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क्या अस्पताल का बिल ना भरने पर मरीज को बंधक बनाया जा सकता है?

Tue, 16 Jun 2020 01:48 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Tue, 16 Jun 2020 01:48 PM IST
सार

  • 2018 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय लाया मरीजों के अधिकारों का चार्टर
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस चार्टर को तैयार किया
  • ये अभी तक ड्राफ्ट की शक्ल में ही है, कानून में नहीं बदला है

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coronacirus: hospitals detain patients for unpaid bills charter of patients right prepared by national human rights commission
मरीज को कैद नहीं कर सकते अस्पताल - फोटो : PTI

विस्तार

कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश के शाजापुर में अस्पताल का बिल ना भर पाने पर एक बुजुर्ग को पलंग से बांधने की खबरें और तस्वीरें आई थी। अस्पताल का कहना था कि बुजुर्ग के परिजनों ने अस्पताल का 11,200 रुपये का चिकित्सा बिल का भुगतान नहीं किया था।

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खबर मीडिया में आने के बाद स्थानीय प्रशासम ने उस निजी अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर दिया और अस्पताल के मैनेजर को गलत तरीके से बुजुर्ग व्यक्ति को कैद करने पर हिरासत में ले लिया था। ऐसा नहीं है कि ये मामले संज्ञान लेने के बाद खत्म हो जाते हैं या दोबारा नहीं आते हैं। ऐसी घटनाएं आपको देशभर से आएदिन मिलती रहती हैं। हालांकि हमारा कानून इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं है।
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साल 2018 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय मरीजों के अधिकारों का एक चार्टर लेकर आया था, जिसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बनाया था। इस चार्टर में किसी मरीज के मूलभूत अधिकारों का उल्लेख किया गया है। इस नियम में साफ-साफ लिखा गया है कि अस्पताल के बिल ना भर पाने या इससे संबंधी किसी भी कार्यवाही पर अस्पताल प्रशासन मरीज को कैद या पकड़कर नहीं रख सकता, यहां तक कि शव को भी नहीं रख सकता है।
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हर राज्य में स्वास्थ्य मंत्रालय होता है जो केंद्रीय कानूनों और दिशा-निर्देशों को राज्य की नीति के अनुरूप अपने प्रदेश में लागू करता है। पिछले साल महाराष्ट्र सरकार ने एक नियम की योजअना बनाई थी, जो पहले से मौजूद नर्सिंग होम रजिस्ट्रेशन नियमों में संशोधन के लिए बनाए गए थे।

नर्सिंग होम रजिस्ट्रेशन के मुताबिक अस्पतालों में बिल ना भर पाने की स्थिति में किसी मरीज को कैद करके नहीं रखा जा सकता, यही नहीं किसी भी स्थिति या कारण की वजह से मरीज के शव को डिस्चार्ज ना करने का फैसला नहीं लिया जा सकता है।

इन प्रावधानों को लेकर सबसे बड़ी परेशानी यह सामने आती है कि ये नियम और दिशा—निर्देश अभी भी प्रस्ताव या मसौदे तक ही सीमित हैं। इन्हें कानून की शक्ल नहीं दी गई है। न्यायालयों ने कई बार अस्पताल के बिल ना भरने पर मरीज को ना रोकने का फैसला सुनाया है लेकिन ये फैसले अलग-अलग केस पर आधारित है। कोर्ट ने इसको लेकर सामान्य दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं। 

साल 2018 में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मरीज के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि कैसे कोई अस्पताल किसी मरीज को स्वस्थ घोषित करने के बाद बिल का भुगतान ना करने की स्थिति में अस्पताल में रोक सकता है। इस तरह से अस्पताल मरीज के निजी अधिकारों को काट नहीं सकता है। लोगों को इस बात से जागरुक किया जाए कि अस्पताल की ओर से ऐसा रवैया गैर-कानूनी हो सकता है।


हालांकि अदालत ने इस मुद्दे पर कोई विशेष दिशा-निर्देश जारी करने से मना कर दिया था और कहा कि ये सरकार का काम है। एक साल पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने मरीज को पकड़कर रखने वाले मामले में कहा था कि अगर बिल का भुगतान नहीं भी किया है, तब भी मरीज को कैद करके नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वो इस तरह के कृत्य की निंदा करते हैं।

हालांकि ऐसे मामलों में मरीज के परिवार वालों पर निर्भर करता है कि उसका मामला अस्पताल के अधिकारी देखें या न्यायालय में इसे घसीटा जाए।

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