तंज पर चर्चा: ज्योतिरादित्य सिंधिया के बहाने राहुल गांधी ने किसे मारा इतना बड़ा ताना, दिया ये संदेश?
- दो दिन पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया पर कसा था तंज और भाजपा में जारी है चर्चा
- कांग्रेस के भीतर आमूल-चूल परिवर्तन से जुड़ा है संदेश
- भाजपा के तमाम नेताओं को अखर रहा है राहुल गांधी का वक्तव्य
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विस्तार
दो दिन पहले कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गाधी ने भाजपा में ज्योतिरादित्य सिंधिया की स्थिति को लेकर सधा हुआ वक्तव्य दिया था। सहजता से राहुल गांधी बहुत छोटे में बड़ी बात कह गए थे। इसके जवाब में ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा दूसरे भाजपा नेताओं ने जवाबी प्रतिक्रिया भी दी, लेकिन नस्तर से तेज चुभने वाला यह तंज अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है। मजे की बात है कि चर्चा भाजपा में ही नहीं, बल्कि कांग्रेस में भी हो रही है। यह वक्तव्य भाजपा के कुछ नेताओं की परेशानी भी बढ़ा रहा है।
क्यों नस्तर से तेज है राहुल गांधी के तंज की चुभन?
राहुल गांधी ने सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर जाने के बहुत समय बाद संक्षिप्त और बेहद सधे अंदाज में खुलकर कोई प्रतिक्रिया दी है। पिछले दो साल में कांग्रेस से बहुत से नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में गए हैं। इन नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सबसे बड़ा और प्रभावशाली नेताओं में रहा। सिंधिया के लिए न केवल सोनिया गांधी के दरवाजे खुले रहते थे, बल्कि राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा के दरवाजे भी हमेशा खुले रहते थे। वह ग्वालियर से छींकते थे तो प्रतिक्रिया दिल्ली से आती थी।
कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव के अनुसार ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश के पहले अध्यक्ष, बाद में मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। उन्होंने अहम को आगे रखकर इसका भरपूर प्रयास किया। इसमें सफल नहीं हो पाए, लेकिन अपने समर्थक विधायकों को मंत्री बनवाने में सफल हो गए। लेकिन महत्वाकांक्षा उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही थी और वह कांग्रेस की सरकार गिराकर भाजपा में चले गए। सूत्र का कहना है कि अब वह दूसरी पार्टी के नेता हैं, इसलिए टिप्पणी ठीक नहीं है, लेकिन सच यही है कि वह जिस ठसक से कांग्रेस में थे, उसके मुकाबले उन्हें वहां कुछ नहीं मिला है।
सूत्र का कहना है कि यह संदेश केवल ज्योतिरादित्य के लिए नहीं है। यह उन तमाम नेताओं के लिए है, जिन्होंने पिछले कुछ सालों में या पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन की है। चाहे वह उत्तराखंड के नेता सतपाल महाराज हों, या हरक सिंह रावत। उत्तर प्रदेश के जगदंबिका पाल अब तक मंत्री नहीं बन पाए। कर्नाटक में कांग्रेस के सहयोगी एचडी कुमारस्वामी की सरकार गिराने वाले कांग्रेस के नेताओं का भी हश्र देख लीजिए। पूर्व महासचिव के अनुसार कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में गए किसी भी नेता को वहां सम्मान नहीं मिल पाया।
भाजपा नेताओं को भी अखर रही है राहुल की बात?
उत्तराखंड के एक मंत्री के बारे में कहा जा रहा है कि वह मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा रोक नहीं पा रहे हैं। बताते हैं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की शिकायत करने वालों में वे पहले पायदान पर रहे। कांग्रेस से ही भाजपा में गए दूसरे नेता के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कई बार अपनी नाराजगी तक जाहिर कर दी। बताते हैं कि भाजपा में अब इस तरह के संदेश आम हैं कि वहां दूसरे दल या विचारधारा से आए लोगों को बड़ी और प्रमुख जिम्मेदारी देने में परहेज किया जाता है।
उत्तर प्रदेश में बसपा से भाजपा में गए एक नेता भी आज तक बहुत खुश नहीं बताए जा रहे हैं। केरल मूल के कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भी भाजपा ज्वाइन की, लेकिन वह हाशिए पर चल रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के एक प्रवक्ता ने भाजपा ज्वाइन की, वह भाजपा में भी प्रवक्ता हैं, लेकिन उनकी स्थिति अभी भी ढाक के तीन पात वाली बनी है। अब इन सभी भाजपा नेताओं को कहीं न कहीं अपने निर्णय पर कुछ पश्चाताप हो रहा है। राहुल ने सिंधिया के कंधे पर बंदूक रखकर चिड़िया की एक आंख पर निशाना लगा दिया है। उनका यह निशाना जहां भाजपा के दूसरे दलों के नेताओं को शामिल कराने की रणनीति पर चोट कर रहा है, वहीं बागी नेताओं की कुंठा पर तंज भी है।
कांग्रेस के नेताओं को वैचारिक संदेश
कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा के पैरोकारों में शामिल एक अन्य वरिष्ठ नेता का कहना है कि राहुल गांधी ने इसके बहाने पार्टी नेताओं को भी संदेश दिया है। उन्होंने युवा नेताओं को भी संदेश दिया है कि वह राजनीति में महत्वाकांक्षा, पद के लालच या निजी स्वार्थ में सबकुछ भूल जाने की बजाय धैर्य से काम लेना सीखें। बताते हैं एक दशक से पहले पार्टी के शिमला अधिवेशन में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। पहला निर्णय राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य से जुड़ा था। दूसरा निर्णय राहुल गांधी के साथ-साथ पार्टी के युवा नेताओं को आगे लाकर नई पीढ़ी को राजनीति में तैयार करना था।
सूत्र का कहना है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, आरपीएन सिंह, जतिन प्रसाद जैसे तमाम नेता इसी प्रक्रिया में आगे बढ़ाए गए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आस्कर फर्नांडीज ने इसकी जमीन तैयार की, लेकिन इनमें से कुछ नेता इस अवसर को पचा नहीं पाए। वह राजनीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को समझने के बजाय इसके तिलिस्म में उलझते चले गए। सूत्र का कहना है कि यह कोई नया प्रयोग नहीं है। कांग्रेस पार्टी के भीतर पहले संजय गांधी के करीबी नेताओं को आगे बढ़ाया गया था। लेकिन 2014 के बाद इसका नतीजा अपेक्षाओं की कसौटी पर उतना खरा नहीं रहा। इसलिए राहुल गांधी ने अपने छोटे से वक्तव्य से कई मोर्चों पर निशाना साधा है। उन्होंने अपने वक्तव्य में लोगों की कांग्रेस पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता, समर्पण पर भी कुछ कहा है। इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
राहुल की टीम के नए-पुराने में भी प्रतिद्वंदिता
राहुल गांधी के कार्यालय और उनकी सलाहकार मंडली में भी तमाम नेता, कार्यकर्ता, कार्यालय के सदस्य हैं। इनमें कौशल विद्यार्थी, निखिल अल्वा, के. राजू, कनिष्क सिंह, अजय माकन, रणदीप सुरजेवाला, दिव्या स्पंदना, सुष्मिता देव, अलंकार सवाई, मोहन गोपाल, सचिन राव जैसे चेहरे हैं। प्रियंका गांधी के कार्यालय में काम कर चुके धीरज श्रीवास्तव, प्रीति सहाय, संदीप सिंह, राम कृष्ण जैसे भी चेहरे हैं। इनमें से कई अभी मोर्चा संभाले हैं और कई के ओहदे में कमी आई या हाशिए पर चले गए।
कभी राहुल गांधी पीएल पुनिया बहुत भरोसा करते थे तो कभी मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का सिक्का चलता था। पूर्व महासचिव का कहना है कि पिछले दस वर्षों में राहुल गांधी ने कई युवा नेताओं को निजी पहल करके आगे बढ़ाया। एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस में तमाम बदलाव किए, कुछ चेहरों ने उन्हें निराश भी किया। बताते हैं राहुल गांधी के आंख-कान कहे जाने वाले इन चेहरों में हमेशा से एक प्रतिद्वंदिता, कांट-छांट की भी प्रवृत्ति रही है। पुराने नाम हटते गए, नए जुड़ते रहे हैं। राहुल का मौजूदा वक्तव्य सभी के लिए एक संदेश की तरह है।