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असम: सीएए के तहत अब तक केवल तीन को मिली नागरिकता; सीएम सरमा ने दी जानकारी

Wed, 03 Sep 2025 02:51 PM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, गुवाहाटी
अमर उजाला ब्यूरो, गुवाहाटी Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 03 Sep 2025 02:51 PM IST
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CM Himanta says three foreigners got Indian citizenship in Assam under CAA
हिमंता बिस्वा सरमा, सीएम, असम - फोटो : ANI

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बुधवार को खुलासा किया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के तहत अब तक राज्य में सिर्फ तीन विदेशियों को ही भारतीय नागरिकता दी गई है। यह बयान उस पृष्ठभूमि में आया है जब लंबे समय से यह अटकलें और आशंकाएं लगाई जा रही थीं कि लाखों विदेशी असम में सीएए के जरिए नागरिकता हासिल करेंगे।

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सरमा ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए बताया कि अब तक केवल तीन लोगों को असम में सीएए के तहत नागरिकता मिली है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार को कुल 12 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से तीन को मंजूरी मिल चुकी है, जबकि नौ अभी विचाराधीन हैं।
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सीएम ने कहा, बहुत शोर मचाया गया कि 20–25 लाख लोग असम में नागरिकता पाएंगे। अब आप ही तय करें कि जब केवल 12 आवेदन आए हैं तो इस पर चर्चा करना कितना प्रासंगिक है। असम में सीएए के पहले लाभार्थी बने 50 वर्षीय दुलोन दास, जिन्हें अगस्त 2024 में भारतीय नागरिकता मिली। वे राज्य में इस कानून के तहत नागरिकता पाने वाले पहले व्यक्ति बने।
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क्या है सीएए
नागरिकता संशोधन अधिनियम का उद्देश्य हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदाय के उन शरणार्थियों को नागरिकता देना है, जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भारत आए हों और 31 दिसंबर 2014 से पहले यहां प्रवेश कर चुके हों। साथ ही, उन्हें भारत में कम से कम पाँच वर्ष का निवास पूरा करना अनिवार्य है।
 
लागू होने की प्रक्रिया
सीएए दिसंबर 2019 में संसद से पारित हुआ था, लेकिन इसे 11 मार्च 2024 को लागू किया गया, जब इसके नियम अधिसूचित किए गए। केंद्र ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि गैर-मुस्लिम अवैध प्रवासियों के मामलों को फिलहाल विदेशियों के न्यायाधिकरण (एफटीएस) को न भेजा जाए, जब तक कि उनके नागरिकता

आवेदन पर फैसला नहीं हो जाता। अब तक असम में केवल तीन को मंजूरी मिलने के बाद यह साफ हो गया है कि राज्य में सीएए का प्रभाव शुरुआती अटकलों की तुलना में कहीं अधिक सीमित रहा है। हालांकि, यह मुद्दा अब भी गहन राजनीतिक बहस को जन्म दे रहा है।

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