Politics: कांग्रेस ने चल दिया हरियाणा में यह बड़ा दांव! अगले 60 दिनों के लिए बना लिया आसान रास्ता, लेकिन...
हरियाणा में इस बार कांग्रेस बहुत सधे तरीके से सियासी चालें चल रही हैं। दरअसल पार्टी इस बार हुए लोकसभा चुनावों के परिणामों से काफी उत्साहित है। यही वजह है की टिकटों से लेकर प्रत्याशियो के चयन तक में पार्टी अपनी पूरी रणनैतिक सूझबूझ का इस्तेमाल कर रही है।
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हरियाणा में विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस ने एक ऐसा दांव चला है जिससे पार्टी के भीतर उठने वाला फिलहाल विरोध कम होता दिख रहा है। हालांकि इस दांव से पार्टी ने सिर्फ 60 दिनों के विरोध के पटाक्षेप की पटकथा ही लिखी है। दरअसल पार्टी ने यह कहकर उन मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को फिलहाल इस रास्ते से हटा दिया जो सांसद भी थे और चुनाव लड़ने की उम्मीद में सीएम के दावेदार भी। पार्टी ने तय किया है कि किसी भी सांसद को टिकट नहीं दिया जाएगा। इससे सांसदों के सीएम पद की दावेदारी का मामला तो खत्म हो गया। लेकिन पार्टी ने यह कहकर मामला खुला छोड़ दिया की मुख्यमंत्री की रेस से बाहर कोई नहीं है। यानी की चुनावों के परिणामों के बाद सीएम की रेस में कोई भी आ सकता है। भले उसने चुनाव लडा हो या न लड़ा हो। सियासी जानकारों की नजर में पार्टी ने ऐसा करके जाट और दलितों के पुराने कांबिनेशन को साधा है। ताकि कोई नेता नाराज न हो।
हरियाणा में इस बार कांग्रेस बहुत सधे तरीके से सियासी चालें चल रही हैं। दरअसल पार्टी इस बार हुए लोकसभा चुनावों के परिणामों से काफी उत्साहित है। यही वजह है की टिकटों से लेकर प्रत्याशियो के चयन तक में पार्टी अपनी पूरी रणनैतिक सूझबूझ का इस्तेमाल कर रही है। इस दौरान पार्टी के हरियाणा प्रभारी दीपक बावरिया ने कहा की किसी भी सांसद को चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा। ये सभी नेता पार्टी का प्रचार करेंगे। ऐसे में चर्चा यही शुरु हुई की भूपिंदर सिंह हुड्डा के सामने से कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला की बतौर मुख्यमंत्री के चेहरे की दावेदारी एक तरह से समाप्त हो गई। हालांकि पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है की ये नेता चुनाव नहीं लड़ेंगे विधानसभा का। लेकिन विधानसभा के चुनावों के परिणामों के बाद मुख्यमंत्री का चयन तो किसी भी नेता का हो सकता है। इसमें सांसद भी शामिल हैं।
हरियाणा में पार्टी के प्रभारी दीपक बाबरिया भी बीते दिनों यह बात कह चुके हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि कोई भले ही सांसद चुनाव न लड़ें। लेकिन सीएम की रेस से कोई भी बाहर नहीं है। मुख्यमंत्री बनने की एक प्रक्रिया होती है। इसमें विधायक किसी को भी अपना नेता चुन सकते हैं। दीपक बाबरिया के इस बयान के बाद सियासी गलियारो में चर्चाएं इस बात की शुरू हुईं की आखिर कांग्रेस ने ये कौन सा दांव चला है। राजनैतिक विश्लेषक डॉ. पुनीत जागलान कहते हैं कि पार्टी ने जिस तरह से शुरआत में सांसदों को चुनाव न लड़ाए जाने का एलान कर एक तरह से टकराव को रोका है। वह तरीका तो ठीक है। क्योंकि इससे कम से तीन चार बड़े नेताओं का अहम आमने सामने नहीं आएगा। लेकिन यह कहकर की सीएम की रेस से कोई बाहर नहीं है इससे वो मैदान खुला छोड़ दिया जो परिणामों के बाद सभी संभावनाओं को आगे बढ़ाता है। यानी रेस में सभी बने रहेंगे। भले चुनाव लड़ें या न लड़े।
कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कहना है की अभी चुनाव टिकट का बटवारा और फिर सियासी मैदान में लड़ना ही उनकी प्राथमिकता में शामिल है। बाकी कौन सीएम होगा या नहीं होगा यह परिणामों के आधार पर विधायक करेंगे। बाकी का फैसला पार्टी आला कमान लेगा। राजनैतिक जानकारों का कहना है की पार्टी बीच का रास्ता निकालते हुए किसी भी बड़े नेता के समर्थकों को मायूस नहीं होने देना चाहती है। डॉक्टर पुनीत जागलान कहते हैं कि कांग्रेस ऐसा सियास दांव चलकर जाटों को भूपेंद्र सिंह हुड्डा और दलितों को कुमारी शैलजा के माध्यम से अपने पाले में करने की जुगत में है। उनका कहना है की हरियाणा में लोकसभा चुनावों में इसी सियासी गठजोड़ से पार्टी ने भाजपा को मजबूत चुनौती देकर आधी सीटें झटक ली थीं। इसलिए पार्टी सीधे तौर पर किसी को सीएम की रेस से बाहर रहने का न तो संदेश दे सकती है। और न ही पार्टी कोई ऐसा रिस्क उठना चाहेगी।
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