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Corona mutation: शरीर में खुद को अदृश्य बनाए रखता है ‘अल्फा’, मिले 23 म्यूटेशन
Thu, 10 Jun 2021 05:39 AM IST
Amit Mandal
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस।
न्यूयॉर्क टाइम्स न्यूज सर्विस।
Published by: Amit Mandal
Updated Thu, 10 Jun 2021 05:39 AM IST
सार
- प्रतिरक्षा को निष्क्रिय कर रहा है कोरोना का यह स्वरूप
- संक्रमित कोशिकाओं में बचाने वाले प्रोटीन को कर देता है धीमा
- अपनी तादाद बढ़ाने के लिए जुटा रहा ज्यादा समय
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new Corona strain
- फोटो : iStock
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विस्तार
लॉकडाउन से बाहर निकल रहे कई देशों में अब कोरोना के अल्फा स्वरूप ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। लेकिन एक ताजा अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इसके तेज प्रसार के पीछे छिपे रहस्य से पर्दा उठाया है। इसमें पता लगा है कि कोरोना का यह स्वरूप शरीर में खुद को अदृश्य बनाए रखता है। इसके लिए सबसे पहले यह हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की अग्रिम पंक्ति को निष्क्रिय कर देता है, जिससे यह न सिर्फ जवाबी हमले से बच जाता है बल्कि इसे अपनी तादाद बढ़ाने के लिए भी ज्यादा समय मिल रहा है।
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शोध में मिले 23 म्यूटेशन, एक ने बढ़ाया ज्यादा संक्रमण
ऑनलाइन जारी हुई शोध रिपोर्ट में अल्फा के 23 म्यूटेशन मिले हैं, जो इसे अन्य कोरोना वायरस से अलग बनाते हैं। जब ब्रिटेन में यह स्वरूप फैलने लगा तो शोधकर्ताओं ने अन्य स्वरूपों की तुलना में इसके तेज प्रसार की वजह का पता लगाने के लिए इसके आनुवांशिक बदलावों का निरीक्षण करना शुरू कर दिया था। येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के वायरसविद डॉ मौड्री लॉरेंट-रोल के मुताबिक, किसी भी वायरस की सफलता शरीर की अग्रिम प्रतिरक्षा को पार करने पर निर्भर करती है। जो रोगाणु इसमें जितना प्रभावी रहता है, वह उतना ही तेजी से संक्रमण फैला पाता है। कई शोधकर्ताओं ने अपना ध्यान अल्फा के उन नौ म्यूटेशन पर केंद्रित किया, जो इसके स्पाइक प्रोटीन को बदल देते हैं। इनमें से एक म्यूटेशन अल्फा को कोशिकाओं से ज्यादा मजबूती से जकड़ने में मदद करता है, जिसके चलते सफल संक्त्रस्मण की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
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संक्रमित कोशिकाओं से कम निकला इंटरफेरॉन
वहीं, कुछ शोधकर्ताओं ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया है कि अल्फा इंसानी प्रतिरक्षा को कैसे प्रभावित करता है। इसके लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वायरसविद ग्रेगरी टावर्स और उनके सहयोगियों ने मानव फेफड़ों की कोशिकाओं में कोरोनवायरस विकसित किए। फिर अल्फा संक्रमित कोशिकाओं की तुलना कोरोना वायरस के पुराने स्वरूपों से संक्रमित कोशिकाओं से की गई। इसके बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि अल्फा संक्त्रस्मित फेफड़ों की कोशिकाओं ने काफी कम इंटरफेरॉन (वायरस से सुरक्षा प्रदान करने वाला प्रोटीन) बनाया। साथ ही अल्फा कोशिकाओं में आमतौर पर इंटरफेरॉन द्वारा सक्त्रिस्य होने वाले रक्षात्मक जीन भी अन्य स्वरूपों से संक्त्रस्मित कोशिकाओं की तुलना में शांत ही रहे।
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अदृश्य बनाए रखने में कामयाब
टावर्स का कहना है, अल्फा स्वरूप की मौजूदगी में प्रतिरक्षा तंत्र की खतरे की घंटी बमुश्किल बज रही थी। यह स्वरूप खुद को काफी हद तक अदृश्य बनाए रखने में कामयाब रहा। इसकी अदृश्यता का पता लगा रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि अल्फा संक्रमित कोशिकाओं ने अन्य स्वरूपों की तुलना में ओआरएफ9बी जीन की करीब 80 गुना ज्यादा प्रतियां बनाईं।
प्रतिरक्षा के पटरी पर आने में हो रही देर
शोध के सहलेखक और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में आणविक जीवविज्ञानी नेवान क्त्रसेगन का कहना है कि कोरोना के अल्फा स्वरूप में एक ऐसा म्यूटेशन है, जो ओआरएफ9बी प्रोटीन के अत्यधिक निर्माण पर जोर देता है। यह इंटरफेरॉन का उत्पादन और पूरी प्रतिरक्षा प्रतिक्त्रिस्या को कमजोर कर देता है। इसके चलते अल्फा हमले से बचकर आसानी से अपनी तादाद बढ़ाने में जुट जाता है। संक्त्रस्मित कोशिकाएं ओआरएफ9बी प्रोटीन को धीमे-धीमे हटा पाती हैं। वहीं संक्रमण के करीब 12 घंटे बाद प्रतिरक्षा अलार्म फिर पटरी पर लौटने लगता है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है।