लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त गंवा सकती है कांग्रेस, केंद्र में मचे घमासान का दिल्ली पर असर
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कांग्रेस की केंद्रीय इकाई में मचे घमासान का सीधा असर राज्य की इकाइयों पर पड़ रहा है। इससे दिल्ली जैसे उन राज्यों में भी पार्टी का कामकाज प्रभावित हो रहा है जहां पार्टी को जल्द ही चुनाव का सामना करना है। पार्टी के प्रदेश स्तर के नेताओं का भी मानना है कि अगर राज्य इकाई को तुरंत गति नहीं दी गई तो इससे लोकसभा चुनाव में मिली बढ़त पार्टी गंवा सकती है। राहुल गांधी के इस्तीफे पर मचे घमासान से पार्टी इस समय बेहद सुस्त हो गई है, जबकि उसकी प्रतिद्वंदी भाजपा और आम आदमी पार्टी लगातार फ्रंट फुट पर खेल रही हैं।
इसके पूर्व, विधानसभा चुनाव की तैयारियों को तेजी देने के लिए शीला दीक्षित ने ब्लॉक स्तर की कमेंटियों को तीन-तीन नामों का पैनल राज्य इकाई को भेजने का निर्देश दिया था। इन नामों में से ही विधानसभा उम्मीदवारों का चयन किया जाना था। इस तरह शीला दीक्षित ने संगठन में निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को महत्त्व दिए जाने का संदेश दिया था।
लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी से मुलाकात के बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित ने प्रदेश की सभी 280 ब्लॉक स्तर की कमेटियों को भंग कर दिया था। (प्रदेश प्रभारी पीसी चाको से इस मामले में उनके मतभेद भी सामने जगजाहिर हो गए थे।) इसके बाद से ही पार्टी का कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।
ब्लॉक ऑब्जर्वर बनाए जाएंगे
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के एक नेता ने बताया कि पार्टी को एक बार फिर गति देने के लिहाज से विचार किया जा रहा है। पार्टी ने सभी ब्लॉक/जिला स्तर पर एक ऑब्जर्वर बनाने का निर्णय लिया है। ये ऑब्जर्वर कोई पूर्व विधायक/पार्षद या बड़ा नेता नहीं हो सकता। ये ऑब्जर्वर ही अब संगठन को नई तैयारियों को अंतिम रुप देने के लिए सुझाव देंगे। इनके नामों की घोषणा शुक्रवार को की जा सकती है।
लोकसभा चुनाव में की थी शानदार वापसी
दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार जाने के बाद कांग्रेस लगातार पिछड़ती चली गई। इस दौरान अरविंदर सिंह लवली और अजय माकन को प्रदेश अध्यक्ष बनाने सहित उसने कई प्रयोग किए, लेकिन ये सभी प्रयोग उसे दिल्ली में वापसी कराने में असफल साबित हुए। पार्टी के लिए सबसे बुरा परिणाम 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान आया जब दिल्ली विधानसभा में उसका एक भी विधायक नहीं चुना गया।
पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पूर्व पार्टी ने एक बार फिर शीला दीक्षित पर भरोसा जताया और उन्हें अध्यक्ष बनाकर दिल्ली में पार्टी को दुबारा मजबूत करने की कोशिश की गई। शीला दीक्षित के मैदान में उतरने से कांग्रेस ने अपना खोया जनाधार दुबारा हासिल करने में काफी सफलता हासिल की। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को छोड़ते हुए उसने सभी सीटों पर दूसरा स्थान प्राप्त कर अरविंद केजरीवाल के लिए खतरे की घंटी बजा दी।
लोकसभा चुनाव के परिणामों में वह पांच विधानसभा क्षेत्रों में नंबर वन तो 42 सीटों पर नंबर दो पर रही। पार्टी का मानना है कि इन सीटों पर मोदी के नाम पर चुनाव न होने की स्थिति में जीत दर्ज कर दिल्ली में वापसी की जा सकती है। लेकिन इसके लिए अभी से जमीनी स्तर पर काम करना होगा जो फिलहाल ठप पड़ा हुआ है।