: अतीक बस्तावी
आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मुफ्ती अतीक बस्तावी ने अमर उजाला से कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी भी घटना में मीडिया धार्मिक रंग खोज लेता है। यह तब्लीगी जमात का एक वार्षिक कार्यक्रम था जिसमें दुनियाभर के लोग शामिल होते हैं। विदेशी मेहमानों के आने के पहले कोरोना का मामला बढ़ा नहीं था जिसकी वजह से मेहमान आए और उन्हें निजामुद्दीन लाया गया। अगर स्थिति ज्यादा खराब होती तो कार्यक्रम पहले ही टाल दिया गया होता। 

मीडिया को ज्यादा संवेदनशीलता और सावधानी दिखानी चाहिए
उन्होंने कहा कि इसके बाद भी अगर कार्यक्रम के दौरान किसी कानून का उल्लंघन हुआ है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि यह पूरे देश और दुनिया के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। लेकिन किसी भी हालत में इसे धार्मिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। यह सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देता है जिससे सामाजिक सामंजस्य बिगड़ता है। इसलिए इस मामले की रिपोर्टिंग के दौरान मीडिया को ज्यादा संवेदनशीलता और सावधानी दिखानी चाहिए।  

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