Coronavirus: लॉकडाउन के अंतरराष्ट्रीय मानदंड पर पूरी तरह चल पाना भारत के लिए मुमकिन नहीं, फर्जी सूचना हो रही वायरल
- दक्षिण कोरिया, चीन ने दो महीने तक किया था लॉकडाउन
- भारत इसके पक्ष में नहीं है, सभी की स्क्रीनिंग भी संभव नहीं
- भारतीय मॉडल, रैंडम, रैपिड टेस्टिंग से लड़ेगा कोविड की जंग
- डब्ल्यूएचओ के नाम पर सोशल मीडिया पर वायरल रिपोर्ट को भी बताया फर्जी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
क्या भारत अंतरराष्ट्रीय मानदंड का पालन करके कोविड-19 से लड़ेगा,और उसी हिसाब से लॉकडाउन का पालन करेगा? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है वैश्विक मानदंडों को पूरी तरह अपनाना संभव नहीं है।
कोरोना से लड़ने के लिए गठित नीति आयोग की समिति के अध्यक्ष डा. विनोद पॉल का भी मानना है कि देश में सभी की स्क्रीनिंग और सबके टेस्ट की आवश्यकता नहीं है और 130 करोड़ की आबादी वाले देश में ये आसान भी नहीं है।
आईसीएमआर के डा. रमन गंगाखेड़कर ने आवश्कतानुसार कोविड-19 के टेस्ट को वरीयता दी है। डीआरडीओ के लाइफ साइंसेज विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा कि दिल्ली के बराबर यूरोप के कई देश की आबादी है। इसलिए भारत को कोविड-19 के संक्रमण पर काबू पाने के लिए अपना मॉडल अपनाना होगा।
डीआरडीओ के वैज्ञानिक का कहना है कि केवल दिल्ली में ही सभी की स्क्रीनिंग और टेस्ट करना आसान काम नहीं है। दिल्ली की आबादी कोई 1.5 करोड़ है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी 20 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं। मुंबई और तमाम महानगरों में जांच के लिए हमें विशेष मॉडल अमल में लाना होगा।
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के कोविड-19 संक्रमण से निबटने में लगे चिकित्सकों का कहना है कि हमने लॉकडाउन से काफी कुछ हासिल कर लिया है। संक्रमण बहुत बड़े पैमाने पर फैलने के संकेत नहीं है। इसलिए पूरे देश को कर्फ्यू या लॉकडाउन में रखना ठीक नहीं है।
सूत्र का कहना है कि जांच रैपिड किट, पीपीई किट समेत अन्य इंतजाम होने के बाद केंद्र सरकार को विशेष क्षेत्र को चिन्हित करके इसकी कई श्रेणियां बनानी चाहिए। इन्हीं श्रेणियों के स्थान पर उसके आस-पास के क्षेत्र को क्वारंटीन करने, लोगों की स्क्रीनिंग करने, उन्हें आइसोलेट करने के बारे में फैसला करना चाहिए।
सूत्र का कहना है कि दिल्ली जैसे तमाम क्षेत्र हैं, जहां स्लम में एक कमरे में दस लोग रहते हैं। इसलिए सभी को न तो हम क्वारंटीन कर सकते हैं और न ही सभी को आइसोलेशन वार्ड में रखने की आवश्यकता है। हमारी जरूरत केवल संक्रमितों की पहचान और उन्हें अन्य से अलग करने की है।
डब्ल्यूएचओ के नाम पर खूब वायरल हुई लॉकडाउन की यह सूचना, मंत्रालय ने बताया फर्जी
डब्ल्यूएचओ की एडवाइजरी के तौर पर उसके लोगों के साथ एक सूचना खूब वायरल हुई। इसके अनुसार पहले एक दिन का कर्फ्यू लगना चाहिए। इसके दो दिन बाद 21 दिन का लॉकडाउन। फिर पांच दिन की छूट और इसके बाद 28 दिन का लॉकडाउन।
इसके बाद पांच दिन की राहत और फिर 15 दिन का लॉकडाउन। इसे लोगों ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू, 23 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन, फिर 20 अप्रैल से 18 मई तक लॉकडाउन की संभावना व्यक्त की जा रही है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने इस वायरल सूचना को फर्जी बताया। डा. रमन गंगाखेड़कर ने इसे लोगों का अंदाजा बताया। स्वास्थ्य मंत्रालय के निदेशक रवीन्द्रन के अनुसार डब्ल्यूएचओ ने इससे खुद को अलग कर लिया है।
वहीं केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि लॉकडाउन की जरूरत तो है, लेकिन कैसे होगा यह अभी कहा नहीं जा सकता।