Congress President: BJP समेत दूसरे दलों के लिए 'आईना' है यह चुनाव, क्या दबाव में आएगा इनका 'अंदरूनी लोकतंत्र'?
Congress President: प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार ने कहा, अब सबसे ज्यादा नैतिक दबाव भाजपा पर ही होगा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था। अब कांग्रेस भी चुनौती दे सकती है कि पार्टी अध्यक्ष पद के लिए मतदान कराओ...
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कांग्रेस पार्टी ने लोकतांत्रिक तरीके से अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव कराने के लिए गुप्त मतदान प्रणाली का सहारा लिया है। इसके लिए भाजपा ने ही अप्रत्यक्ष तरीके से सबसे ज्यादा जोर डाला था। परिवारवाद का नाम लेकर कांग्रेस पर खूब हमले बोले गए। इसका असर ये हुआ कि पार्टी के भीतर ही असंतुष्ट नेताओं का एक समूह 'जी-23' खड़ा हो गया। नतीजा, कांग्रेस पार्टी ने मतदान के जरिए नया अध्यक्ष चुनने की कवायद पूरी कर दी। अब भाजपा सहित वे सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दल, नैतिक दबाव में आ जाएंगे, जिन्होंने अपना पार्टी अध्यक्ष चुनने के लिए कभी मतदान प्रणाली को नहीं अपनाया।
भाजपा सहित कई दल, 'आंतरिक लोकतंत्र' के नाम पर सब कुछ ठीक बता रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि 'कांग्रेस अध्यक्ष' पद की वोटिंग, क्या भाजपा व दूसरे दलों के लिए एक 'आईना' है। क्या 'अंदरूनी लोकतंत्र' की आड़ में चल रही 'कॉरपोरेट' राजनीति के दिन अब लद जाएंगे। दूसरे दलों में कोई नैतिक बदलाव दिखेगा।
दादा, बेटा, पोता...पीढ़ी को पार्टी सौंपने का चलन
प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार ने इस विषय पर अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तृत बातचीत की है। उन्होंने बताया, अमूमन भारतीय राजनीति को बड़े दल ही तय करते रहे हैं। राजनीति किस ओर जाएगी, बड़ी पार्टियों ने ही दिशा निर्धारित करने का काम किया है। कांग्रेस ने नेहरू परिवार को भरपूर मौका दिया। नरसिम्हा राव को पीएम तो सीताराम केसरी को अध्यक्ष बनाया। एक सीमा के बाद पार्टी को इन प्रयोगों का नुकसान भी झेलना पड़ा। बाद में दोबारा से कांग्रेस पार्टी ने एक निजी कंपनी का रूप ले लिया। बेटे और दामाद, राजनीतिक पावर की धुरी बनने लगे। ये केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आधार पर भी नजर आया। बाकी दलों को भी यही ठीक लगने लगा। अन्य क्षेत्रीय दलों में भी दादा, बेटा, पोता और उसके बाद वाली पीढ़ी को पार्टी सौंपने का चलन शुरु हो गया। कांग्रेस पार्टी ने इस बीच अंदरूनी लोकतंत्र का सहारा लेकर डॉ. मनमोहन सिंह को पीएम बनाया। कई राज्यों में सीएम भी बनाए गए।
बाप व दादी का कर्मक्षेत्र छोड़कर केरल जाना पड़ा
लोकतंत्र का सम्मान जरूरी है। उसका समावेश, अपनी विचारधारा और पार्टी में लाना पड़ता है। कांग्रेस पार्टी राह भटक गई थी। पार्टी को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। राहुल गांधी को बाप व दादी का कर्मक्षेत्र छोड़कर केरल में शरण लेनी पड़ी। केंद्र के अलावा राज्यों से भी कांग्रेस साफ हो गई। दो-तीन राज्यों में जैसे-तैसे सरकार चला रहे हैं। गलती का अहसास हो गया तो अब मजबूरी में 'भारत जोड़ो यात्रा' यानी जनमुखी के जरिए लोकतंत्र की तरफ बढ़ने का प्रयास हो रहा है। पार्टी को समझ आ गया कि प्राइवेट कंपनी की तरह राजनीति नहीं चलेगी। खैर, पार्टी को इस यात्रा का लाभ भी मिलेगा। दूसरी पार्टियों पर इसका असर पड़ेगा। जो दल राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर अपने परिवार व कॉरपोरेट जगत की बादशाहत रखते हैं, उन्हें अपना तरीका बदलना पड़ेगा। कांग्रेस अब कह सकेगी, लो हमने तो सीक्रेट बैलेट के जरिए पार्टी अध्यक्ष चुन लिया।
भाजपा में नहीं रही निर्वाचन पद्धति, आरएसएस ही सुप्रीम
प्रो. आनंद कुमार ने कहा, अब सबसे ज्यादा नैतिक दबाव भाजपा पर ही होगा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था। अब कांग्रेस भी चुनौती दे सकती है कि पार्टी अध्यक्ष पद के लिए मतदान कराओ। भाजपा और आरएसएस, इनके अपने ही नियम हैं। अपना ही लोकतंत्र है। यहां पर आजादी के पहले से लेकर आज तक निर्वाचन पद्धति नहीं रही। आरएसएस को ही सब कुछ तय करना है। पार्टी अध्यक्ष कैसे बनेगा, कौन बनेगा, इन सब में मतदान का कोई नियम नहीं है। पार्टी एक ही रटा रटाया राग अलाप देती है कि 'अंदरूनी लोकतंत्र' है। हम तो उसी पर चलते हैं। किसी को कोई आपत्ति नहीं है। बतौर डॉ. आनंद कुमार, सभी को मालूम है कि पार्टी और संघ की विचारधारा क्या है। हिंदुत्व के नाम पर सब कुछ लोकतंत्र के दायरे में है। कहीं घृणा है, तो कहीं फसाद है। इन सबके चलते 'संघ' में चुनाव का तो कोई मतलब ही नहीं है। शाखा चलती है, हिंदू खतरे में है, इस पर चर्चा होती है।
सभी दलों को 'अंदरूनी लोकतंत्र' से बनानी होगी दूरी
कांग्रेस के बाद अब धीरे-धीरे दूसरे दलों में भी यह मांग उठेगी कि पार्टी अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए मतदान होना चाहिए। जनता भी लोकतंत्र और अंदरूनी लोकतंत्र का भेद जान रही है। दूसरे दलों को अब नया तरीका तलाशना होगा। केंद्रीय, राज्य एवं जिला स्तर पर पार्टी पदाधिकारियों के चयन के लिए कोई पारदर्शी तरीका अपनाना पड़ेगा। ममता बनर्जी, स्टालिन, केसीआर, मायावती, अखिलेश यादव, चौटाला एवं बादल फैमिली, अरविंद केजरीवाल, लालू यादव, शरद पवार, केजरीवाल एवं ठाकरे परिवार सहित दूसरे दलों के नेताओं के लिए मैसेज जाएगा। परिवारवाद, तात्कालिक लाभ तो दिला सकता है, मगर उसके लिए दीर्घकालीन नुकसान भी झेलना पड़ता है। इसका सबसे ताला उदाहरण 'कांग्रेस' पार्टी का है। अपने चहेते को अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी संविधान में मनमाना बदलाव, भाजपा सहित दूसरे दलों को इस प्रक्रिया से भी निजात पानी होगी। निर्वाचक मंडल में से बीस या पच्चीस सदस्य राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के नाम का संयुक्त रूप से प्रस्ताव दें, ये तरीका बदलना पड़ेगा। प्रो. आनंद ने कहा, जनता को सब मालूम है कि किसकी चलती है। अध्यक्ष, किसकी मर्जी से बनते हैं। अंदरूनी लोकतंत्र, ये कहानी अब ज्यादा लंबी नहीं चलेगी।