कांग्रेस में घमासान: लोकतांत्रिक पार्टी में कहां खो गया है लोकतंत्र
- सभी राजनीतिक दल में लगभग एक जैसी बीमारी
- युवा और वरिष्ठ के बीच में है तालमेल का पूरा आभाव
- नेता पुत्रों के सहारे चलाए जा रहे हैं राजनीतिक दल
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पार्टी को नेता, लोक हित और जन आकांक्षा समझना होगा
कांग्रेस पार्टी के एक पुराने महासचिव कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां तो जनता से मिले समर्थन के आधार पर चलती हैं। जन नेता मिलकर एक झंडे के नीचे बड़ी पार्टी बनाते हैं। इसलिए सबकुछ लोक विरुद्ध नहीं चल सकता। इतना कहने के बाद वह चुप हो जाते हैं। कुछ देर मौन रहने के बाद वह एक सवाल पूछते हैं कि राजस्थान में जो कुछ चल रहा है या मध्यप्रदेश में जो कुछ हुआ उसका जिम्मेदार कौन है? किसी की तो जवाबदेही तय होगी? वह कुछ देर मौन साध लेते हैं। फिर एक सवाल दागते हैं कि आखिर कांग्रेस पार्टी में कौन फैसले ले रहा है? क्या एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी में फैसले लेने की यही परंपरा रही है? वह कहते हैं कि इन्ही लाइनों में सबकुछ छिपा हुआ है। जाइए और आप समझ लीजिए।
शशि थरूर, कपिल सिब्बल, आजाद, मनीष तिवारी, मिलिंद देवड़ा, राजीव सातव...
कांग्रेस पार्टी के नेताओं के ट्वीट, जुबानी जंग या फिर राज्यसभा के सांसदों की बैठक में उठे सवाल कहीं न कहीं पार्टी के लोकतंत्र को लेकर ही हैं। पार्टी का युवाओं का एक तबका कांग्रेस की दुर्दशा के लिए यूपीए-टू सरकार के कामकाज को दोषी ठहरा रहा है। एक तबका आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, शशि थरूर जैसे नेताओं का भी है। यह तबका युवा नेताओं के कई तर्क खारिज कर देता है। वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यूपीए-2 सरकार में अच्छा काम हुआ था। हम उस काम को भुना नहीं पाए थे। आज भी भाजपा के दुष्प्रचार और झूठ के आगे नहीं भुना पा रहे हैं। हमें थोड़ा धैर्य रखना चाहिए और यूपीए-2 सरकार के कामकाज को सही तरीके से देखना चाहिए।
कौन हैं राहुल और प्रियंका?
दक्षिण भारत से आते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। बड़ा मौजूं तरीके से सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि राहुल गांधी इस समय पार्टी के केवल सांसद हैं। वह पार्टी के पूर्व अध्यक्ष हैं, लेकिन उनसे बड़े नेता पार्टी के भीतर हैं। लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर एक अथॉरिटी की तरह काम कर रहे हैं। आखिर क्यों? उनके पास अपने नेताओं से मिलने, मंत्रणा करने का पार्टी की जरूरत के हिसाब से समय ही नहीं होता। सूत्र का फिर सवाल प्रियंका गांधी वाड्रा पर आत है। वह कहते हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा पार्टी की महासचिव, उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं। पार्टी में उनके अलावा भी महासचिव हैं। लेकिन प्रियंका भी अथारिटी की तरह फैसले लेती है और उनका सचिवालय नेताओं को इसकी जानकारी दे देता है। क्या पूरी कांग्रेस का मतलब बस यही है? सूत्र का कहना है कि हमें आगे की राजनीति करनी है तो एक ठोस तरीका बनाना होगा।
नेतृत्व की पकड़ ढीली होने पर भागने लगते हैं घोड़े
70 साल से अधिक की उम्र के कांग्रेस नेता को उम्मीद थी कि राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाएंगे, लेकिन घोषणा दूसरे नामों की हो गई। इधर कुछ निराश चल रहे हैं। सूत्र का कहना है कि जब शीर्ष नेतृत्व की संगठन पर पकड़ कमजोर पड़ती है तो घोड़े भागने लगते हैं। सूत्र का कहना है कि सोनिया गांधी के साथ काम करने में वरिष्ठ नेताओं को आपत्ति नहीं है, लेकिन ये सब राहुल गांधी के खांचे में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं। वहीं युवाओं को सोनिया गांधी के मार्ग दर्शन में काम करने में कोई परेशानी नहीं है। वह मानते हैं कुछ वरिष्ठ नेताओं के पुत्रमोह का पार्टी के कामकाज पर बुरा असर पड़ रहा है। हालांकि वह खुद राज्यसभा टिकट न मिलने से नाखुश हैं, लेकिन सवाल उठाते हुए कहते हैं कि कई वरिष्ठ नेता तीन-चार दशक की पदों पर कब्जा किए बैठ रहते हैं। युवा नेताओं को इसके कारण अवसर नहीं मिल पाता।
पार्टी में युवा निराश क्यों हो रहे हैं?
कांग्रेस की एक और तेज तर्रार नेता हैं। उन्हें राहुल गांधी की टीम का सदस्य माना जाता है। वह बड़ी शिद्दत से सवाल उठाती हैं? उनका कहना है कि ज्योतिरादित्य चले गए। सचिन पायलट अपने अपमान का मुद्दा लेकर बागी रूप में खड़े हैं। हमें बताइए पार्टी के भीतर अब युवा क्यों निराश हो रहे हैं? हालांकि वह कहती हैं कि यह कांग्रेस का अंदरुनी मामला है। पार्टी मंथन में जुटी है। युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच में मचे इस घमासान का एक नतीजा निकलेगा। आज यह इसलिए हो रहा है, क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष का स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं है। राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद जिम्मेदारी से कदम पीछे खींच चुके हैं। प्रियंका गांधी ने खुद को उत्तर प्रदेश की राजनीति तक सीमित कर लिया है। कई वरिष्ठ नेता अपने बाद पुत्रों को राजनीति में सेट करने में लगे हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान का संकट इसका ताजा उदाहरण है। ऐसे में पार्टी के भीतर युवाओं का कोई आईकॉन नहीं है।
लोकत्रांत्रिक पार्टियों में लोकतंत्र है ही कहां?
राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी ने 2001 में साक्षात्कार के दौरान कहा था कि जल्द ही लोकतांत्रिक राजनीतिक पार्टियों में लोकतंत्र खत्म हो सकता है। आज रजनी कोठारी नहीं हैं, लेकिन उनकी भविष्यवाणी सही होती दिखाई दे रही है। वीएन शर्मा देश की राजनीतिक पार्टियों पर काफी काम कर रहे हैं। वह साफ कहते हैं कि लोकतांत्रिक देश की राजनीतिक पार्टियों में लोकतंत्र है ही कहां? यहां अधिकांश दलों में कई दशक से पार्टी का नेता थोपा जा रहा है। वह कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी को देश के प्रधानमंत्री पार्टी की कमान दी गई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पार्टी प्रमुख की कमान संभालने के बाद से यह पद भी घूम फिरकर उनके और राहुल गांधी तक सीमित रहा है। पार्टी का अध्यक्ष चुनने का एक कोरम भर हुआ।
अन्य दल भी अछूते नहीं
वीएन शर्मा कहते हैं कि जमीन से उठकर, संघर्ष करके लोग राजनीति में आते हैं। राजनीतिक दल का मुखिया होने के बाद उनके नेत़त्व में बनाई गई पार्टी की कमान भी उनके ही परिवार में रह जा रही है। शर्मा कहते हैं कि इसके कारण राजनीतिक मूल्यों का तेजी से ह्रास हो रहा है। वह कहते हैं कि इस मामले में भाजपा काफी हद तक बची हुई है, लेकिन तानाशाही तो वहां भी है। वीएन शर्मा गिनाते हुए कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत उनके किसी राजनीतिक शिष्य के पास नहीं जा पाई। यह चौधरी अजीत सिंह, पुत्र जयंत चौधरी तक ही है। मुलायम सिंह यादव की विरासत अब अखिलेश के पास है। बसपा प्रमुख मायावती भी अपने भाई, भतीजे को लेकर पार्टी में आ चुकी हैं। बिहार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल, राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, झारखंड में शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा, हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल, महाराष्ट्र में शिवसेना, महाराष्ट्र नव निर्माण सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तमिलनाडु में डीएमके, तेलंगाना में टीआरएस, आंध्र प्रदेश में तेलगू देशम पार्टी सबको देख लीजिए। लोकतंत्र कहां है? एक परिवार तक पार्टी केन्द्रित है। कांग्रेस भी इसी का शिकार है।